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दीवार

आशीष स्थानीय मिडिल स्कूल में अध्यापक था। हालाकि उसने इतिहास एम.ए.(प्रथम श्रेणी)में पास किया था,लेकिन सशक्त 'पहुंच' न होने के कारण हाईस्कूल में व्याख्याता पद के लिए योग्य नहीं समझा गया

दीवार
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- बसन्त राघव

वह एक संयुक्त परिवार था, लेकिन जब आशीष की शादी हुई, परिवार विघटन के कगार पर जा खड़ा हुआ। पहले विभाजन स्थूल न होकर सूक्ष्म था। विचार वैषम्य की दीवार उठने लगी,जो दिखाई नहीं पड़ती थी- महसूस की जाती थी।

आशीष स्थानीय मिडिल स्कूल में अध्यापक था। हालाकि उसने इतिहास एम.ए.(प्रथम श्रेणी)में पास किया था,लेकिन सशक्त 'पहुंच' न होने के कारण हाईस्कूल में व्याख्याता पद के लिए योग्य नहीं समझा गया। तथापि वह अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट था। बजाय इसके कि वह किसी नेता या विधायक की चिरौरी करता, वह निम्न श्रेणी शिक्षक बने रहना ही श्रेयस्कर समझा।

आशीष के पिता श्याम पंडा आठ एकड़ जमीन के कास्तकार थे। महंगाई के जमाने में आठ एकड़ जमीन जो असिंचित हो,जरूरत की अधिकांश चीजें जुटा नहीं सकती।
आशीष की पत्नी मधु पढ़ी लिखी थी। बड़े शहर की लड़की थी- क़रीने से रहना चाहती थी। कपड़ों की शौकीन थी,परन्तु अक्सर उसका यह शौक पूरा नहीं हो पाता था। वह अपने घर को सजा - संवार कर रखना चाहती थी। वह कभी - कभी अपमानित महसूस करती ,जब घर में उसको 'पराए घर की' समझा जाता । आम बहुओं की तरह वह अलग गृहस्थी बसाने के चक्कर में नहीं रहती। वह फिजूल खर्ची भी नहीं थी, अपनी सीमाओं के भीतर रहकर वह खुश और संतुष्ट रहना चाहती थी। ऐसी स्थिति में जब कोई उसका प्रतिवाद करता तो वह सहन नहीं कर पाती थी। उसे लगता जैसे उसके विचारों को कोई महत्व नहीं दिया जा रहा है।

आशीष की माँ पुराने विचारों की स्त्री थी। नए जमाने की हवा में उसकी सांसे घुटने लगतीं। पूर्वाग्रह और रुढ़ियों में उसका पूरा जीवन बीता था। नए विचार उसे ढकोसले और फालतू लगते। फिर भी वह तोड़ फोड़ नहीं चाहती थी। घर में सुख शांति बनी रहे, इसके लिए वह बराबर देवी -देवताओं से मनौतियां मांगती रहती।
कलह - क्लेश से वह दूर रहना पसंद करती थी, फिर भी जब छोटी- छोटी बातों को लेकर बखेड़ा खड़ा हो जाता तब समझ नहीं पाती, ऐसा क्यों हुआ?। जबकि वह निर्दोष है। अक्सर वह दूसरों में छिद्रान्वेषण करती।

श्याम पंडा एक तरह से पुराने और नए के मध्य सेतु का कार्य करते थे। परन्तु जब नए और पुराने जीवनमूल्यों और आदर्शों के बीच टकराव होता, वह निर्लिप्त एवं तटस्थ नहीं रह पाते थे। नए विचारों के पोषक होते हुए भी, यथोचित कद्र नहीं कर पाते थे।

उस दिन,आशीष की बहन सुजाता को देखने के लिए कुछ लोग आए हुए थे। लड़का बी.ए. था और आशीष का पूर्व परिचित भी था। आधुनिक कृषि की उसमें अच्छी समझ थी। आशीष ने ही उन लोगों को आमंत्रित किया था। उनकी खातिरदारी में किसी प्रकार की कमी नहीं रहने दी,उसने। जी खोलकर सेवा सत्कार किया जा रहा था। माँ ने टोक ही दिया-

'आशीष ,थोड़ा हाथ रोककर खर्च करो.....। रोज कहीं न कहीं से लड़के वाले आते हैं, खा - पीकर चले जाते हैं। जाने के बाद एक फोन करना भी जरूरी नहीं समझते। लड़की थोड़ी सांवली क्या हो गई इन लोगों को पसंद ही नहीं आती..... इन्हें अप्सरा चाहिए।

आशीष को माँ की यह बात अच्छी नहीं लगी, बोला- 'जानता हूँ माँ , ऐसे मौके में तुम्हें टोकने की आदत है। परन्तु मेहमानों की ठीक से खातिरदारी न करने का परिणाम तो जानती हो न? माँ , मैं कहे देता हूँ- इन लोगों को किसी भी प्रकार की कमी महसूस न हो- यह मैं बर्दाश्त नहीं करुंगा......। लड़का सुंदर है, पढ़ा लिखा है, खाते - पीते घर का है.....'
उन लोगों ने लड़की देखी और पसंद कर ली। रात्रि को,रिश्तेदार इकठ्ठे हो गए, पंडित ने जन्मकुंडली मिलायी। लेन - देन की बातचीत होने लगी। लड़के का बाप बनिया निकला- बड़ी बेशर्मी से उसने लंबी चौड़ी फेहरिस्त थमा दी।

आशीष को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहाँ तो विवाह-शुद्ध संस्कार और दो आत्माओं का पवित्र मिलन माना जाता है और हमारा यह समाज इसकी आड़ में व्यापार कर रहा है , विडंबना है। आशीष से रहा न गया, उसने कहा-' देखिये शर्मा जी , हम तो लड़की वाले हैं लड़की के साथ कुछ न कुछ तो देंगे ही अपनी हैसियत के मुताबिक......और हो सकता है आपने जिन चीजों की मांग की है उससे भी अधिक दें....लेकिन आपसे निवेदन है विवाह को कृपया व्यापार का रूप न दे.....'।

जितने भी लोग वहां पर मौजूद थे, आशीष को ऐसे देख रहे थे जैसे उसने कोई आश्चर्यजनक घटित कर दिया हो! श्याम पंडा ने आशीष को अलग से बुलाकर कहा 'बेटे , यह सब तो होता ही है, थोड़ी शांति से काम लो, किसी तरह सुजाता के हाथ पीले कर विदा कर दें,इसी में कल्याण है।'
आशीष चुप्पी लगा गया परन्तु उसके माथे पर बल जरूर पड़ गए। मेहमान अगली सुबह विदा हो गए थे।

घर में जब कभी कोई नई चीजें आतीं आशीष की माँ कहती- 'फालतू है, इसके बिना क्या काम नहीं चलता था?' आशीष की पत्नी मधु की बहुत दिनों से इच्छा थी कि घर में एक 'ए.सी' लग जाए। जेठ की दोपहरी में ईंट का मकान अत्यधिक तपने लग जाता है। गर्मी असहाय हो जाती है। एक दिन जब आशीष और उसके पिता श्याम पंडा इसी संदर्भ में चर्चा कर रहे थे, मधु ने अपने मन की बात कह दी। आशीष की माँ जो वहीं पर बैठी हुई सब्जी काट रही थी, बोल उठी-'एक क्यों , दो ए.सी लगवा लो,हमें तो गर्मी लगती नहीं जैसे..... मैं पूछती हूँ, इससे पहले कूलर से दिन नहीं कटते थे क्या....?'

और वह ऐसे चुप हो गई जैसे स्थिति को गंभीर बनने से रोकने के लिए यह बहुत जरूरी हो।
एक बार आशीष ने दो साड़ियां लायी। माँ को जब साड़ियों की कीमत बतायी गई, वह विस्फारित नयनों से अपनी बहू को देखने लगी बोली-'पचास हजार रुपये की साड़ी पहनेगी हमारी बहूरानी .....' मधु ने भी उसी तर्ज में कहा -'एक साड़ी आपके लिए भी है माँ जी.....'
नए और पुराने के बीच अदृश्य दीवार उठती चली गई परन्तु एक बड़ी घटना ने इस दीवार को ध्वस्त कर दिया।

जब कोरोना ने पूरी दुनिया में कहर बरपा रखा था। लॉक डाउन लगा हुआ था। पृथ्वी उदास थी, चिताओं से आसमान धधक उठा था। चिलचिलाती धूप में नंगे पांव कोलतार की सड़कें नापी जा रही थीं, रेल की पटरियों पर रोटियां बिखरी हुई थीं। चारों ओर दु:ख और तकलीफों के पहाड़ खडे हो गए थे। लोग अपने ही घरों में कैद हो गए थे , नजरबंद होने की तरह। भीतर खौफ था, बाहर सन्नाटा। आक्सीजन की कमी थी, हवाओं में मौत नाच रही थी। आखिरी विदाई भी इतनी निष्ठुर होगी किसने सोचा था भला । दवाओं की कालाबाजारी की जा रही थी। मौत का व्यापार हो रहा था। फिर भी नेता राजनीति कर रहे थे। सत्ताधारी थाली बजवा रहे थे, टीका महोत्सव की चर्चाएं टीवी चैनलों में जोरशोर से दिखाई जा रही थीं। आशीष का मन यह सब देख अवसाद से भर जाता। ऐसे भयानक खौफनाक माहौल में जब इंसान को सबसे ज्यादा हमदर्दी की जरूरत होती है, लोग बहाने तलाशते। संवेदनाएं जैसे मर गईं थीं। मनुष्य मनुष्य के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गयी थी।

सावधानियां बरते जाने के बावजूद श्याम पंडा और उसकी बेटी सुजाता को भी कोरोना ने अपनी गिरफ्त में ले ही लिया। पहले सर्दी खांसी आना शुरू हुई फिर तेज बुखार के साथ - साथ पसलियों ,पीठ और पेट में बहुत तेज दर्द होने लगे, मधु को सारा माजरा समझते देर नहीं लगी ,उसने बिना देर किए अपने पूर्व परिचित डाक्टर केनन से मोबाईल से सम्पर्क किया। डाक्टर केनन की सलाह पर ही मधु ने ससुर एवं ननद सुजाता को होम आईसोलेशन में रखा और उनकी खूब सेवा -जतन की, उनकी मनपसंद चीजों के अलावा फल, चटनी, आवले का मुरब्बा खिड़की से देती। वीडियो काल से उन्हें भाप लेने और कुछ समय पीठ के बल सो कर सांस लेने की हिदायतें देती रहती ।

थर्मा मीटर और ऑक्सीमीटर से बराबर रीडिंग लेने के लिए, तो कभी कौन सी दवा कब लेनी है , बताती रहती थी। वह कमरे में भले नहीं जाती थी, लेकिन दरवाजा जब भी खुलता बाहर खड़ी मधु दोनों का हौसला जरूर बढ़ाती । मधु की सास दूर से यह सब देखती रहती, उसे रात भर नींद नहीं आती थी, बुरे - बुरे ख्याल आते रहते थे। गली में जब कुत्ते भौंकते तो वह सहम जाती, चौबीसों घंटे भगवान का जाप करती। हफ्ते भर में मधू की सेवा सुश्रुषा और सास की दुआएं असर दिखाने लगीं। पन्द्रह - अठारह दिनों में श्याम पंडा और सुजाता बिलकुल स्वस्थ हो गये। सास आपातकाल में मधु की अद्वितीय भूमिका के आगे नतमस्तक हो गई थी, मन ही मन वह मधु को खूब आशीर्वाद देती रहती। ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करती ,ऐसी बहू देने के लिए घर में जो एक अदृश्य दीवार उठ खड़ी हुईं थी, अंधेरे की वह दीवार आज पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी। सुनहरा उजाला अपनी पूरी रंगत के साथ बगर गया था ।


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