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पश्चिम बंगाल में मदरसों का सर्वेक्षण क्यों करा रही है सरकार?

पश्चिम बंगाल में बीते महीने सत्ता संभालने वाली बीजेपी सरकार ने ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य करने के बाद अब राज्य के तमाम मदरसों के सर्वेक्षण का आदेश दिया है. सर्वेक्षण रिपोर्ट पांच जुलाई तक सौंपनी होगी

पश्चिम बंगाल में मदरसों का सर्वेक्षण क्यों करा रही है सरकार?
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पश्चिम बंगाल में बीते महीने सत्ता संभालने वाली बीजेपी सरकार ने ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य करने के बाद अब राज्य के तमाम मदरसों के सर्वेक्षण का आदेश दिया है. सर्वेक्षण रिपोर्ट पांच जुलाई तक सौंपनी होगी.

पहली बार राज्य की सत्ता संभालने के एक महीने के भीतर ही सरकार के इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं. अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों का सवाल है कि क्या बंगाल सरकार भी पड़ोसी असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार की तर्ज पर अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने का प्रयास कर रही है. असम के मुख्यमंत्री पर लगातार विभिन्न फैसलों के जरिए अल्पसंख्यकों पर निशाना साधने के आरोप लगते रहे हैं. इससे पहले सरकार ने यहां तमाम मदरसों में 'वंदे मातरम' का गायन अनिवार्य कर दिया था. बीजेपी पंद्रह साल तक सत्ता में रही ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप लगाती रही है.

राज्य में फिलहाल वेस्ट बंगाल बोर्ड आफ मदरसा एजुकेशन के तहत 614 सरकारी मान्यता और सहायता-प्राप्त मदरसे हैं. इसके अलावा गैर-मान्यताप्राप्त और निजी संगठनों की ओर से या जकात से चलाए जाने वाले मदरसों की संख्या दो हजार से ज्यादा है. लेकिन इन तमाम मदरसों में सर्वेक्षण का आदेश दिया गया है.

क्या होगा मदरसों के सर्वे में

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि तमाम जिला शासकों को सर्वेक्षण के निर्देश भेज दिए गए हैं. उनको पांच जुलाई तक इसकी रिपोर्ट सौंपनी है. इसके तहत मदरसों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या के अलावा उनको पढ़ाने वाले शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, आधारभूत ढांचा और आर्थिक स्रोत का ब्योरा हासिल किया जाएगा.

लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री खुदीराम टुडू का कहना है कि सरकार ने अवैध मदरसों को बंद कर वहां पढ़ने वाले छात्रों को सरकारी स्कूलों या अनुमोदित मदरसों में स्थानांतरित करने की योजना बनाई है.

मंत्री ने डीडब्ल्यू को बताया, "सर्वेक्षण रिपोर्ट के बाद राज्य में चलने वाले तमाम गैर-अनुमोदित या अवैध मदरसों को बंद कर दिया जाएगा. शिक्षा के नाम पर अवैध गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी. सरकार मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को आधुनिक शिक्षा मुहैया कराना चाहती है ताकि आगे चल कर रोजगार की दौड़ में वो पिछड़े नहीं रहें."

हाल के वर्षों में राज्य के विभिन्न इलाकों में तेजी से बढ़ते मदरसों पर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है. कई बार वहां आतंकवादियों को शरण देने के भी आरोप लगे हैं. इनमें से ज्यादातर मदरसे जकात से चलते हैं. अब अल्पसंख्यक संगठनों को डर है कि यह सर्वेक्षण उनको निशाना बनाने के मकसद से ही शुरू किया गया है.

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कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले के एक मदरसे में पढ़ाने वाले मोहम्मद हफीज (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार जकात से चलने वाले मदरसों में तमाम कमियां निकाल कर उनको किसी तरह बंद करने का प्रयास कर रही हैं. लेकिन हम इसका विरोध करेंगे. इसके लिए कानून की मदद ली जाएगी."

लेकिन मंत्री खुदीराम टुडू कहते हैं, "यह किसी धर्म पर हमला नहीं है. नियमों के मुताबिक चलने वाले मदरसों को सरकार आर्थिक सहायता देगी. वहां शिक्षा के स्तर को सुधारने और आधारभूत सुविधाएं बेहतर बनाने की योजनाएं लागू की जाएंगी."

बीजेपी सरकार ने बीते महीने एक आदेश जारी कर तमाम मदरसों और सरकारी स्कूलों में सुबह वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया था. इस आदेश को लागू करने के लिए तमाम मदरसा प्रमुखों को सुबह-सुबह वीडियो बनाकर अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं. इस पर अल्पसंख्यक संगठनों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. एक संगठन ने इस फैसले के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की है. तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इसे मनमाना फैसला बताते हुए कहा है कि किसी भी धर्म में हस्तक्षेप उचित नहीं है. इससे राज्य का सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हो सकता है.

लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक और मदरसा शिक्षा मंत्री खुदीराम टुडू डीडब्ल्यू से कहते हैं, "जब सरकारी स्कूलों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य हो सकता है तो मदरसों को इससे अलग क्यों रखा जाएगा? सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोप निराधार हैं."

विरोध किस बात पर हो रहा है

कई अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों ने सरकार के ताजा फैसले पर विरोध जताया है. कोलकाता खिलाफत कमेटी के प्रमुख मोहम्मद अशरफ डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार को किसी धर्म पर कोई चीज नहीं थोपनी चाहिए. हम वंदे मातरम के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन इस गीत को गाना हमारे धर्म के खिलाफ है. सरकार को यह फैसला वापस ले लेना चाहिए."

सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार ऐसे फैसलों के जरिए मूल समस्याओं की ओर से लोगों का ध्यान भटकाना चाहती है. वंदे मातरम को अनिवार्य करने और मदरसों के सर्वेक्षण के फैसले से साफ है कि सरकार अल्पसंख्यक तबके को निशाना बनाने की नीति पर आगे बढ़ रही है. स्कूलों में वंदे मारम गाने भर से शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी. इसके लिए मूल समस्याओं को दूर करना जरूरी है."

उनका कहना था कि बंगाल की सत्ता में आने के बाद बीजेपी अपने हिंदुत्व को एजेंडे को आगे बढ़ाने में जुट गई है. सरकार के हाल के फैसले इसका सबूत हैं.

विपक्षी नेताओं का कहना है कि जो मदरसे निजी संस्थाओं की ओर से चल रहे हैं उनमें हस्तक्षेप का सरकार को कोई अधिकार नहीं है.

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक और आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी सरकार ने सत्ता में आते ही इन फैसलों के जरिए अपना एजेंडा साफ कर दिया है. मुसलमानों पर कोई फैसला थोपना गलत है. यह हमारी धार्मिक मान्यता का सवाल है."

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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी असम की तरह यहां भी अल्पसंख्यकों पर निशाना साध रही है. उसे शायद इस बात की खुन्नस है कि ये लोग अब तक तृणमूल कांग्रेस का समर्थन क्यों करते रहे हैं. लेकिन सरकार को किसी तबके के खिलाफ बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए."

लेकिन प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य सरकार के फैसले को सही ठहराते हैं. वो डीडब्ल्यू से कहते हैं, "इसमें गलत क्या है? वंदे मातरम को धार्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. इसका हिंदू-मुस्लिम से कोई संबंध नहीं है."

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बीजेपी ने मदरसों के सर्वेक्षण के फैसले को भी सही ठहराया है. भट्टाचार्य कहते हैं, "सरकार ने मदरसों की मौजूदी स्थिति का पता लगाने के लिए ही सर्वेक्षण का आदेश दिया है. राज्य के कई मदरसों पर पहले सीमा पार के आतंकवादियों को पनाह देने के आरोप लगते रहे हैं. इस सर्वेक्षण का मकसद जमीनी हकीकत का पता लगाना है. सर्वेक्षण की रिपोर्ट के बाद आगे की रणनीति तय करने में मदद मिलेगी."

शिक्षाविदों में सरकार की मंशा पर संदेह है. कोलकाता के एक कॉलेज में प्रोफेसर रहे दिलीप कुमार बाग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "कागज पर तो सरकार की मंशा सही लगती है. लेकिन सत्ता में आने के फौरन बाद मदरसों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई से संदेह स्वाभाविक है. इससे खासकर अल्पसंख्यक संगठनों में डर का माहौल है. उनको लगता है कि सर्वेक्षण के बहाने सरकार मदरसों पर नकेल कसना चाहती है."

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सरकार की मंशा संदेह के घेरे में है. बीजेपी तमाम राज्यों में लंबे समय से अल्पसंख्यकों को निशाना बनाती रही है. वह ममता बनर्जी सरकार को तुष्टिकरण के आरोप में कटघरे में खड़ा करती रही है. अब बंगाल में मदरसों के सर्वेक्षण और उसके आधार पर कार्रवाई की आड़ में पार्टी अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है."


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