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UP के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने 100 बटुकों का किया अभिनंदन, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया ‘राजनीति’
गुरुवार को उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने अपने सरकारी आवास पर 100 बटुकों (वैदिक छात्रों) का सम्मान किया। उन्होंने बटुकों पर पुष्पवर्षा की, तिलक लगाया और उन्हें सम्मानित किया। इस अवसर पर पाठक ने कहा, “चोटी खींचने वालों को पाप लगेगा।”

लखनऊ। प्रयागराज के माघ मेले से शुरू हुआ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद अब राजधानी लखनऊ तक पहुंच गया है। गुरुवार को उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने अपने सरकारी आवास पर 100 बटुकों (वैदिक छात्रों) का सम्मान किया। उन्होंने बटुकों पर पुष्पवर्षा की, तिलक लगाया और उन्हें सम्मानित किया। इस अवसर पर पाठक ने कहा, “चोटी खींचने वालों को पाप लगेगा।” हालांकि, इस कार्यक्रम को राजनीतिक हलकों में शंकराचार्य विवाद के संदर्भ में ‘डैमेज कंट्रोल’ के तौर पर देखा जा रहा है।
सम्मान समारोह और राजनीतिक संदेश
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने बटुकों के सम्मान के दौरान कहा कि सनातन परंपरा और वैदिक संस्कृति का सम्मान करना सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने संकेतों में प्रयागराज की उस घटना का जिक्र किया, जिसमें एक बटुक की चोटी खींचे जाने का आरोप सामने आया था।
पाठक के बयान “चोटी खींचने वालों को पाप लगेगा” को धार्मिक आस्था के सम्मान और परंपरा की रक्षा के संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कार्यक्रम में मौजूद बटुकों का विधिवत तिलक कर अभिनंदन किया गया और पुष्पवर्षा की गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कार्यक्रम उस विवाद के बाद सरकार की छवि को संतुलित करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है, जिसने धार्मिक और राजनीतिक बहस को जन्म दिया है।
अविमुक्तेश्वरानंद का तीखा जवाब
उधर, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इस सम्मान समारोह पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि सरकार ने यह आयोजन करके अपनी भावना तो जाहिर की है, लेकिन इससे प्रयागराज में हुई घटना का ‘पाप’ नहीं धुल सकता। उन्होंने कहा, “101 बटुकों पर पुष्पवर्षा कर और तिलक कर सम्मानित करना कोई कार्रवाई नहीं है, यह राजनीति है।” उनका आरोप है कि सरकार को उस वास्तविक पीड़ित बटुक के पास जाना चाहिए था, जिसकी चोटी खींची गई थी। अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि अपने पसंद के बटुकों को बुलाकर चंदन लगाना समाधान नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने 20 दिन का अल्टीमेटम दिया था, जो 11 मार्च को पूरा हो रहा है। उस दिन वे लखनऊ जाएंगे और जांच के बाद जो निष्कर्ष निकलेगा, उसे सार्वजनिक करेंगे।
प्रयागराज से शुरू हुआ विवाद
यह पूरा विवाद प्रयागराज के माघ मेले के दौरान शुरू हुआ था। वहां एक बटुक के साथ कथित दुर्व्यवहार की घटना सामने आई, जिसके बाद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने प्रशासन और सरकार पर सनातन परंपरा के अपमान का आरोप लगाया। मामला बढ़ने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस पर टिप्पणी की। हालांकि उन्होंने सीधे नाम नहीं लिया, लेकिन संकेतों में ‘कालनेमि’ शब्द का प्रयोग किया, जिससे विवाद और गहरा गया। बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि “कोई भी खुद को शंकराचार्य नहीं लिख सकता।” इस बयान के बाद धार्मिक पदवी और मान्यता को लेकर नई बहस छिड़ गई।
विपक्ष का हमला
सीएम योगी के बयान पर विपक्ष, विशेषकर समाजवादी पार्टी (सपा), ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा, “दूसरों से सर्टिफिकेट मांगने वालों से यदि सर्टिफिकेट मांग लिया जाए तो वह कौन सा सर्टिफिकेट देंगे?” विपक्ष का आरोप है कि सरकार धार्मिक मुद्दों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है। वहीं, भाजपा का कहना है कि सरकार सनातन परंपराओं और धार्मिक गरिमा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
11 मार्च पर नजर
अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा दिए गए 20 दिन के अल्टीमेटम की अवधि 11 मार्च को पूरी हो रही है। उन्होंने घोषणा की है कि वे उस दिन लखनऊ आकर जांच के आधार पर अपना निष्कर्ष सार्वजनिक करेंगे। इस घोषणा के बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों में हलचल बढ़ गई है। माना जा रहा है कि 11 मार्च को यह विवाद एक नए मोड़ पर पहुंच सकता है।
डैमेज कंट्रोल या सांस्कृतिक संदेश?
ब्रजेश पाठक द्वारा 100 बटुकों के सम्मान को लेकर दो तरह की व्याख्याएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे सनातन संस्कृति के प्रति सम्मान का प्रतीक मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे विवाद के बाद छवि सुधारने की कोशिश के रूप में देख रहा है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि जिस समय धार्मिक पदवी, परंपरा और सम्मान को लेकर बहस चल रही हो, उस समय ऐसा आयोजन निश्चित रूप से व्यापक संदेश देने की कोशिश होता है।
प्रदेश की राजनीति में गर्माहट
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और राज्य सरकार के बीच बयानबाजी ने प्रदेश की राजनीति में नई गर्माहट ला दी है। एक ओर सरकार धार्मिक परंपराओं के सम्मान का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर शंकराचार्य इसे पर्याप्त कार्रवाई नहीं मान रहे हैं। आने वाले दिनों में 11 मार्च की तारीख और सदन की कार्यवाही के दौरान इस मुद्दे के और उछलने की संभावना है।
विवाद थमने वाला नहीं
लखनऊ में 100 बटुकों के सम्मान का आयोजन ऐसे समय हुआ है, जब शंकराचार्य विवाद अपने चरम पर है। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के बयान और अविमुक्तेश्वरानंद की प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मामला अभी थमने वाला नहीं है। अब निगाहें 11 मार्च पर टिकी हैं, जब शंकराचार्य अपनी जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक करने वाले हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह विवाद धार्मिक विमर्श तक सीमित रहता है या राजनीतिक बहस को और तीखा बना देता है।
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