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बंगाल चुनाव : जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था से बंपर वोटिंग, 'भद्रलोक' ने 'सोनार बांग्ला' की दिखाई राह

एक वक्त था, जब पश्चिम बंगाल में चुनाव कराना किसी युद्ध लड़ने के जैसा था। ऐसा हम नहीं राज्य के आंकड़े बताते हैं। अगर 2021 की बात करें तो उस साल विधानसभा चुनाव को आठ चरणों में संपन्न कराया गया था

बंगाल चुनाव : जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था से बंपर वोटिंग, भद्रलोक ने सोनार बांग्ला की दिखाई राह
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कोलकाता। एक वक्त था, जब पश्चिम बंगाल में चुनाव कराना किसी युद्ध लड़ने के जैसा था। ऐसा हम नहीं राज्य के आंकड़े बताते हैं। अगर 2021 की बात करें तो उस साल विधानसभा चुनाव को आठ चरणों में संपन्न कराया गया था। इसके बावजूद कई जगहों पर जोरदार हिंसा हुई थी। यहां तक कि मतदान के समापन की ओर बढ़ते-बढ़ते शीतलकुची में फायरिंग की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए थे।

पिछले कई चुनावों और राजनीतिक हिंसा के पैटर्न का अध्ययन चुनाव आयोग ने किया और इसका नतीजा इस बार के चुनाव में सामने आया। जब दो चरणों में ही 294 सीटों पर मतदान संपन्न हो गया और हिंसा की छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो बंपर वोटिंग के बीच 'भद्रलोक' ने 'सोनार बांग्ला' की राह दिखा दी।

इस बार के विधानसभा चुनाव के दौरान आसनसोल दक्षिण में भाजपा प्रत्याशी अग्निमित्रा पॉल की कार पर पथराव, मुर्शिदाबाद में दो दलों के समर्थकों के बीच झड़प और दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज में भाजपा प्रत्याशी शुभेंदु सरकार के साथ हाथापाई जैसी घटनाएं जरूर हुईं, लेकिन इन सबके बावजूद चुनाव की समग्र तस्वीर पर इनका असर नहीं पड़ा। लंबे समय बाद पश्चिम बंगाल ऐसे चुनाव का गवाह बना, जिससे लोकतंत्र की जड़ें न सिर्फ गहरी हुई हैं, बल्कि आम जनता चुनाव आयोग की तैयारियों को भी सलाम करती दिखीं।

इस बदली हुई तस्वीर के पीछे सबसे बड़ा कारण मतदाताओं के मन से डर का खत्म होना रहा। लोगों का साफ कहना था कि चुनाव आयोग की सख्ती और केंद्रीय बलों की भारी मौजूदगी ने माहौल बदल दिया है। पहले जहां बूथ तक पहुंचना भी जोखिम भरा माना जाता था, वहीं इस बार युवा और महिलाएं बड़ी संख्या में मतदान करने के लिए बाहर निकले। इस बदले हुए विश्वास ने ही रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत से देश-दुनिया को दिखा दिया कि लोकतंत्र में भागीदारी तब बढ़ती है, जब सुरक्षा की गारंटी मजबूत होती है।

चुनाव आयोग की रणनीति इस बार पूरी तरह आक्रामक, संतुलित और नियंत्रित रही। चुनाव की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने भरोसा जताया था कि चुनाव हिंसा मुक्त होंगे, वह हकीकत में दिखा। चुनाव की घोषणा के साथ ही प्रशासनिक ढांचे में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए। मुख्य सचिव और डीजीपी से लेकर थानेदार स्तर तक तबादले किए गए और कई जगहों पर मतदान से ठीक पहले अधिकारियों को बदला गया। इन फैसलों को लेकर राजनीतिक विवाद भी हुआ, प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन तबादलों को लेकर आयोग पर हमलावर रहीं। उन्होंने कई बार यह भी कहा कि राज्य की पुलिस भी अब उनके नियंत्रण में नहीं रह गई है। लेकिन, इन सबके बीच आयोग की सख्ती ने चुनावी प्रक्रिया को एक अलग दिशा दे दी।

कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार और कई विधानसभा चुनाव को कवर कर चुके विकास कुमार गुप्ता भी चुनाव आयोग की भूमिका की सराहना करते हैं। उनके मुताबिक, "पश्चिम बंगाल में दोनों चरणों में शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुए चुनाव का पूरा श्रेय चुनाव आयोग को जाता है। चुनाव के तीन महीने पहले से ही ग्राउंड स्तर पर हर समस्या का गहरा अध्ययन किया गया, एवं इसके समाधान की रूपरेखा तैयार कर चुनाव आयोग ने इसपर बारीकी से काम कर अंतत: हर क्षेत्र में सख्त कदम उठाते हुए उम्मीद से ज्यादा केंद्रीय बलों को गली-मोहल्लों तक तैनात करने के साथ सीसीटीवी कैमरे से हर गतिविधि पर नजर रखी। यही कारण रहा कि इस बार चुनाव को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने में बेहतरीन सफलता मिली है।"

सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से यह चुनाव अभूतपूर्व रहा। इस बार 2,400 कंपनियों की तैनाती के साथ करीब 2.4 लाख केंद्रीय सुरक्षाकर्मी मैदान में उतारे गए। भारी सुरक्षा बल जमीनी स्तर पर हिंसा को रोकने में सबसे निर्णायक साबित हुए। संवेदनशील इलाकों में केंद्रीय बलों की लगातार निगरानी ने किसी भी बड़े टकराव को पनपने का मौका ही नहीं दिया। संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रीय बलों की तैनाती का आदेश दिया गया था, जिससे कानून-व्यवस्था को मजबूत आधार मिला। दूसरी ओर, डिजिटल निगरानी और रिपोर्टिंग ने भी बड़ा रोल निभाया। सोशल मीडिया और आधुनिक संचार माध्यमों के जरिए स्थानीय लोग अब घटनाओं को तुरंत रिकॉर्ड और रिपोर्ट कर पा रहे थे, जिससे हिंसा फैलाने वालों पर कार्रवाई पहले से कहीं ज्यादा और तुरंत होती दिखी।

अगर इतिहास पर नजर डालें तो यह बदलाव और भी बड़ा नजर आता है। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा की जड़ें 70 के दशक तक जाती हैं, जब वामपंथी राजनीति उभर रही थी। 80 और 90 के दशक में कांग्रेस और लेफ्ट के बीच भी जमकर हिंसा हुई। तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने विधानसभा में आंकड़े पेश करते हुए बताया था कि 1988-89 के बीच राजनीतिक हिंसा में 80 से ज्यादा कार्यकर्ताओं की मौत हुई थी। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के उभार के साथ यह हिंसा और तेज हुई।

2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद भी हिंसा का सिलसिला नहीं थमा और 2021 के विधानसभा चुनाव में 25 लोगों की मौत और 800 से ज्यादा लोग घायल हुए। हालांकि, उस चुनाव में भाजपा ने आरोप लगाया था कि मृतकों की संख्या आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा हैं। चुनाव के बाद हिंसा के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने असम का रुख किया था और राहत कैंपों में रहने को मजबूर हुए थे। यहां तक कि तत्कालीन गवर्नर जगदीप धनखड़ ने भी राहत कैंपों में जाकर लोगों से मुलाकात की थी और हिंसा का पुरजोर तरीके से विरोध किया था।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े भी इस धारणा को मजबूत करते रहे हैं कि चुनावी हिंसा के मामले में पश्चिम बंगाल लंबे समय तक सबसे आगे रहा है। धीरे-धीरे यह धारणा बन गई थी कि यहां चुनाव सिर्फ वोटिंग नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व और शक्ति प्रदर्शन बन चुके हैं। लेकिन 2026 के चुनाव ने इस धारणा को निर्णायक तरीके से खत्म कर दिया है। इस बार के शांतिपूर्ण चुनाव को देखकर दावे के साथ यह कहा जा सकता है कि अगर संस्थाएं मजबूत हों, प्रशासनिक इच्छाशक्ति दृढ़ हो और सुरक्षा व्यवस्था सख्त हो, तो लोकतंत्र शांतिपूर्वक चल सकता है। पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में यह दिखा दिया कि ‘हिंसा’ उसकी नियति नहीं है। अगर सिस्टम चाहे, तो कहानी बदली जा सकती है।


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