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UP News: POCSO कोर्ट का सख्त फैसला: 50 नाबालिगों के शोषण मामले में जेई और पत्नी को फांसी

मामला 50 नाबालिग बच्चों के यौन शोषण और उनकी आपत्तिजनक तस्वीरों व वीडियो को इंटरनेट के जरिए बेचकर अवैध कमाई करने से जुड़ा है। जांच में सामने आया कि आरोपी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़कर बाल यौन शोषण सामग्री का प्रसार कर रहे थे।

UP News: POCSO कोर्ट का सख्त फैसला: 50 नाबालिगों के शोषण मामले में जेई और पत्नी को फांसी
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बांदा। Death penalty to Ram Bhavan Durgavati:उत्तर प्रदेश के बांदा में विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) की अदालत ने बच्चों के यौन शोषण और आपत्तिजनक सामग्री के ऑनलाइन कारोबार से जुड़े बहुचर्चित मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। चित्रकूट में सिंचाई विभाग के निलंबित जूनियर इंजीनियर (जेई) रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है। न्यायालय ने आदेश दिया कि दोनों दोषियों को “मृत्यु होने तक फांसी पर लटकाया जाए।” यह फैसला विशेष न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा की अदालत ने साक्ष्यों, सीबीआई के अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष की दलीलों पर विस्तृत सुनवाई के बाद सुनाया। अदालत ने 163 पृष्ठों के निर्णय को सुरक्षित रखने के बाद शुक्रवार को सजा का ऐलान किया।

मामला क्या है?

मामला 50 नाबालिग बच्चों के यौन शोषण और उनकी आपत्तिजनक तस्वीरों व वीडियो को इंटरनेट के जरिए बेचकर अवैध कमाई करने से जुड़ा है। जांच में सामने आया कि आरोपी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़कर बाल यौन शोषण सामग्री का प्रसार कर रहे थे। सीबीआई ने 31 अक्टूबर 2020 को नई दिल्ली में प्राथमिकी दर्ज की थी। इसमें बताया गया कि बांदा जिले के नरैनी निवासी चुन्ना प्रसाद कुशवाहा का पुत्र रामभवन, जो सिंचाई विभाग में जेई था, बच्चों के शोषण के संगठित गिरोह से जुड़ा हुआ है।

सीबीआई की जांच और गिरफ्तारी

जांच की कड़ी सोनभद्र के अनपरा से जुड़ी। सितंबर 2020 में अनपरा निवासी इंजीनियर नीरज यादव को गिरफ्तार किया गया था। उसके पास से आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई। नीरज दिल्ली में रहकर ऑनलाइन संदिग्ध लिंक साझा करता था। इसी दौरान एक ऑनलाइन लिंक के आधार पर विशेष ऑनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज एंड एक्स्प्लॉइटेशन (OCSAE) यूनिट की जांच में रामभवन का नाम सामने आया। सीबीआई ने लगभग डेढ़ महीने तक जाल बिछाकर 17 नवंबर 2020 को कर्वी की एसडीएम कॉलोनी स्थित किराए के मकान से रामभवन और उसकी पत्नी को गिरफ्तार किया।

तलाशी में पेन ड्राइव से 34 आपत्तिजनक वीडियो और 779 तस्वीरें बरामद हुईं। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी डार्क वेब और अन्य इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर सामग्री बेचने के लिए तीन मोबाइल नंबर और तीन ईमेल आईडी का इस्तेमाल कर रहा था।

अदालत में सुनवाई और साक्ष्य

सीबीआई के तत्कालीन एएसपी अमित कुमार (अब सेवानिवृत्त) ने 22 मई 2023 को आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया। 5 जून 2023 से सुनवाई शुरू हुई, जिसमें कुल 74 गवाह पेश किए गए। इनमें 25 पीड़ित बच्चे भी शामिल थे, जिन्होंने अदालत में बयान दर्ज कराए। अभियोजन पक्ष की ओर से अधिवक्ता धारा सिंह मीना ने साक्ष्यों और डिजिटल फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर आरोपों को सिद्ध किया। बचाव पक्ष ने भी अपनी दलीलें रखीं, लेकिन अदालत ने उपलब्ध प्रमाणों को पर्याप्त मानते हुए दोनों को दोषी करार दिया।

फांसी की सजा और भारी अर्थदंड

अदालत ने रामभवन पर 6.45 लाख रुपये और दुर्गावती पर 5.40 लाख रुपये का अर्थदंड लगाया है। साथ ही न्यायालय ने पीड़ित बच्चों के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं। निर्देश के अनुसार जुर्माने की राशि और सरकार से मिलने वाली सहायता राशि से प्रत्येक पीड़ित बच्चे को 10-10 लाख रुपये क्षतिपूर्ति दी जाएगी। रामभवन के पास से जब्त आठ लाख रुपये और उस पर अर्जित ब्याज सहित पूरी धनराशि को भी पीड़ित बच्चों में समान रूप से बांटा जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला अत्यंत जघन्य और समाज के लिए गंभीर खतरा है, इसलिए कठोरतम दंड आवश्यक है।

पहले भी सुना चुकी है मृत्युदंड

विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) की बांदा अदालत पिछले छह महीनों में यह तीसरा मामला है, जिसमें फांसी की सजा सुनाई गई है। अब तक पांच अभियुक्तों को मृत्युदंड दिया जा चुका है। यह रुख दर्शाता है कि बाल यौन अपराधों के मामलों में अदालत सख्त रुख अपना रही है।

जेल में बंद हैं दोनों दोषी

रामभवन और दुर्गावती को 17 नवंबर 2020 को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। दुर्गावती को एक समय उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई थी, लेकिन 18 फरवरी 2026 को दोषी ठहराए जाने के बाद उसे दोबारा जेल भेज दिया गया। तब से दोनों बांदा जेल में बंद हैं।

आगे की कानूनी प्रक्रिया

बांदा के वरिष्ठ अधिवक्ता विशंभर सिंह के अनुसार, दोषी हाई कोर्ट में अपील कर सकते हैं। वहां से राहत न मिलने पर वे सुप्रीम कोर्ट और उसके बाद राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर कर सकते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए उच्च अदालतों से राहत की संभावना कम है। भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड के मामलों की स्वचालित पुष्टि उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है, जिसके बाद ही सजा अंतिम रूप लेती है।

डिजिटल अपराध और कड़ा संदेश

यह मामला डिजिटल प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग और डार्क वेब के जरिए संचालित अपराधों की गंभीरता को उजागर करता है। जांच एजेंसियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े ऐसे मामलों में तकनीकी निगरानी और अंतरराज्यीय समन्वय बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बाल यौन शोषण और ऑनलाइन आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ कड़ा संदेश है। अदालत ने न केवल दोषियों को कठोर सजा दी, बल्कि पीड़ित बच्चों के पुनर्वास और क्षतिपूर्ति पर भी विशेष ध्यान दिया।

न्यायिक इतिहास में महत्वपूर्ण फैसला

बांदा की विशेष पॉक्सो अदालत का यह फैसला न्यायिक इतिहास में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 50 नाबालिगों के शोषण और आपत्तिजनक सामग्री के अवैध व्यापार जैसे गंभीर अपराध में फांसी की सजा और भारी जुर्माना न्यायालय की सख्ती को दर्शाता है। अब मामला उच्च न्यायालय की पुष्टि और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल, यह निर्णय बाल सुरक्षा और डिजिटल अपराधों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।


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