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पश्चिम बंगाल चुनाव: कांग्रेस का अभेद्य किला 'जोड़ासांको' कैसे बना टीएमसी का गढ़? इस बार ऐसे बन रहे समीकरण

अगर आपको लगता है कि पश्चिम बंगाल का जोड़ासांको केवल रवींद्रनाथ टैगोर के पैतृक घर के लिए जाना जाता है, तो आप शायद उस सियासी हलचल से अनजान हैं जो यहां हर चुनाव में मचता है

पश्चिम बंगाल चुनाव: कांग्रेस का अभेद्य किला जोड़ासांको कैसे बना टीएमसी का गढ़? इस बार ऐसे बन रहे समीकरण
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कोलकाता। अगर आपको लगता है कि पश्चिम बंगाल का जोड़ासांको केवल रवींद्रनाथ टैगोर के पैतृक घर के लिए जाना जाता है, तो आप शायद उस सियासी हलचल से अनजान हैं जो यहां हर चुनाव में मचता है। दरअसल, इस क्षेत्र के नाम में ही इसका इतिहास छिपा है। 'जोड़ा' यानी 'युगल' और 'सांको' का अर्थ है 'पुल'। ऐसा कहा जाता है कि कभी यहां एक छोटे नाले पर बांस या लकड़ी के दो पुल हुआ करते थे, और वहीं से इसे यह अनोखा नाम मिला।

यह वही धरती है जहां गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का बचपन बीता, जहां 'ठाकुर बाड़ी' (अब रवींद्र भारती विश्वविद्यालय) की दीवारों में आज भी साहित्य और संगीत गूंजता है। यह वही इलाका है जहां कालीप्रसन्ना सिंह और कृष्णदास पाल जैसे दिग्गजों ने बंगाल को नई दिशा दी। आदि ब्रह्म समाज और ओरिएंटल सेमिनरी जैसे संस्थानों ने इसे बौद्धिक चमक दी, लेकिन जैसे ही आप इतिहास के पन्नों से बाहर निकलकर चुनावी आंकड़ों की दुनिया में कदम रखते हैं, तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।

राजनीतिक रूप से जोड़ासांको कभी कांग्रेस का ऐसा अभेद्य किला था, जिसे भेदना नामुमकिन माना जाता था। आजादी के बाद से कांग्रेस ने यहां 11 बार जीत का परचम लहराया, लेकिन राजनीति में 'हमेशा' शब्द का कोई मोल नहीं होता। 1998 में जब ममता बनर्जी ने अपनी अलग राह चुनी और तृणमूल कांग्रेस (टीएसी) का गठन किया तो जोड़ासांको की फिजाएं भी बदल गईं।

साल 2001 का वह दौर था जब इस सीट ने अपना मिजाज बदला। तब से लेकर आज तक, यानी पिछले पांच विधानसभा चुनावों में यहां 'जोड़ा-फूल' (तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिह्न) ही खिलता आया है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भी यह सिलसिला नहीं टूटा। तृणमूल के उम्मीदवार विवेक गुप्ता ने भारतीय जनता पार्टी की कद्दावर नेता मीना देवी पुरोहित को हराकर यह सीट अपनी झोली में डाली।

लेकिन यह जीत हमेशा आसान नहीं रही। आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि यहां जीत का अंतर कभी-कभी सांसें रोक देने वाला रहा है। 2001 में जीत का अंतर मात्र 778 वोट था और 2006 में 819 वोट। यह दर्शाता है कि जोड़ासांको की जनता अपने प्रतिनिधियों को बहुत तौल-मोल कर चुनती है।

जोड़ासांको की सबसे दिलचस्प कहानी इसके वोटिंग पैटर्न में छिपी है, जो किसी सियासी थ्रिलर से कम नहीं है। यहां का वोटर विधानसभा चुनाव में अलग सोचता है और लोकसभा चुनाव में बिल्कुल अलग। इसे आप 'वोटर का दोहरा मापदंड' कहें या समझदारी, लेकिन आंकड़े चौंकाने वाले हैं।

भले ही यह सीट तृणमूल का गढ़ मानी जाती है, लेकिन पिछले तीन लोकसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) के आंकड़ों को देखें, तो इस विधानसभा क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस अक्सर भाजपा से पिछड़ती दिखाई दी है।

2014 में भाजपा को यहां 16,482 वोटों की बढ़त मिली थी। 2019 में यह अंतर कम होकर 3,882 रह गया। 2024 में यह अंतर फिर से लगभग 7,401 के आसपास देखा गया।

यह सीट कोलकाता उत्तर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, जहां से तृणमूल जीतती आ रही है, लेकिन जोड़ासांको विधानसभा सेगमेंट अक्सर भाजपा के पक्ष में झुकता है। यह संकेत देता है कि यहां के गैर-बंगाली और व्यापारी वर्ग का झुकाव राष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा की तरफ होता है, जबकि स्थानीय मुद्दों पर वे ममता बनर्जी पर भरोसा जताते हैं।

जोड़ासांको पूरी तरह से शहरी क्षेत्र है। कोलकाता नगर निगम के 11 वार्डों को समेटे हुए हैं। चित्तरंजन एवेन्यू, कॉलेज स्ट्रीट और बड़ाबाजार जैसे व्यस्त इलाकों से यह क्षेत्र घिरा हुआ है।

इस सीट की बनावट बड़ी पेचीदा है। यहां मारवाड़ी समुदाय, हिंदी भाषी लोग और पुराने बंगाली परिवारों का एक अनूठा मिश्रण है। रवींद्र सरानी (पुरानी चितपुर रोड) के किनारे बसा यह इलाका व्यापार का केंद्र है। यहां की तंग गलियों में करोड़ों का कारोबार होता है।

अब सबकी निगाहें इस साल होने वाली विधानसभा चुनावों पर टिकी हैं। क्या तृणमूल कांग्रेस अपनी अजेय बढ़त बनाए रख पाएगी? या भाजपा, जो लोकसभा चुनावों में यहां अपना दम दिखाती है, विधानसभा में भी सेंध लगा पाएगी?


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