Top
Begin typing your search above and press return to search.

आखिर पश्चिम बंगाल में एसआईआर पर इतना विवाद क्यों?

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद पर शुरू से ही जितना विवाद हो रहा है उतना कहीं और नहीं हुआ

आखिर पश्चिम बंगाल में एसआईआर पर इतना विवाद क्यों?
X

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद पर शुरू से ही जितना विवाद हो रहा है उतना कहीं और नहीं हुआ. इससे केंद्र की मंशा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. यहां अप्रैल में ही विधानसभा चुनाव होने हैं.

पश्चिम बंगाल में एसआईआर तो बाद में शुरू हुआ, इस पर विवाद पहले ही शुरू हो गया. अब यह सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. ज्यादातर राज्यों में इस कवायद के पूरा होने के बाद अंतिम मतदाता सूची भी प्रकाशित हो गई है.

बंगाल में भी 28 फरवरी को यह सूची प्रकाशित होनी है. लेकिन यहां अभी लाखों मतदाताओं के फार्म में तथ्यात्मक विसंगतियों और दस्तावेजों की जांच का काम काम बाकी है. अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस सप्ताह से कलकत्ता हाईकोर्ट के करीब ढाई सौ जजों को इस काम में लगाया गया है.

कैसे पूरा होगा दस्तावेजों की जांच का काम

कलकत्ता हाईकोर्ट का कहना है कि अगर एक जज रोजाना ढाई सौ मामले भी निपटाता है तो इस कवायद में कम से कम अस्सी दिन लगेंगे. उसने जजों की कमी की बात कहते हुए शीर्ष अदालत को एक पत्र भेजा था. इसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस काम के लिए पड़ोसी झारखंड और ओडिशा से जजों को नियुक्त करने को कहा है. इन अधिकारियों के आने-जाने और ठहरने का खर्च चुनाव आयोग उठाएगा. अदालत ने कम से कम तीन साल का अनुभव रखने वाले सिविल जजों को भी इस काम में लगाने का निर्देश दिया है.

यहां दस्तावेजों के सत्यापन या जांच का काम पूरा नहीं होने की वजह से एसआईआर और मतदाता सूची प्रकाशित होने की तारीख एक सप्ताह बढ़ा दी गई थी. अब 28 फरवरी को यह सूची प्रकाशित होनी है. लेकिन लाखों लोगों के नाम उसमें शामिल नहीं हो सकेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सूची का प्रकाशन 28 फरवरी को ही करना होगा. उसके बाद बाकी लोगों के दस्तावेजों की जांच पूरी होने पर उनके नामों की पूरक सूची जारी की जा सकती है.

असम में मतदाता सूची का 'गहन' नहीं 'विशेष पुनरीक्षण' क्यों?

इससे पहले ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 58 लाख नाम काटे गए थे. चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक, करीब सात लाख लोग सुनवाई के दौरान नहीं पहुंचे. उनके नाम कटना तय है. इसके अलावा कम से कम 50 लाख नामों में तथ्यात्मक विसंगतियां हैं या फिर उनके दस्तावेजों की जांच होनी है.

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

बीते सप्ताह इस मुद्दे पर दायर याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संबंधित पक्षों के साथ बैठक कर इस गतिरोध को दूर करने का निर्देश दिया था. उसके बाद यहां दो-दो बार बैठक हो चुकी है.

शीर्ष अदालत ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच भरोसे की कमी है. अदालत ने चुनाव आयोग को नामांकन की अंतिम तिथि से 10 दिन पहले तक सूची में नाम शामिल करने की प्रक्रिया जारी रखने का निर्देश दिया है. उसने कहा है कि दसवीं की परीक्षा का प्रमाण पत्र और आधार कार्ड वैध दस्तावेज के तौर पर माने जाएंगे.

चुनाव आयोग ने एसआईआर की कवायद में सुस्ती के आरोप में अब तक कम कम के सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया है और चार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है.

शुरु से ही तृणमूल और बीजेपी के बीच खींचतान

राज्य में एसआईआर के मुद्दे पर शुरू से ही राजनीति होती रही है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी इसे बीजेपी, केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की साजिश बताते हुए वैध वोटरों के नाम काटने का प्रयास करने का आरोप लगा चुकी है. ममता बनर्जी तो एसआईआर के खिलाफ दो-दो बार सड़कों पर भी उतर चुकी है.

लेकिन दूसरी ओर, बीजेपी का दावा है कि राज्य में कई लाख लोगों के नाम अवैध तरीके से मतदाता सूची में शामिल हैं. एसआईआर के जरिए उनकी पहचान कर उनके नाम हटाए जाएंगे. पार्टी के एक नेता सुकांत मजूमदार ने डीडब्ल्यू से कहा, "ममता बनर्जी अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को बचाने के लिए ही एसआईआर का विरोध कर रही हैं."

एसआईआर की कवायद के दौरान बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) और आम लोगों की मौतें भी एक बड़ा मुद्दा रही हैं. तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, "एसआईआर के आतंक के कारण अब तक सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें से ज्यादातर ने आत्महत्या कर ली है."

दूसरी ओर, बीजेपी का दावा है कि एसआईआर के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस की गलतबयानी और भ्रामक प्रचार के कारण ही लोगों की मौत हुई है.

एसआईआर में दस्तावेजों और तथ्यात्मक विसंगतियों की जांच का जिम्मा न्यायिक अधिकारियों को सौंपने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तृणमूल कांग्रेस ने खुशी जताई है. पार्टी ने यहां जारी बयान में कहा है, "इससे साफ है कि बंगाल में एसआईआर की कवायद पर अब चुनाव आयोग का नियंत्रण नहीं रहा. अब सुप्रीम कोर्ट ही इसकी निगरानी कर रहा है. बंगाल के वैध वोटरों को बेवजह परेशान की साजिश न्यायिक हस्तक्षेप से बेनकाब हो गई है."

केंद्र की मंशा पर उठाए गए सवाल

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर पर राजनीति तो पहले से ही हो रही थी. लेकिन अब इस पर जटिलता और मामूली गलतियों के कारण भी वोटरों को तथ्यात्मक विसंगति की श्रेणी में डालने से केंद्र सरकार की मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं. लाखों मामले तो अनुवाद की गलती के कारण लंबित हैं. इसी वजह से राज्य सरकार बार-बार दस्तावेजों की जांच के लिए ऐसे अधिकारियों को नियुक्त करने की मांग करती रही है जिनको बांग्ला भाषा आती हो.

राजनीतिक विश्लेषक तापस सेन डीडब्ल्यू से कहते हैं, "इस कवायद को देखने पर लगता है कि यह पूरी तरह पारदर्शी नहीं रही है. लोगों को बेवजह परेशान करने के भी सैकड़ों मामले सामने आए हैं. कई मामलों में उनसे ऐसे दस्तावेज भी मांगे जा रहे हैं जिनका एसआईआर से कोई मतलब नहीं है."

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक शिखा मुखर्जी भी इससे सहमत हैं. वो डीडब्ल्यू से कहती हैं, "एसआईआर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच राजनीति का मुद्दा जरूर बना है. लेकिन इस पर पैदा होने वाली जटिलता और आरोप-प्रत्यारोप को ध्यान में रखते हुए केंद्र की मंशा पर भी सवाल खड़े होते हैं. आखिर दूसरे राज्यों में यह कवायद जब बिना किसी विवाद के पूरी हो गई तो बंगाल में इस पर इतना गतिरोध क्यों है?"

राज्य में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं. लेकिन फिलहाल कोई भी यह अनुमान लगाने की स्थिति में नहीं है कि करीब 50 लाख वोटरों की तथ्यात्मक विसंगतियों और दस्तावेजों की जांच कब तक पूरी होगी.


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it