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क्‍या था सुपरटेक का मायाजाल, जिसमें फंस गए 51,000 फ्लैट खरीदार?, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब मिलेगा घर

सुप्रीम कोर्ट ने कर्ज में डूबी रियल एस्टेट कंपनी सुपरटेक के 16 अधूरे आवासीय प्रोजेक्टों को पूरा करने की जिम्मेदारी सरकारी उपक्रम नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी) को सौंपने के आदेश को बरकरार रखा है।

क्‍या था सुपरटेक का मायाजाल, जिसमें फंस गए 51,000 फ्लैट खरीदार?, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब मिलेगा घर
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नई दिल्ली। एक दशक से अधिक समय से अपने सपनों के घर का इंतजार कर रहे करीब 51,000 फ्लैट खरीदारों को आखिरकार राहत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कर्ज में डूबी रियल एस्टेट कंपनी सुपरटेक के 16 अधूरे आवासीय प्रोजेक्टों को पूरा करने की जिम्मेदारी सरकारी उपक्रम नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी) को सौंपने के आदेश को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन परियोजनाओं का निर्माण कार्य बिना किसी बाधा के तेजी से पूरा किया जाए। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए यह आदेश दिया। अनुच्छेद-142 सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने की शक्ति देता है।

एनसीएलएटी के आदेश पर मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसंबर 2024 को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) द्वारा दिए गए आदेश को सही ठहराया। एनसीएलएटी ने सुपरटेक की 16 अधूरी आवासीय परियोजनाओं को एनबीसीसी को सौंपने का निर्देश दिया था। इस आदेश को एपेक्स हाइट प्राइवेट लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान 21 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एनसीएलएटी के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। लेकिन अब विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने अपीलों और अर्जियों को निस्तारित करते हुए एनसीएलएटी के फैसले को बरकरार रखा है।

निर्माण कार्य में बाधा नहीं डालेंगे अन्य न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया है कि एनबीसीसी द्वारा किए जाने वाले निर्माण कार्य में कोई कानूनी अड़चन न आए। अदालत ने आदेश दिया है कि सभी ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट इस मामले में ऐसा कोई आदेश पारित नहीं करेंगे जिससे परियोजनाओं के निर्माण में रुकावट उत्पन्न हो। पीठ ने स्पष्ट किया कि निर्माण कार्य की गति और गुणवत्ता दोनों पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि घर खरीदारों को पूरी तरह तैयार फ्लैट सौंपे जा सकें।

2010-12 में बुक हुए थे फ्लैट

सुपरटेक के जिन 16 प्रोजेक्टों को पूरा करने का आदेश दिया गया है, वे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा और कर्नाटक में स्थित हैं। इनमें वर्ष 2010 से 2012 के बीच करीब 51,000 लोगों ने फ्लैट बुक कराए थे। कई परियोजनाओं में काम वर्षों से रुका हुआ था, जिससे खरीदारों को भारी आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने बैंक ऋण लेकर बुकिंग की थी और वे एक साथ किराया और ईएमआई चुकाने को मजबूर थे।

खरीदारों को प्राथमिकता: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सुपरटेक के वित्तीय और परिचालन ऋणदाताओं के हितों का ध्यान तभी रखा जा सकता है, जब घर खरीदारों को पूर्ण रूप से तैयार मकान सौंप दिए जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि फ्लैटों में बिजली, पानी, सीवेज कनेक्शन जैसी बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। साथ ही परियोजनाओं में सड़कों, पार्क और अन्य सामुदायिक सुविधाओं का भी समुचित विकास किया जाए। कोर्ट ने एनबीसीसी को निर्देश दिया कि वह एनसीएलएटी द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के मार्गदर्शन में तेजी से काम पूरा करे। समिति को भी परियोजनाओं की निगरानी और सहयोग के निर्देश दिए गए हैं।

एनबीसीसी की तीन चरणों में योजना

एनबीसीसी ने एनसीएलएटी के समक्ष इन परियोजनाओं को तीन चरणों में पूरा करने की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।

पहला चरण: इको-विलेज-2 (ग्रेटर नोएडा), रोमानो (नोएडा), केपटाउन (नोएडा), जार सूट्स (ग्रेटर नोएडा), इको-विलेज-3 (ग्रेटर नोएडा), स्पोर्ट्स विलेज (ग्रेटर नोएडा) और इको-सिटी (नोएडा)।

दूसरा चरण: नार्थआई (नोएडा), अपकंट्री (यमुना एक्सप्रेसवे), इको-विलेज-1 (ग्रेटर नोएडा), मेरठ स्पोर्ट्स सिटी (मेरठ) और ग्रीन विलेज (मेरठ)।

तीसरा चरण: हिलटाउन (गुरुग्राम), अराविल (गुरुग्राम), रिवरक्रेस्ट (रुद्रपुर), दून स्क्वायर (देहरादून) और मिकासा (बेंगलुरु)।

एनबीसीसी का प्रस्ताव है कि परियोजनाओं की मौजूदा स्थिति और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर क्रमबद्ध तरीके से निर्माण कार्य पूरा किया जाए।

सुपरटेक की दलील खारिज

सुनवाई के दौरान सुपरटेक की ओर से पेश वकील ने दावा किया कि कई परियोजनाओं में 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और शेष कार्य 24 महीनों में पूरा किया जा सकता है। हालांकि घर खरीदारों की ओर से वरिष्ठ वकील एमएल लाहोती, अश्वनी उपाध्याय और अन्य ने इसका विरोध किया। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि परियोजनाओं को एनबीसीसी को सौंपा जाए, क्योंकि आम्रपाली मामले में एनबीसीसी ने सफलतापूर्वक अधूरे प्रोजेक्ट पूरे किए थे। सभी पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनसीएलएटी के आदेश को बरकरार रखते हुए एनबीसीसी को जिम्मेदारी सौंप दी।

आम्रपाली मॉडल पर भरोसा

आम्रपाली समूह के अधूरे प्रोजेक्टों को पूरा करने में एनबीसीसी की भूमिका को अदालत ने पहले सराहा था। उसी अनुभव के आधार पर घर खरीदारों ने सुपरटेक परियोजनाओं को भी एनबीसीसी को सौंपने की मांग की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी उपक्रम के रूप में एनबीसीसी के पास वित्तीय पारदर्शिता, तकनीकी विशेषज्ञता और प्रशासनिक क्षमता है, जिससे बड़े पैमाने पर लंबित परियोजनाओं को व्यवस्थित ढंग से पूरा किया जा सकता है।

खरीदारों के लिए उम्मीद की किरण

करीब 51,000 परिवारों के लिए यह फैसला उम्मीद की किरण लेकर आया है। वर्षों से लंबित परियोजनाओं के कारण कई खरीदारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश और निगरानी में निर्माण कार्य आगे बढ़ने की संभावना है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि परियोजनाओं के क्रियान्वयन में कोई बाधा आती है, तो संबंधित पक्ष सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं। इससे खरीदारों को न्यायिक संरक्षण का भरोसा मिला है।

एक अहम मिसाल


अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि एनबीसीसी किस गति और गुणवत्ता के साथ इन परियोजनाओं को पूरा करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, परियोजनाओं की वित्तीय संरचना, शेष कार्य का मूल्यांकन और समयबद्ध क्रियान्वयन इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पहलू होंगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि घर खरीदारों के हित सर्वोपरि हैं। यह फैसला न केवल सुपरटेक परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि रियल एस्टेट क्षेत्र में उपभोक्ता संरक्षण के दृष्टिकोण से भी एक अहम मिसाल बन सकता है। करीब एक दशक के इंतजार के बाद अब हजारों परिवारों को अपने घर मिलने की उम्मीद जगी है। यदि निर्माण कार्य निर्धारित समयसीमा में पूरा होता है, तो यह भारत के रियल एस्टेट सेक्टर में विश्वास बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।


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