सिंदूर लगाने पर रूपा गांगुली का बेबाक जवाब, नुसरत जहां बोलीं- त्योहार मनाना निजी पसंद
सोनारपुर दक्षिण से भाजपा विधायक रूपा गांगुली ने एक साक्षात्कार में सिंदूर लगाने को लेकर उठने वाले सवालों पर अपनी बात रखी। उन्होंने उस सामाजिक धारणा पर सवाल उठाया, जिसके अनुसार पति की मृत्यु के बाद किसी महिला को सिंदूर नहीं लगाना चाहिए

कोलकाता: बंगाल की राजनीति और मनोरंजन जगत से जुड़ी दो चर्चित हस्तियों रूपा गांगुली और नुसरत जहां ने महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक परंपराओं को लेकर उठने वाले सवालों पर अपना पक्ष रखा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विधायक और अभिनेत्री रूपा गांगुली ने सिंदूर लगाने को लेकर होने वाली आलोचना पर दोटूक जवाब दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिंदूर लगाना उनकी निजी पसंद है और इसके लिए उन्हें किसी को सफाई देने की जरूरत नहीं है। वहीं, बंगाली अभिनेत्री नुसरत जहां ने दुर्गापूजा के दौरान सिंदूर खेला में शामिल होने पर सोशल मीडिया पर हुई आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि त्योहार मनाना हर व्यक्ति का व्यक्तिगत फैसला है। दोनों अभिनेत्रियों के बयानों ने महिलाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक सोच को लेकर एक बार फिर चर्चा छेड़ दी है।
रूपा गांगुली बोलीं- सिंदूर लगाना मेरी अपनी पसंद
सोनारपुर दक्षिण से भाजपा विधायक रूपा गांगुली ने एक साक्षात्कार में सिंदूर लगाने को लेकर उठने वाले सवालों पर अपनी बात रखी। उन्होंने उस सामाजिक धारणा पर सवाल उठाया, जिसके अनुसार पति की मृत्यु के बाद किसी महिला को सिंदूर नहीं लगाना चाहिए। रूपा ने साफ कहा कि वह सिंदूर क्यों लगाती हैं और किसके लिए लगाती हैं, इसका जवाब देना उनकी जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने बताया कि वह कुरुक्षेत्र से मां भद्रकाली के नाम का सिंदूर लेकर आई थीं और उसी का इस्तेमाल करती हैं। उनके मुताबिक, सिंदूर लगाने का फैसला उनकी व्यक्तिगत आस्था और पसंद से जुड़ा है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि उन्हें सिंदूर लगाना चाहिए या नहीं। रूपा गांगुली का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारंपरिक सामाजिक मान्यताओं को लेकर लगातार बहस होती रहती है। उनका रुख इस बात पर जोर देता है कि किसी महिला की पसंद को केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए।
ध्रुव मुखोपाध्याय से हुई थी शादी
रूपा गांगुली के निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने वर्ष 1992 में मैकेनिकल इंजीनियर ध्रुव मुखोपाध्याय से शादी की थी। हालांकि, उनका वैवाहिक जीवन लंबे समय तक नहीं चल सका और वर्ष 2007 में दोनों का तलाक हो गया। रूपा पहले भी अपने वैवाहिक जीवन से जुड़े अनुभव साझा कर चुकी हैं। उन्होंने बताया था कि परिवार और गृहस्थी को बचाए रखने के लिए उन्होंने अपने अभिनय करियर के साथ भी समझौता किया था। वह शूटिंग का समय इस तरह तय करने की कोशिश करती थीं कि उन्हें सुबह नौ बजे से पहले और रात दस बजे के बाद काम न करना पड़े। इसके बावजूद उनका वैवाहिक रिश्ता कायम नहीं रह सका। उनके ताजा बयान ने एक बार फिर इस सवाल को चर्चा में ला दिया है कि किसी महिला की व्यक्तिगत पसंद को समाज की पारंपरिक अपेक्षाओं के आधार पर क्यों तय किया जाना चाहिए।
सिंदूर खेला को लेकर नुसरत जहां भी हुईं ट्रोल
बंगाली अभिनेत्री और पूर्व सांसद नुसरत जहां भी धार्मिक पहचान और त्योहारों को लेकर होने वाली ऑनलाइन आलोचना का सामना कर चुकी हैं। दुर्गापूजा के दौरान दशमी पर सिंदूर खेला में शामिल होने के बाद उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आई थीं। इन तस्वीरों में वह लाल किनारे वाली सफेद साड़ी पहने और मांग में सिंदूर लगाए नजर आईं। इसके बाद इंटरनेट मीडिया पर उनकी धार्मिक पहचान को लेकर सवाल उठाए गए। नुसरत ने आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि त्योहार सभी के लिए होते हैं और उन्हें मनाना व्यक्ति की अपनी पसंद है। उन्होंने आलोचकों को संदेश दिया कि उन्हें अपनी खुशी के लिए जीना चाहिए और दूसरों को भी ऐसा करने देना चाहिए। अभिनेत्री ने यह भी बताया कि वह अपने घर में जन्माष्टमी, शिवरात्रि और दीपावली जैसे त्योहार मनाती हैं। उनके अनुसार, किसी त्योहार में शामिल होने या किसी परंपरा का पालन करने के फैसले को लेकर दूसरों को सवाल खड़े नहीं करने चाहिए।
व्यक्तिगत पसंद बनाम सामाजिक मान्यताएं
रूपा गांगुली और नुसरत जहां के बयान भले ही अलग-अलग संदर्भों में आए हों, लेकिन दोनों का मुख्य संदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है। रूपा ने सिंदूर लगाने को लेकर प्रचलित सामाजिक सोच पर सवाल उठाए, जबकि नुसरत ने धार्मिक पहचान के आधार पर त्योहार मनाने के अधिकार का बचाव किया। इन बयानों ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि परंपराओं का पालन करना या उनमें बदलाव करना किसी व्यक्ति का निजी निर्णय होना चाहिए। दोनों अभिनेत्रियों का कहना है कि किसी महिला की पसंद, आस्था और जीवनशैली को लेकर फैसला सुनाने के बजाय उसकी स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।


