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पश्चिम बंगाल: इतिहास से जोड़ने के बहाने नाम बदलने की पहल

बीजेपी सरकार ने इतिहास से जोड़ने के बहाने हर भाषा में पश्चिम बंगाल का नाम 'पश्चिम बंग' करने की दिशा में पहल की है.

पश्चिम बंगाल: इतिहास से जोड़ने के बहाने नाम बदलने की पहल
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पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की कोशिश तो बहुत पहले से ही होती रही है. अब बीजेपी सरकार ने इसे इतिहास से जोड़ने के बहाने हर भाषा में इसका नाम 'पश्चिम बंग' करने की दिशा में पहल की है.

जिस राज्य को अब तक अंग्रेजी में 'वेस्ट बंगाल', बांग्ला में 'पश्चिम बंग' और हिंदी में 'पश्चिम बंगाल' के नाम से जाना जाता है. लेकिन बीती मई में सत्ता संभालने वाली बीजेपी सरकार ने अब हर भाषा में उसका नाम 'पश्चिम बंग' करने की पहल की है. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता में पत्रकारों से कहा, "पश्चिम बंग नाम 1947 के देश विभाजन के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है. सरकार हर भाषा में राज्य का नाम पश्चिम बंग करने के लिए विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश करेगी. पारित होने के बाद उसे केंद्र सरकार की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा."

अधिकारी का कहना था कि पहले की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने राज्य का नाम बदल कर बांग्ला रखने का प्रस्ताव भेजा था. लेकिन नए नाम से बांग्लादेश का भ्रम होने के कारण केंद्र ने उसे मंजूरी नहीं दी थी. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने यहां पत्रकारों को बताया, "प्रस्तावित नाम का मकसद इस राज्य को इसके इतिहास से जोड़ना है. विधानसभा के पहले अधिवेशन के दौरान ही यह प्रस्ताव पेश किया जाएगा."

पहली बार नहीं हुई नाम बदलने की कवायद

पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की यह कवायद कोई पहली बार नहीं शुरू हुई है. पहली बार वर्ष 1999 में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली लेफ्ट फ्रंट सरकार ने भी इसका नाम 'पश्चिम बंग' करने के लिए विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया था. लेकिन केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण वह मामला फाइलों में ही दब कर रह गया था.

उसके बाद लंबे समय तक ऐसी कोई पहल नहीं हुई. इस बीच, वर्ष 2011 में सरकार बदली और ममता बनर्जी सत्ता में आई. उसके बाद ममता बनर्जी ने भी एक बार फिर राज्य का नाम 'पश्चिम बंग' रखने की वकालत की. उनकी दलील थी कि वेस्ट बंगाल के नाम में डब्ल्यू अक्षर होने की वजह से अंग्रेजी वर्णमाला के हिसाब किसी राष्ट्रीय बैठक में उसके प्रतिनिधि को सबसे आखिर में बोलने का मौका मिलता है. लेकिन उनकी कोशिशों के बावजूद केंद्र ने इस मुद्दे को कोई तवज्जो नहीं दी.

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उसके बाद तृणमूल कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2016 में हर भाषा में राज्य का नाम अलग-अलग रखने का प्रस्ताव रखा था. इसके मुताबिक, हिंदी और अंग्रेजी में 'बंगाल या बेंगाल' और बांग्ला भाषा में 'बांग्ला' रखने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा गया. लेकिन केंद्र ने इस पर भी चुप्पी साधे रखी तो दो साल बाद यानी वर्ष 2018 में ममता बनर्जी ने हर भाषा में राज्य का नाम 'बांग्ला' रखने का प्रस्ताव भेजा. लेकिन केंद्र ने इसके लिए संवैधानिक संशोधन करने की दलील दी. दूसरी ओर, बीजेपी के एक गुट की दलील थी कि इससे बांग्लादेश का भ्रम हो सकता है. इस संवैधानिक और राजनीतिक विवाद के कारण यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया.

क्या है बंगाल का इतिहास?

ब्रिटिश शासन के दौरान तत्कालीन बंगाल प्रांत एक प्रमुख राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र के तौर पर उभरा था. वह मौजूदा पश्चिम बंगाल के मुकाबले क्षेत्रफल में काफी बड़ा था. वर्ष 1862 में बंगाल विधान परिषद की स्थापना की गई थी.

उस दौर में भी इस इलाके में बड़े पैमाने पर बदलाव हुए थे. उसी दौरान यह राज्य स्वाधीनता संग्राम, राष्ट्रवाद और क्रांतिकारियों के केंद्र के तौर पर उभरा. तत्कालीन शासकों और खासकर उस समय भारत के वायसराय रहे लार्ड कर्जन ने 'फूट डालो, राज करो' की अपनी नीति के तहत इस लड़ाई को कमजोर करने के लिए वर्ष 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया. लेकिन उसके खिलाफ बड़े पैमाने पर चले आंदोलन के बाद आखिर वर्ष 2011 में ब्रिटिश सरकार को वह फैसला वापस लेना पड़ा. वह आंदोलन इतिहास में 'बंग -भंग आंदोलन' के नाम से दर्ज है.

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राज्य के मौजूदा नाम पश्चिम बंगाल की जड़ें वर्ष 1947 में देश के विभाजन से जुड़ी हैं. देश की आजादी से पहले बंगाल का विभाजन एक अहम राजनीतिक मुद्दा बन गया था. इस प्रांत के भविष्य पर फैसले के लिए मतदान से पहले 20 जून, 1947 को बंगाल विधानसभा के सदस्यों ने लोगों की राय जानने के लिए मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुल इलाकों का प्रतिनिधित्व करने वाले अलग-अलग समूहों के साथ बैठक की.

उसमें गैर-मुस्लिम बहुल इलाके के प्रतिनिधियों ने राज्य के विभाजन और एक अलग प्रांत के गठन के समर्थन में मतदान किया. उसके बाद बंगाल के विभाजन का फैसला किया गया. देश के विभाजन के बाद पूर्वी हिस्से का नाम पूर्वी पाकिस्तान हो गया. वह वर्ष 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद संप्रभु देश बांग्लादेश बना. अखंड बंगाल के पश्चिमी हिस्से में होने के कारण ही इस राज्य का नाम आधिकारिक तौर पर 'पश्चिम बंगाल' पड़ा.

क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का मुद्दा भावनात्मक कम राजनीतिक ज्यादा है. करीब 27 साल पुराना यह मुद्दा पहले भी उठता रहा है और किसी न किसी बहाने इस मांग को खारिज किया जाता रहा है.

राजनीतिक विश्लेषक समीर कुंडू डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हर चीज को हिंदू, राष्ट्रवाद और इतिहास से जोड़ कर देखने-दिखाने की बीजेपी की कोशिश कोई नई नहीं है. कोलकाता समेत राज्य के कई शहरों में कुछ मुस्लिम हस्तियों के नाम वाली सड़कों के नाम पहले ही बदले जा चुके हैं. देर-सबेर यह होना ही था."

एक अन्य विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार झूमा गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, "अगर पश्चिम बंग ही करना था तो पहले की सरकारों ने भी इस आशय के प्रस्ताव भेजे थे. तब से अब तक क्या बदल गया है? सिर्फ यही न कि अब यहां भी बीजेपी सत्ता में आ गई है?"


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