स्मार्ट सिटी प्रयागराज बारिश में क्यों डूब रहा है?
कुंभ और स्मार्ट सिटी के नाम पर हजारों करोड़ रुपये के विकास के बावजूद उत्तर प्रदेश के बड़े शहर प्रयागराज की सड़कों, गलियों और घरों में जलभराव ने शहर की तैयारियों और व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

कुंभ और स्मार्ट सिटी के नाम पर हजारों करोड़ रुपये के विकास के बावजूद उत्तर प्रदेश के बड़े शहर प्रयागराज की सड़कों, गलियों और घरों में जलभराव ने शहर की तैयारियों और व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
उत्तर प्रदेश का प्रयागराज शहर इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में है. चर्चा की वजह कोई धार्मिक आयोजन या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कुछ दिनों की बारिश के बाद पानी-पानी हुए शहर की तस्वीरें हैं.
उत्तर प्रदेश के अहम शहर इलाहाबाद के कई इलाकों में सड़कें पानी में डूबी हैं, घरों में पानी घुस गया है, कुछ निचले इलाकों में लोगों को अपने घरों से निकलने के लिए नावों और बचाव दलों की मदद लेनी पड़ रही है और यह सब महज कुछ दिनों की बारिश के चलते हुआ है.
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प्रयागराज शहर के पॉश इलाके कहे जाने वाले जॉर्ज टाउन, रामबाग, अल्लापुर, राजरूपपुर समेत कटरा और पुराने शहर के कई इलाकों में जलभराव के कारण लोग परेशान हैं. न सिर्फ रिहायशी इलाके बल्कि रेलवे ट्रैक और पुलिस थाने भी इस जलभराव की चपेट में आ गए हैं.
शहर का रामबाग रेलवे स्टेशन पूरी तरह से जलभराव की चपेट में आ गया है, जिसकी वजह से स्टेशन के प्लेटफॉर्मों पर भी पानी भर गया है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए रामबाग रेलवे स्टेशन के तीनों प्लेटफॉर्म्स से ट्रेनों का संचालन फिलहाल पूरी तरह से बंद कर दिया गया है, जिससे यात्रियों को भारी असुविधा हो रही है.
राज्य के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी इसी शहर से आते हैं. लोगों की परेशानी और प्रशासनिक लापरवाही का गुस्सा उन्होंने सार्वजनिक रूप से जताते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "कारण चाहे जो भी हो, जनहित में इसका स्थाई समाधान सर्वोच्च प्राथमिकता पर सुनिश्चित किया जाए. समय रहते आवश्यक कदम उठाए गए होते तो आज यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती.”
प्रयागराज में जलभराव का मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 19 अगस्त को मामले पर खुद संज्ञान लेते हुए नगर आयुक्त और जिलाधिकारी को निचले इलाकों में जमा बारिश का पानी निकालने के निर्देश दिए. हाईकोर्ट ने राज्य के स्थानीय निकाय विभाग के निदेशक से यह भी बताने को कहा कि बारिश और बाढ़ के पानी से शहर को राहत दिलाने के लिए क्या योजना बनाई गई है.
दरअसल, बारिश की वजह से हुए इस जलभराव ने सिर्फ लोगों की मुश्किलें ही नहीं बढ़ाई हैं बल्कि एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है कि जिस शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए, जहां महाकुंभ जैसे आयोजनों के लिए हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाएं पूरी की गईं, वहां सामान्य बारिश का पानी आखिर इतनी बड़ी समस्या क्यों बन गया?
सवाल सिर्फ बारिश का नहीं
दरअसल, प्रयागराज तीन तरफ से नदियों से घिरा शहर है. गंगा और यमुना नदियों का संगम यहां की पहचान है. लेकिन शहर का मौजूदा संकट केवल नदी की बाढ़ की कहानी नहीं है बल्कि बारिश के बाद कई शहरी इलाकों में पानी जमा हुआ और नालों के जरिए पानी की निकासी में समस्या सामने आई.
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों की शिकायत है कि कई जगह नाले साफ नहीं किए गए और जल निकासी की व्यवस्था बारिश के दबाव को संभालने में नाकाम रही. प्रयागराज के पुराने मोहल्लों में से एक रामबाग के रहने वाले देवेंद्र सिंह बताते हैं, "नगर निगम समय रहते नालों की सफाई कराता नहीं है. लोग अधिकारियों से शिकायतें करते रहते हैं लेकिन शिकायतें सुनी नहीं जातीं. यहां तक कि पार्षदों तक की शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया जाता. पहले भी शिकायतें की गई थीं.”
हालांकि जानकारों के मुताबिक, इसके पीछे सबसे बड़ी समस्या यह है कि शहर का विकास जिस रफ्तार से हुआ, उस रफ्तार से उसकी जल निकासी व्यवस्था विकसित नहीं हुई. उसी का नतीजा है कि जलभराव की समस्या आ रही है.
स्मार्ट सिटी का मॉडल और जमीन की हकीकत
प्रयागराज को केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजना में शामिल किया गया था. इसके बाद शहर में सड़क, यातायात, प्रकाश व्यवस्था, सार्वजनिक सुविधाओं और दूसरे बुनियादी ढांचे से जुड़े कई काम हुए.
इसके अलावा 2025 के महाकुंभ से पहले शहर में बड़े पैमाने पर सड़क, फ्लाईओवर, घाट, रिवरफ्रंट और दूसरी आधारभूत संरचनाओं पर काम हुआ. दिसंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज में करीब 5,500 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया था जिनमें दस नए फ्लाईओवर, नदियों पर स्थाई घाट, रिवरफ्रंट रोड और दूसरी परियोजनाएं शामिल थीं.
सरकार ने यह भी बताया था कि गंगा में गिरने वाले छोटे नालों के पानी को रोकने, मोड़ने और ट्रीट करने की परियोजनाएं शुरू की गई हैं. लेकिन इस जलभराव को देखते हुए यह सवाल आज भी बना हुआ है कि क्या शहर के भीतर बारिश के पानी की निकासी के लिए भी उतनी ही गंभीरता से काम हुआ?
प्रयागराज के ही रहने वाले सीनियर स्ट्रक्चरल इंजीनियर डॉक्टर अतुल जायसवाल कहते हैं, "वेस्ट डिस्पोजल सबसे बड़ा मुद्दा है. और ऐसा प्रॉपर सर्वे नहीं होने की वजह से ऐसा होता है. सीवरेज और ड्रेनेज अलग होनी चाहिए लेकिन कई जगह मिक्स हो जाती हैं. शहर का एक प्लान होना चाहिए जिसमें ये पता हो कि हमारा आउटफ्लो क्या है. लेकिन यहां हुआ क्या, सैकड़ों साल पहले बने शहर में आधारभूत संरचनाएं भी उसी आधार पर बनती चली गईं.
डीडब्ल्यू से बातचीत में डॉक्टर अतुल जायसवाल कहते हैं कि ऐसा सिर्फ यहीं नहीं बल्कि लगभग सभी पुराने शहरों में हुआ है. उनके मुताबिक, "शहर बड़ा होता गया, नए-नए इलाके बनते गए लेकिन उनकी लेवलिंग हुई नहीं. एक दूसरे को कनेक्ट करते चले गए, बिना इस बात का ध्यान रखे कि कौन सा इलाका ऊपर है कौन सा नीचे है. इसके लिए जरूरी ये है कि जो नया एरिया बन रहा है उसे पुराने से कनेक्ट न करें. उसे अलग रखें, अलग से डिस्पोज करें. क्योंकि यदि परमिसिबल पैरामीटर डिस्टर्ब होगा तो फ्लो रुक जाएगा और फिर नतीजा यही होगा.”
कुंभ के लिए करोड़ों, लेकिन शहर के लिए क्या?
प्रयागराज में संगम किनारे हर छह साल पर अर्धकुंभ और हर बारह साल पर कुंभ (जिसका राज्य सरकार ने नाम बदलकर अब महाकुंभ कर दिया है) मेला आयोजित होता है. यही नहीं, संगम किनारे हर साल माघ मेले का भी आयोजन होता है. इन बड़े धार्मिक आयोजनों के कारण शहर के बुनियादी ढांचे पर भी बड़े पैमाने पर खर्च होता है.
महाकुंभ 2025 के लिए केंद्र की नमामि गंगे परियोजनाओं के तहत ही करीब 299 करोड़ रुपये की विभिन्न परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी जिनमें स्वच्छता ढांचा, 22 अनटैप्ड नालों का उपचार और सात स्थानों पर घाटों का विकास शामिल था.
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब इतने बड़े पैमाने पर शहर में आधारभूत ढांचे पर पैसा खर्च हो रहा है, तो बारिश के पानी की निकासी व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों दिखाई दे रही है?
हालांकि आयोजन के समय शहर की आबादी कई गुना बढ़ जाती है और उस वक्त भी ड्रेनेज, सीवरेज इत्यादि पर खर्च होता है लेकिन जानकारों के मुताबिक, शहर की निकासी व्यवस्था और उसके स्थाई उपचार पर ध्यान कम दिया जाता है.
डॉक्टर अतुल जायसवाल कहते हैं, "उस समय तो पूरा ध्यान शहर की सजावट पर होता है जबकि शहर की मूलभूत संरचना पर भी ध्यान होना चाहिए. ये तो सर्विसेज का पार्ट है. दूसरे, पिछले कुछ सालों से शहरों में वर्टिकल डेवलपमेंट होने लगा है. ऊंची इमारतें बनने लगी हैं. यानी शहर पर जनदबाव तो बढ़ रहा है, लेकिन ड्रेनेज सिस्टम वही है. ऐसे में यदि मॉडल चेंज करना है तो हर चीज में बदलाव करना होगा. सही बात तो ये है कि शहर को रीप्लान करने की जरूरत है. और सिर्फ इसी शहर को नहीं बल्कि सभी शहरों को.”
जानकारों का कहना है कि शहरीकरण का मतलब सिर्फ सड़कें चौड़ी करना, नए कॉरिडोर बनाना या कंक्रीट की नई सतहें तैयार करना नहीं है क्योंकि शहर में जितनी जमीन कंक्रीट से ढकती जाती है, बारिश का पानी जमीन में जाने की क्षमता उतनी ही कम होती जाती है. ऐसे में पानी को निकालने के लिए पर्याप्त और वैज्ञानिक ड्रेनेज नेटवर्क जरूरी होता है.
प्रयागराज की मौजूदा तस्वीर इसी सवाल को सामने ला रही है.
सिर्फ प्रशासन की नहीं, नागरिकों की भी जिम्मेदारी
हालांकि इस समस्या के लिए सिर्फ सरकारी योजनाओं की कमियां या प्रशासनिक लापरवाही ही जिम्मेदार नहीं है. शहरों की जल निकासी व्यवस्था पर नागरिकों की आदतों का भी सीधा असर पड़ता है.
प्रयागराज के जिलाधिकारी मनीष वर्मा ने शनिवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि शहर के कुछ इलाकों में जलभराव की स्थिति में सुधार हुआ है और प्रशासन ने ड्रेनेज के कई चोक पॉइंट्स को चिन्हित कर उन्हें साफ कराया है.
उनके मुताबिक, नालों की सफाई के दौरान ऐसे सामान भी मिले हैं जिनका इस्तेमाल घरों में होता है.
मनीष वर्मा ने कहा, "कुछ इलाकों में जलभराव की समस्या ठीक हो गई है. ड्रेनेज चोक पॉइंट्स काफी हद तक चिन्हित किए गए और उन्हें क्लियर कराया गया है. लेकिन जो नाले पानी बहने के लिए होते हैं, उनमें बड़े-बड़े गद्दे, बाल्टी और ऐसे सामान मिल रहे हैं जो घरेलू उपयोग के होते हैं और वो नाले में फंसे हुए थे.”
जिलाधिकारी ने लोगों से अपील की कि वे इस्तेमाल किया हुआ सामान नगर निगम की कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों में डालें और उसे सड़कों या नालों में न फेंकें. लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि नालों में कूड़ा क्यों फंस रहा है बल्कि सवाल ये है कि इसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है.
रिटायर्ड आईएएस अधिकारी बादल चटर्जी प्रयागराज के ही रहने वाले हैं और इलाहाबाद (प्रयागराज का पुराना नाम) के नगर आयुक्त और मंडलायुक्त भी रहे हैं. बादल चटर्जी डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, "पहले हर साल अक्टूबर के बाद ही नाले वगैरह की सफाई होती थी लेकिन ये काफी समय से बंद है. मैं खुद जब नगर आयुक्त था तो यहां नालों की सफाई खासतौर पर कराई. तब भी बहुत कुछ सामान निकला था नालों से. लेकिन सफाई के बाद जब बरसात हुई तो कहीं पानी नहीं रुका. कायदे से मई, जून या जुलाई के महीने में यानी बरसात से पहले नालों की सफाई होनी चाहिए और ये हर साल होनी चाहिए. प्रशासन ने नालों की सफाई की ही नहीं है.”
बादल चटर्जी आगे कहते हैं, "इसके बजाए नालियों को ढक दिया गया और छोटे-छोटे छेद कर दिए गए पानी जाने के लिए. जबकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का भी आदेश है कि नालियों को ढका न जाए. नालियों को खुला रखने का यह फायदा होता है कि गंदगी दिखती है और सफाई होती रहती है और बरसात का पानी भी आसानी से निकल जाता है.”


