बंगाल में बीजेपी की जीत के बीच वाम खेमे में जश्न- ‘हार में भी उम्मीद’ की नई कहानी
माकपा नेता हनन मोल्ला ने चुनाव परिणामों को पार्टी के लिए एक नए चरण की शुरुआत बताया। उन्होंने कहा कि “इन नतीजों के बाद बंगाल में हमारे बुरे दिन खत्म हो गए हैं, हालांकि अच्छे दिन आना अभी बाकी हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में वामपंथी कार्यकर्ताओं को भारी दमन का सामना करना पड़ा।

कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रचंड जीत ने राज्य की राजनीति को नया मोड़ दिया है। लेकिन इस जीत के साथ एक दिलचस्प तस्वीर भी सामने आई—वामपंथी दलों, खासकर माकपा (CPI-M) के कार्यकर्ताओं के बीच जश्न का माहौल। यह जश्न सीधे तौर पर चुनावी सफलता का नहीं, बल्कि राजनीतिक परिदृश्य में संभावित बदलाव और नए अवसरों का संकेत माना जा रहा है।
एक सीट के बावजूद जश्न क्यों?
चुनाव में माकपा को महज एक सीट पर जीत मिली, जो संख्या के लिहाज से बेहद सीमित है। इसके बावजूद कोलकाता से लेकर राज्य के विभिन्न जिलों तक पार्टी कार्यालयों में कार्यकर्ताओं की भीड़, नारेबाजी और उत्साह देखने को मिला। जैसे-जैसे चुनावी रुझान बीजेपी के पक्ष में जाते दिखे और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थिति कमजोर होती नजर आई, वाम खेमे में हलचल बढ़ती गई। पार्टी के लिए यह जश्न सीटों का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक माहौल के बदलने का प्रतीक है, जिसमें पिछले एक दशक से वाम दल लगभग हाशिए पर चले गए थे।
‘बुरे दिन खत्म हुए’—माकपा नेताओं का दावा
माकपा नेता हनन मोल्ला ने चुनाव परिणामों को पार्टी के लिए एक नए चरण की शुरुआत बताया। उन्होंने कहा कि “इन नतीजों के बाद बंगाल में हमारे बुरे दिन खत्म हो गए हैं, हालांकि अच्छे दिन आना अभी बाकी हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में वामपंथी कार्यकर्ताओं को भारी दमन का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, “एक हजार से ज्यादा कार्यकर्ताओं की जान गई, करीब एक लाख लोगों पर झूठे केस दर्ज हुए और सैकड़ों पार्टी कार्यालयों पर कब्जा किया गया।” हनन मोल्ला का कहना है कि अब राजनीतिक माहौल बदल रहा है और पार्टी कार्यकर्ता दोबारा जनता के बीच जाकर संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
‘आतंक का माहौल खत्म हो रहा है’
माकपा नेताओं का मानना है कि पिछले वर्षों में बना भय और दबाव का माहौल अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। उनका कहना है कि अब कार्यकर्ता खुलकर सक्रिय हो पा रहे हैं और जनता से संवाद स्थापित कर रहे हैं। उनके मुताबिक, “यह शुरुआत है। हम फिर से खड़े हो रहे हैं और आगे बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।” इस बयान से यह साफ होता है कि पार्टी चुनावी हार के बावजूद खुद को पुनर्गठित करने के मूड में है।
ध्रुवीकरण के बीच वामपंथ की जगह
पिछले एक दशक में पश्चिम बंगाल की राजनीति मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सिमट गई थी। इस द्विध्रुवीय राजनीति में वाम दलों की भूमिका काफी सीमित हो गई थी। हालांकि, इस बार के चुनावी नतीजों ने संकेत दिया है कि इस ध्रुवीकरण में दरार आ सकती है। तृणमूल की कमजोरी और भाजपा के उभार के बीच वामपंथ अपने लिए नई राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रहा है। एक वरिष्ठ वाम नेता ने कहा कि “यह जश्न किसी की हार या जीत का नहीं, बल्कि उस धारणा के टूटने का है कि वाम राजनीति खत्म हो गई है।”
वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी से उम्मीद
माकपा की वरिष्ठ नेता वृंदा करात ने भी चुनाव परिणामों को पूरी तरह निराशाजनक मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि भले ही सीटें कम मिली हों, लेकिन कई क्षेत्रों में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा है, जो एक सकारात्मक संकेत है। उन्होंने कहा कि “TMC और BJP के बीच भारी ध्रुवीकरण और संसाधनों की असमानता के बावजूद हमने अपना जनाधार बनाए रखा है। यह हमारे लिए आगे बढ़ने का आधार बनेगा।” वृंदा करात ने यह भी आरोप लगाया कि 2011 के बाद से वाम दलों को लगातार निशाना बनाया गया, लेकिन इसके बावजूद उनका अस्तित्व खत्म नहीं हुआ है।
रणनीति और संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि माकपा का यह उत्साह केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। भाजपा की जीत और तृणमूल की हार—दोनों ही परिस्थितियां वाम दलों के लिए नई संभावनाएं खोल सकती हैं। सत्ता परिवर्तन के बाद विपक्ष की भूमिका में वाम दल खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश करेंगे। इसके लिए वे संगठन को मजबूत करने और जनता के मुद्दों पर सक्रिय होने की रणनीति अपना सकते हैं।


