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फर्जी दस्तावेजों के दम पर मिला नोएडा इंडोर स्टेडियम का टेंडर? आरोपों से घिरी प्रक्रिया, निष्पक्ष जांच की उठी मांग

नोएडा प्राधिकरण द्वारा वर्ष 2021 में इंडोर स्टेडियम के संचालन के लिए जारी किए गए टेंडर को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। सामने आए कुछ दस्तावेजों और लगाए गए आरोपों ने पूरी टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

फर्जी दस्तावेजों के दम पर मिला नोएडा इंडोर स्टेडियम का टेंडर? आरोपों से घिरी प्रक्रिया, निष्पक्ष जांच की उठी मांग
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नोएडा। नोएडा प्राधिकरण द्वारा वर्ष 2021 में इंडोर स्टेडियम के संचालन के लिए जारी किए गए टेंडर को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। सामने आए कुछ दस्तावेजों और लगाए गए आरोपों ने पूरी टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरोप है कि टेंडर हासिल करने वाली कंपनी सिक्योरिटी सॉल्यूशंस और पूर्व भारतीय क्रिकेटर आरपी सिंह से जुड़े पक्ष ने कथित तौर पर फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र, भ्रामक कोच प्रोफाइल तथा गलत जानकारियां प्रस्तुत कर तकनीकी मूल्यांकन में अधिक अंक प्राप्त किए और इसी आधार पर टेंडर अपने नाम कराया। मामले में लगाए गए आरोपों के अनुसार कंपनी ने अपने अनुभव को साबित करने के लिए नोएडा सेक्टर-93 स्थित सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट का एक अनुभव प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया।

हालांकि, संबंधित अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (एओए) ने लिखित रूप से इस दावे का खंडन किया है। एसोसिएशन का कहना है कि वर्ष 2016 के बाद से कंपनी के साथ उनका किसी भी प्रकार का अनुबंध, वित्तीय लेन-देन अथवा खेल सुविधाओं के संचालन से जुड़ा कोई संबंध नहीं रहा। इतना ही नहीं, आरोप यह भी है कि अनुभव प्रमाणपत्र में जिन खेल सुविधाओं का उल्लेख किया गया है, उनमें से कई उस समय परिसर में मौजूद ही नहीं थीं। विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू तकनीकी मूल्यांकन से जुड़ा है।

आरोप है कि इंडोर स्टेडियम के संचालन के लिए जारी टेंडर में कंपनी ने आउटडोर खेलों के कोचों की प्रोफाइल को इंडोर खेलों के अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया। दावा किया जा रहा है कि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर कंपनी को तकनीकी मूल्यांकन में 78.78 अंक प्रदान किए गए, जबकि प्रतिस्पर्धी संस्था पीएफआई इंडिया को 70 अंक देकर पीछे कर दिया गया। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो तकनीकी मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मामले को लेकर यह भी सवाल उठ रहे हैं कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान प्रस्तुत किए गए अनुभव प्रमाणपत्रों, कोचों की योग्यता और अन्य दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया था। यदि दस्तावेजों में किसी प्रकार की गलत या भ्रामक जानकारी थी, तो उन्हें स्वीकार करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए, क्योंकि इससे सार्वजनिक संसाधनों का संचालन और खिलाड़ियों का भविष्य जुड़ा होता है। यदि किसी संस्था ने गलत जानकारी देकर अनुचित लाभ प्राप्त किया है, तो यह केवल एक टेंडर का मामला नहीं बल्कि सरकारी व्यवस्था को गुमराह करने और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने का गंभीर विषय हो सकता है। फिलहाल इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि या खंडन संबंधित जांच के बाद ही संभव होगा।

इसी बीच जनहित में पूरे टेंडर रिकॉर्ड, अनुभव प्रमाणपत्रों, कोचों की प्रोफाइल, तकनीकी मूल्यांकन और अंक आवंटन की स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराने की मांग लगातार तेज हो रही है। लोगों का कहना है कि यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो संबंधित कंपनी के साथ-साथ इस प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी नियमानुसार कठोर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।


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