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वंदे मातरम अनिवार्य करने और यूसीसी पर एआईएमपीएलबी का विरोध, देशव्यापी अभियान की घोषणा

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य डॉ. एसक्यूआर इलियास ने पश्चिम बंगाल में स्कूलों और मदरसों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान 'वंदे मातरम' अनिवार्य करने, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और अल्पसंख्यक मामलों तथा मदरसा शिक्षा विभाग के बजट में कथित कटौती जैसे मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दी

वंदे मातरम अनिवार्य करने और यूसीसी पर एआईएमपीएलबी का विरोध, देशव्यापी अभियान की घोषणा
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कोलकाता। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य डॉ. एसक्यूआर इलियास ने पश्चिम बंगाल में स्कूलों और मदरसों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान 'वंदे मातरम' अनिवार्य करने, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और अल्पसंख्यक मामलों तथा मदरसा शिक्षा विभाग के बजट में कथित कटौती जैसे मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले एक दशक से मुस्लिम समुदाय को विभिन्न स्तरों पर निशाना बनाया जा रहा है और इन मुद्दों के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड देशव्यापी जनजागरण अभियान शुरू करेगा।

डॉ. इलियास ने कहा कि मुस्लिम समुदाय की जानमाल, धार्मिक आस्था, मस्जिदों, मदरसों और बस्तियों को लेकर लगातार दबाव की स्थिति बनाई जा रही है। अब वंदे मातरम और यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों को भी मुस्लिम समाज पर थोपने का प्रयास किया जा रहा है। इसी कारण मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने देशव्यापी अभियान चलाने का निर्णय लिया है, जिसका उद्देश्य उन लोगों तक पहुंचना है जो देश में न्याय, शांति और सौहार्द चाहते हैं। बोर्ड ऐसे लोगों से अपील करेगा कि वे इन मुद्दों पर चुप न रहें और अपनी आवाज उठाएं।

उन्होंने कहा कि यूसीसी सरकार का कोई अनिवार्य संवैधानिक दायित्व नहीं है, बल्कि संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में दी गई एक सिफारिश है। यूसीसी की अवधारणा केंद्र सरकार से जुड़ी है, जबकि विभिन्न राज्यों में जिस रूप में इसे लागू करने की चर्चा हो रही है, वह वास्तव में यूनिफॉर्म नहीं है। यदि कुछ वर्गों और समुदायों को इससे छूट दी जाती है, तो फिर इसे समान नागरिक संहिता नहीं कहा जा सकता। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है और मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान और सुन्नत पर आधारित है। ऐसे में उसमें हस्तक्षेप को मुस्लिम समाज अपनी धार्मिक स्वतंत्रता में दखल मानता है।

वंदे मातरम को अनिवार्य किए जाने के मुद्दे पर डॉ. इलियास ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को जन गण मन से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने 1986 में आए एक सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि कोई गीत या प्रार्थना उसकी धार्मिक मान्यताओं से टकराती है, तो वह सम्मानपूर्वक खड़ा होकर मौन रह सकता है। वंदे मातरम में कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें मुस्लिम समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं मानता, इसलिए इसे अनिवार्य बनाना उचित नहीं होगा। यही उनकी मूल आपत्ति है।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मुस्लिम मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने की मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी की अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. इलियास ने स्पष्ट कहा कि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का मुद्दा नहीं है। बोर्ड राजनीतिक विषयों पर कोई पक्ष नहीं लेता और इस मामले में भी उसका कोई आधिकारिक रुख नहीं है।

पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग के लिए राशि में कथित कमी के सवाल पर डॉ. इलियास ने कहा कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, बंगाल के मुसलमान देश के सबसे कमजोर और पिछड़े मुस्लिम समुदायों में शामिल हैं। यदि किसी सरकार द्वारा केवल राजनीतिक या वैचारिक कारणों से अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाएं कम की जाती हैं, तो यह उचित नहीं है। सरकारी धन किसी एक समुदाय का नहीं बल्कि सभी करदाताओं का है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए विशेष योजनाएं और सुविधाएं दी जा सकती हैं, तो मुस्लिम समुदाय को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती क्यों की जा रही है।


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