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नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने वक्फ बोर्ड में प्रस्तावित संशोधन का किया स्वागत

वक्फ संशोधन बिल को लेकर जारी सियासत के बीच चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो (डॉ.) फैजान मुस्तफा ने मीडिया से खास बातचीत की। उन्होंने वक्फ बोर्ड में प्रस्तावित संशोधन का खुले तौर पर स्वागत किया

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने वक्फ बोर्ड में प्रस्तावित संशोधन का किया स्वागत
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पटना। वक्फ संशोधन बिल को लेकर जारी सियासत के बीच चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो (डॉ.) फैजान मुस्तफा ने मीडिया से खास बातचीत की। उन्होंने वक्फ बोर्ड में प्रस्तावित संशोधन का खुले तौर पर स्वागत किया।

प्रो. फैजान मुस्तफा ने कहा कि मैंने साफ तौर से ये पोजीशन ली कि जो सेंट्रल वक्फ काउंसिल है, उसमें आज भी मना नहीं है कि नॉन मुस्लिम मेंबर ना बने। दस साल में कई बार मोदी सरकार ने उसमें नॉमिनेशन किए होंगे। इसमें एक कैटेगरी है कि दो मेंबर लोकसभा के होंगे और एक राज्यसभा के होंगे। आप उसमें नॉन मुस्लिम का नॉमिनेशन कर दें। इसके अलावा इसमें कैटेगरी है कि चार मेंबर होंगे, जो फाइनेन्स, आर्किटेक्चर, मेडिसिन और एडमिनिस्ट्रेशन के एक्सपर्ट होंगे। आप उसमें नॉन मुस्लिम को रख सकते हैं। सेंट्रल वक्फ काउंसिल में आज भी यह मना नहीं है कि नॉन मुस्लिम मेंबर नहीं हो सकते, इसलिए उसमें नॉन मुस्लिम को मेंबर बनाना, लॉ में ही लिख देना, अच्छी बात है लिख दीजिए। मैं यह समझता हूं कि अगर वाइडर रिप्रेजेंटेशन हो तो बेहतर होगा।

एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बहुत साल पहले मुझे एक बहुत बड़े नेता ने बैठक के लिए बुलाया। उन्होंने मुझे कहा कि मुसलमानों से संबंधित मामले पर हम बैठक कर रहे हैं। इस बैठक में हमने बहुत बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों को बुलाया है, इसलिए आप भी आइए। इस पर मैंने कहा कि इस बैठक में कोई नॉन मुस्लिम बुद्धिजीवी को बुलाया है? जवाब में उन्होंने कहा कि नहीं, यह तो मुसलमानों का मामला है। तब मैंने कहा कि मैं नहीं आता।

मुस्तफा ने कहा कि जो मुसलमानों के मसले हैं, वही देश के मसले हैं। तो यह सोचना कि मुसलमानों की समस्याएं गैर मुस्लिमों से अलग हैं या उनकी संस्थाओं की परेशानी गैर मुस्लिम से अलग हैं, यह सही नहीं है। हमें यह देखना चाहिए कि एक्सपर्ट कौन है? बड़े-बड़े एक्सपर्टस जो किसी भी धर्म के हों, उनको किसी भी संस्था में आने का अधिकार होना चाहिए। सेंट्रल वक्फ काउंसिल में आज भी नॉन मुस्लिम के होने की कोई मनाही नहीं है। अगर पूर्व की सरकारों ने उसमें नॉन मुस्लिम को नियुक्त नहीं किया तो सरकार की गलती है। वक्फ बोर्ड सेंट्रल वक्फ काउंसिल के नीचे काम करता है। इसमें यह कहा गया कि ज्यादातर सदस्य सरकार के ही नामित लोग होंगे। लेकिन इसमें मुसलमानों की शर्त लगाई गई, उस शर्त को हटा दिया गया। मैं उसका स्वागत करता हूं। अगर सरकार ऐसी पॉलिसी बनाई है कि जितने भी धार्मिक बोर्ड हैं, उनमें अब किसी धर्म विशेष के सदस्य नहीं होंगे, तो यह स्वागत योग्य है।

वक्फ की संपत्ति पर कब्जे को लेकर उन्होंने कहा कि इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वक्फ की संपत्ति पर कब्जा है। ऐसी बहुत सी संपत्ति है जिस पर सरकार का भी कब्जा है। कुछ संपत्तियों पर मुसलमानों का ही कब्जा है, गैरकानूनी तरीके से उन्होंने उनको बेच दिया है। वक्फ बोर्ड के अधिकतर सदस्यों को सरकार नामित करती है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि वक्फ बोर्ड प्राइवेट बॉडी है। यह भी आसान नहीं है कि किसी संपत्ति को लेकर यह दावा किया जाए कि यह वक्फ की संपत्ति है। किसी संपत्ति को वक्फ की संपत्ति साबित करना बहुत मुश्किल काम है। उसके लिए आपको ऑरिजनल काग्जात लाने पड़ते हैं। आप सोचिए, ताजमहल जैसे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि शाहजहां का ओरिजिनल सिग्नेचर किया हुआ लेटर लाओ।

उन्होंने आगे कहा कि दिल्ली स्थित जामा मस्जिद वक्फ है, वहां नमाज़ भी होती है। लेकिन उस बिल्डिंग में कोई मरम्मत का काम शाही इमाम नहीं करा सकते, बिल्डिंग को छू भी नहीं सकते। सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ही उसमें कोई मरम्मत या निर्माण कार्य करा सकती है। वक्फ को लेकर बहुत सी गलतफहमियां हैं, उन गलतफहमियों को दूर करने की जरूरत है।


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