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UP के 68 हजार से ज्यादा राज्यकर्मी रडार पर, संपत्ति का ब्योरा नहीं तो वेतन बंद
मुख्य सचिव एस.पी. गोयल ने हाल ही में सभी विभागाध्यक्षों, कार्यालयाध्यक्षों और शासन के अधिकारियों को निर्देश जारी किए थे कि प्रदेश के सभी राज्यकर्मी 31 जनवरी तक वर्ष 2025 तक की अपनी चल-अचल संपत्ति का विवरण मानव संपदा पोर्टल पर अनिवार्य रूप से अपलोड करें।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को सख्ती से लागू करते हुए योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्यकर्मियों की चल-अचल संपत्ति का ब्योरा अनिवार्य कर दिया है। इसके बावजूद 68 हजार से अधिक राज्यकर्मियों ने 31 जनवरी तक मानव संपदा पोर्टल पर अपनी संपत्ति का विवरण अपलोड नहीं किया। नतीजतन इन कर्मचारियों का जनवरी माह का वेतन फरवरी में नहीं जारी किया जाएगा। सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि आदेश की अनदेखी करने वालों के खिलाफ आगे कड़ी कार्रवाई भी हो सकती है।
मुख्य सचिव के निर्देश के बाद भी लापरवाही
मुख्य सचिव एस.पी. गोयल ने हाल ही में सभी विभागाध्यक्षों, कार्यालयाध्यक्षों और शासन के अधिकारियों को निर्देश जारी किए थे कि प्रदेश के सभी राज्यकर्मी 31 जनवरी तक वर्ष 2025 तक की अपनी चल-अचल संपत्ति का विवरण मानव संपदा पोर्टल पर अनिवार्य रूप से अपलोड करें। यह निर्देश उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली, 1956 के नियम-24 के तहत जारी किया गया था। इसके अनुसार प्रदेश के कुल 8,66,261 राज्यकर्मियों को संपत्ति का ब्योरा देना था। विभागों के नोडल अधिकारियों और आहरण-वितरण अधिकारियों (डीडीओ) को स्पष्ट निर्देश थे कि जो कर्मचारी समयसीमा तक विवरण अपलोड नहीं करेंगे, उनका वेतन रोक दिया जाए।
68,236 कर्मचारियों ने नहीं दिया विवरण
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, निर्धारित समयसीमा बीतने तक 68,236 राज्यकर्मियों ने संपत्ति का ब्योरा पोर्टल पर अपलोड नहीं किया। यह कुल कर्मचारियों का लगभग आठ प्रतिशत है।
श्रेणीवार स्थिति इस प्रकार है:
तृतीय श्रेणी: 34,926 कर्मचारी
चतुर्थ श्रेणी: 22,624 कर्मचारी
द्वितीय श्रेणी: 7,204 कर्मचारी
प्रथम श्रेणी: 2,628 अधिकारी
अन्य/अवर्गीकृत: 854 कर्मचारी
इन सभी का जनवरी माह का वेतन फरवरी में रोका जाएगा। नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने स्पष्ट किया है कि जिन कर्मचारियों ने विधिवत संपत्ति विवरण अपलोड नहीं किया है, उन्हें वेतन का भुगतान नहीं किया जाएगा।
‘बड़े साहब’ पीछे, ‘बाबू’ आगे
दिलचस्प तथ्य यह है कि संपत्ति का विवरण देने में उच्च अधिकारियों की तुलना में निचले वर्ग के कर्मचारी अधिक आगे रहे। मानव संपदा पोर्टल पर अब तक 8.18 लाख से अधिक कर्मचारियों ने अपनी संपत्ति का ब्योरा अपलोड कर दिया है। इनमें तृतीय श्रेणी के 96 प्रतिशत कर्मचारियों ने विवरण दिया। चतुर्थ श्रेणी के अधिकांश कर्मचारियों ने भी समय पर जानकारी दी। प्रथम श्रेणी के केवल 83 प्रतिशत अधिकारियों ने ही विवरण प्रस्तुत किया।
संपत्ति न बताने वालों में प्रतिशत के हिसाब से प्रथम श्रेणी के 16.89 प्रतिशत और द्वितीय श्रेणी के 13.92 प्रतिशत अधिकारी शामिल हैं। वहीं चतुर्थ श्रेणी के 7.34 प्रतिशत और तृतीय श्रेणी के केवल 4.03 प्रतिशत कर्मचारी ही विवरण देने से चूके। यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि संपत्ति खुलासा करने में उच्च अधिकारियों में अपेक्षाकृत अधिक हिचक देखी गई।
587 आईएएस अधिकारियों ने दिया ब्योरा
सरकार की सख्ती का असर यह रहा कि सभी 587 आईएएस अधिकारियों ने स्पैरो (SMART Performance Appraisal Report Recording Online Window) पोर्टल के माध्यम से अपनी संपत्ति का विवरण दे दिया है। प्रमुख सचिव एम. देवराज ने कहा कि छह जनवरी को ही मुख्य सचिव ने डीडीओ को निर्देश दिए थे कि संपत्ति का विवरण देने वाले कर्मचारियों को ही वेतन जारी किया जाए। यदि किसी कर्मचारी को बिना विवरण दिए वेतन मिला तो संबंधित डीडीओ से जवाब-तलब कर कार्रवाई की जाएगी।
संपत्ति न बताने वाले संदेह के घेरे में
सूत्रों के अनुसार सरकार ऐसे कर्मचारियों को संदेह की दृष्टि से देख रही है, जिन्होंने अनिवार्यता के बावजूद संपत्ति का खुलासा नहीं किया। विशेषकर प्रथम और द्वितीय श्रेणी के अधिकारियों के खिलाफ जांच की संभावना जताई जा रही है। जानकारों का मानना है कि कुछ अधिकारी विभागीय अनुमति के बिना खरीदी गई संपत्ति के कारण खुलासा करने से बच रहे हैं। यदि जांच में ऐसी संपत्ति सामने आती है, जिसके लिए पूर्व अनुमति नहीं ली गई, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तय है। इसी तरह, यदि अपलोड किए गए विवरण में किसी संपत्ति का जिक्र नहीं किया गया और शिकायत या जांच में वह सामने आती है, तो भी कार्रवाई हो सकती है।
किन विभागों में ज्यादा लापरवाही?
जिन प्रमुख विभागों में सर्वाधिक कर्मचारियों ने संपत्ति का विवरण नहीं दिया, उनमें स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा, बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा, लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), राजस्व, पंचायती राज, गृह, पशुधन, वित्त, वन, बाल विकास एवं पुष्टाहार और सिंचाई विभाग शामिल हैं। इन विभागों में बड़ी संख्या में कर्मचारियों के विवरण लंबित हैं, जिससे प्रशासनिक हलकों में चिंता है।
भ्रष्टाचार पर सरकार का कड़ा रुख
योगी सरकार पहले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाने की नीति पर जोर देती रही है। समय-समय पर निलंबन, जांच और विभागीय कार्रवाई की घटनाएं सामने आती रही हैं। संपत्ति का वार्षिक विवरण अनिवार्य करना इसी नीति का हिस्सा है, ताकि आय से अधिक संपत्ति के मामलों की पहचान हो सके और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल पोर्टल के माध्यम से संपत्ति विवरण लेने से भविष्य में डेटा विश्लेषण आसान होगा और संदिग्ध मामलों की पहचान तेजी से की जा सकेगी।
चिंता का विषय
सरकार ने संकेत दिए हैं कि यदि कर्मचारी जल्द से जल्द विवरण अपलोड नहीं करते, तो वेतन रोकने के अलावा विभागीय जांच भी शुरू की जा सकती है। वेतन रुकने का सीधा असर कर्मचारियों और उनके परिवारों पर पड़ेगा, जिससे माना जा रहा है कि अधिकांश कर्मचारी जल्द ही पोर्टल पर जानकारी अपलोड कर देंगे। हालांकि, उच्च श्रेणी के अधिकारियों द्वारा अपेक्षाकृत कम अनुपालन प्रशासनिक तंत्र के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
मानव संपदा पोर्टल पर संपत्ति विवरण अनिवार्य करने का फैसला योगी सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। लेकिन 68 हजार से अधिक कर्मचारियों द्वारा समयसीमा तक जानकारी न देना प्रशासनिक अनुशासन पर सवाल खड़ा करता है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि वेतन रोकने के फैसले के बाद कितनी तेजी से शेष कर्मचारी अपना विवरण अपलोड करते हैं और क्या सरकार वास्तव में जांच और कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ती है।
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