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शेख हसीना के बेटे साजिब वाजेद जाय ने कहा, बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी का प्रभाव भारत की पूर्वी सीमा की सुरक्षा के लिए बेहद चिंता का विषय

साजिब वाजेद जाय कोलकाता में भाजपा से संबद्ध सांस्कृतिक मंच ‘खोला हवा’ द्वारा आयोजित एक पुस्तक विमोचन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। अपने लगभग आधे घंटे के भाषण में उन्होंने जुलाई 2024 के आंदोलन, कोटा सुधार विवाद और अवामी लीग सरकार के पतन पर विस्तार से बात की।

शेख हसीना के बेटे साजिब वाजेद जाय ने कहा, बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी का प्रभाव भारत की पूर्वी सीमा की सुरक्षा के लिए बेहद चिंता का विषय
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कोलकाता : बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे साजिब वाजेद जाय ने सोमवार को कोलकाता में एक वर्चुअल संबोधन के दौरान बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और आगामी चुनावों को लेकर कई अहम दावे किए। उन्होंने कहा कि चाहे बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) सत्ता में आए या नहीं, जमात-ए-इस्लामी पर्दे के पीछे से अपना प्रभाव बनाए रखेगी। जाय के अनुसार, यदि बीएनपी सत्ता में आती है तो वह अमेरिका के प्रभाव में काम करेगी, जिससे जमात-ए-इस्लामी को अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा। उन्होंने इसे भारत की पूर्वी सीमा की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय से चुनाव की निंदा की मांग

अपने संबोधन में जाय ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे बांग्लादेश में होने वाले चुनावों की निंदा करें। उनका आरोप था कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान अंतरिम सरकार को धार्मिक चरमपंथियों का समर्थन प्राप्त है और दोनों के बीच आपसी समझ है। उनके मुताबिक, यह गठजोड़ देश के लोकतांत्रिक ढांचे और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है।

भाजपा से जुड़े मंच के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता

साजिब वाजेद जाय कोलकाता में भाजपा से संबद्ध सांस्कृतिक मंच ‘खोला हवा’ द्वारा आयोजित एक पुस्तक विमोचन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। अपने लगभग आधे घंटे के भाषण में उन्होंने जुलाई 2024 के आंदोलन, कोटा सुधार विवाद और अवामी लीग सरकार के पतन पर विस्तार से बात की। उन्होंने बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति के साथ-साथ उसके क्षेत्रीय प्रभावों पर भी प्रकाश डाला, खासकर भारत-बांग्लादेश संबंधों के संदर्भ में।

जुलाई 2024 आंदोलन पर प्रतिक्रिया

जाय ने 2024 के जुलाई आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और मौतों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। उन्होंने कहा कि उस दौरान छात्रों और आम नागरिकों की मौत हुई, जो दुखद है। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि आंदोलन के बाद कई पुलिसकर्मी और अवामी लीग के कार्यकर्ता भी मारे गए थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की मंशा किसी की जान लेने की नहीं थी। उनके अनुसार, हिंसा की शुरुआत सरकार ने नहीं बल्कि उग्र तत्वों ने की थी। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि “उग्रवादी” शब्द से उनका आशय प्रदर्शनकारी छात्रों से नहीं है।

कोटा सुधार आंदोलन और सरकार की भूमिका

अपने भाषण में जाय ने कहा कि कोटा सुधार कार्यकर्ताओं की मांगें जायज थीं। उन्होंने बताया कि अवामी लीग सरकार ने पहले ही कोटा व्यवस्था समाप्त कर दी थी, लेकिन बाद में अदालत के आदेश पर इसे बहाल करना पड़ा। उन्होंने स्वीकार किया कि सरकार ने इस मुद्दे को अदालत पर छोड़ दिया, जो एक राजनीतिक चूक थी। यही कोटा सुधार आंदोलन बाद में भेदभाव विरोधी छात्र आंदोलन में बदल गया और व्यापक जनसमर्थन के साथ सरकार विरोधी आंदोलन का रूप ले लिया। विश्लेषकों का मानना है कि इसी आंदोलन ने अंततः शेख हसीना सरकार के पतन की पृष्ठभूमि तैयार की।

अंतरिम सरकार और चरमपंथ का आरोप

जाय ने मौजूदा अंतरिम सरकार पर आरोप लगाया कि उसे धार्मिक चरमपंथी समूहों का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने दावा किया कि ये समूह सीधे तौर पर आंदोलन का चेहरा नहीं थे, बल्कि पर्दे के पीछे से गतिविधियों का संचालन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इस तरह की राजनीतिक स्थिति से बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों को मजबूती मिल सकती है, जिसका असर न केवल देश के भीतर बल्कि पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा।

भारत की सुरक्षा को लेकर चिंता

अपने संबोधन में जाय ने विशेष रूप से भारत की पूर्वी सीमा की सुरक्षा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि जमात-ए-इस्लामी और पाकिस्तान समर्थित तत्वों को खुली छूट मिलती है तो यह भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकता है। उनके मुताबिक, बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा का सीधा असर भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ेगा। उन्होंने संकेत दिया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस स्थिति को गंभीरता से लेना चाहिए।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और आगे की स्थिति

बांग्लादेश में 2024 के आंदोलन के बाद से राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। छात्र आंदोलन से शुरू हुआ विरोध व्यापक सरकार-विरोधी अभियान में बदल गया था। उस दौरान पुलिस कार्रवाई और हिंसा को लेकर अवामी लीग सरकार की आलोचना भी हुई। अब जब देश चुनावी प्रक्रिया की ओर बढ़ रहा है, तब राजनीतिक ध्रुवीकरण और भी स्पष्ट होता जा रहा है। जाय के बयान को अवामी लीग के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है, जबकि विपक्षी दल इन आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बता सकते हैं। फिलहाल बांग्लादेश की राजनीति एक संवेदनशील मोड़ पर है। आने वाले चुनाव और अंतरिम सरकार की भूमिका देश की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकते हैं।


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