यूपी ट्रेड शो : मिट्टी के गहनों में उतरी लखनऊ की चिकनकारी
विकास की रफ्तार के साथ जिंदगी भले ही आधुनिक होती जा रही हो, लेकिन इसी के बीच मिट्टी की खुशबू और हाथों की कारीगरी से जुड़ी पुरानी संस्कृति कहीं पीछे छूटती जा रही है

- ज्योति पटेल
- 250 महिलाओं को मिला हुनर से रोजगार
- रोशनी एक उम्मीद ट्रस्ट' के जरिये पुरानी संस्कृति को बचाने की कोशिश
- मिट्टी, धागे और हाथ की कढ़ाई से तैयार हो रही ज्वेलरी
ग्रेटर नोएडा। विकास की रफ्तार के साथ जिंदगी भले ही आधुनिक होती जा रही हो, लेकिन इसी के बीच मिट्टी की खुशबू और हाथों की कारीगरी से जुड़ी पुरानी संस्कृति कहीं पीछे छूटती जा रही है। अब इसी पुरानी विरासत को नए अंदाज में लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। लखनऊ की चिकनकारी अब सिर्फ कुर्तियों और कपड़ों तक सीमित नहीं है। चिकनकारी की कढ़ाई अब मिट्टी से बने गहनों में भी दिखाई दे रही है। यूपी ट्रेड शो में 'रोशनी एक उम्मीद ट्रस्ट' के नाम से लगे स्टॉल पर ऐसी ही ज्वेलरी लोगों का ध्यान खींच रही है। स्टॉल पर मिट्टी से तैयार किए गए हार, झुमके, पेंडेंट, कंगन और दूसरे आभूषण रखे गए हैं। इनकी खासियत यह है कि इन्हें मशीनों से बड़े स्तर पर तैयार करने के बजाय हाथों से आकार दिया जाता है। मिट्टी को अलग-अलग रूप देने के बाद उस पर धागे, मोती, रंग और हाथ की कढ़ाई से सजावट की जाती है। कई गहनों में फूल, पत्तियां, मोर और दूसरे पारंपरिक डिजाइन दिखाई देते हैं। दूर से देखने पर ये गहने सामान्य आभूषणों जैसे नजर आते हैं, लेकिन करीब से देखने पर इनमें मिट्टी और हाथ की मेहनत साफ दिखाई देती है।
पुरानी संस्कृति की खुशबू लोगों तक पहुंचाना है
रोशनी एक उम्मीद ट्रस्ट की संस्थापक कोमल ने बताया कि आज विकास के साथ लोग अपनी पुरानी संस्कृति और मिट्टी से जुड़ी चीजों को भूलते जा रहे हैं। उनका उद्देश्य ऐसी कारीगरी को नए रूप में लोगों तक पहुंचाना है, जिससे आधुनिकता के साथ पुरानी संस्कृति भी आगे बढ़ती रहे। उन्होंने बताया कि मिट्टी से बने उत्पादों और पारंपरिक कारीगरी को केवल सजावट की वस्तु बनाकर रखने के बजाय उन्हें रोजमर्रा के इस्तेमाल से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसी सोच के तहत चिकनकारी को गहनों में उतारा गया है। उनका कहना है कि मिट्टी की खुशबू, हाथों की मेहनत और पुरानी संस्कृति को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। स्टॉल पर इसी सोच को एक संदेश के रूप में भी रखा गया है लखनऊ में चिकनकारी की कुर्ती तो बहुत पहन ली, अब चिकनकारी की ज्वेलरी भी पहन लीजिए। इसका मकसद लोगों को यह बताना है कि पारंपरिक कढ़ाई को सिर्फ कपड़ों तक सीमित रखने की जरूरत नहीं है। इसे गहनों और दूसरे उत्पादों के जरिए भी नया बाजार दिया जा सकता है।
100 रुपए से लेकर 800 रुपए तक के गहने
इस काम की शुरुआत करीब आठ साल पहले छोटे स्तर पर हुई थी। शुरुआत में करीब 100 रुपए से उत्पाद तैयार किए जाते थे। धीरे-धीरे लोगों की पसंद बढ़ी और डिजाइन में भी बदलाव किया गया। अब करीब 800 रुपए तक के गहने तैयार किए जा रहे हैं। अलग-अलग डिजाइन और मेहनत के आधार पर उत्पादों की कीमत तय होती है। इस काम से करीब 250 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। गोरखपुर से लेकर लखनऊ और कानपुर तक की महिलाएं इससे जुड़कर अलग-अलग स्तर पर काम कर रही हैं। गोरखपुर की कोमल मद्धेशिया, वैष्णवी गुप्ता और रंजना समेत कई महिलाएं इस कारीगरी को आगे बढ़ाने में जुटी हैं। कारीगरी की पूरी प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका अलग-अलग है। कोई मिट्टी को आकार देती है तो कोई उस पर धागे से डिजाइन तैयार करती है। इसके बाद मोती और दूसरी सामग्री लगाकर उसे अंतिम रूप दिया जाता है। तैयार गहनों को पैक कर बाजार और प्रदर्शनी तक पहुंचाया जाता है। इस तरह एक उत्पाद तैयार होने के पीछे कई महिलाओं की मेहनत जुड़ी होती है।
महिलाओं को सिर्फ रोजगार नहीं, आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश
कोमल के मुताबिक इस काम का उद्देश्य केवल महिलाओं को रोजगार देना नहीं, बल्कि उन्हें महिला सशक्तीकरण की दिशा में आगे बढ़ाना भी है। उनका कहना है कि महिलाएं यदि अपने हुनर के दम पर काम खड़ा करें और अपनी कमाई का जरिया खुद बनाएं तो उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है। उन्होंने बताया कि इसी सोच के साथ महिलाओं को काम से जोड़ा जा रहा है। कोशिश है कि महिलाएं अपने काम को खुद संभालें और किसी पर निर्भर न रहें। हम महिलाओं को आगे बढ़ाने के साथ उन्हें सशक्त बनाना चाहते हैं। हमारा प्रयास है कि अपने काम-काज को चलाने के लिए हमें किसी पुरुष को रखने की जरूरत न पड़े। महिलाएं खुद काम सीखें, उसे संभालें और आगे बढ़ें।
रासायनिक सामग्री के बजाय मिट्टी और हाथों की कारीगरी
इन गहनों की एक और खासियत इनके निर्माण का तरीका है। कारीगरों के अनुसार, उत्पादों को तैयार करने में किसी तरह के हानिकारक रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया जाता। मिट्टी को आधार बनाकर उसे आकार दिया जाता है। इसके बाद रंग, धागे, मोती और दूसरी सजावटी सामग्री से डिजाइन तैयार किए जाते हैं। स्टॉल पर लगे उत्पादों में पारंपरिक और आधुनिक डिजाइन का मेल दिखाई देता है। कुछ गहने हल्के और छोटे आकार के हैं, जिन्हें रोजमर्रा के कपड़ों के साथ पहना जा सकता है, जबकि कुछ बड़े हार और पेंडेंट पारंपरिक परिधान के साथ इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
गोरखपुर से लखनऊ और कानपुर तक पहुंची कारीगरी
करीब आठ साल पहले सीमित स्तर पर शुरू हुआ यह काम अब अलग-अलग शहरों की महिलाओं को जोड़ रहा है। गोरखपुर, लखनऊ और कानपुर की महिलाएं अपने-अपने स्तर पर उत्पाद तैयार कर रही हैं। इससे स्थानीय स्तर पर पारंपरिक कारीगरी को बढ़ावा मिलने के साथ महिलाओं को काम का अवसर भी मिल रहा है। यूपी ट्रेड शो में स्टॉल लगाने का मकसद भी इन उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाना है। यहां आने वाले लोग गहनों के डिजाइन, कीमत और उन्हें तैयार करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ले रहे हैं। कई लोगों के लिए मिट्टी से बने गहने और उनमें की गई चिकनकारी नया अनुभव है।
मिट्टी की खुशबू को आधुनिक बाजार से जोड़ने की पहल
आज जब बाजार में मशीनों से तैयार होने वाले आभूषणों की भरमार है, ऐसे में हाथ से बने मिट्टी और धागे के गहने अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। इनके पीछे केवल डिजाइन नहीं, बल्कि कई महिलाओं की मेहनत और पारंपरिक हुनर जुड़ा है। रोशनी एक उम्मीद ट्रस्ट के माध्यम से इस कारीगरी को आगे बढ़ाने की कोशिश में एक तरफ पुरानी संस्कृति और मिट्टी की खुशबू को बचाने का प्रयास है तो दूसरी तरफ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की सोच भी है। आठ साल पहले 100 रुपए से शुरू हुआ सफर अब 800 रुपए तक के उत्पादों तक पहुंच गया है और करीब 250 महिलाएं इससे जुड़ी हैं।


