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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से आहत जज का जमानत अर्जी की सुनवाई से इन्कार, जानें क्‍या है मामला

जस्टिस भाटिया ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके एक जमानत आदेश पर की गई टिप्पणियां उन्हें हतोत्साहित करने वाली और मनोबल गिराने वाली लगीं। उन्होंने कहा कि ऐसी टिप्पणियों का उनके न्यायिक कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से आहत जज का जमानत अर्जी की सुनवाई से इन्कार, जानें क्‍या है मामला
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लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में शुक्रवार को एक असामान्य घटनाक्रम देखने को मिला, जब जस्टिस पंकज भाटिया ने अपने समक्ष सूचीबद्ध एक जमानत याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया। उन्होंने न केवल संबंधित मामले से स्वयं को अलग कर लिया, बल्कि मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध भी किया कि भविष्य में उन्हें जमानत याचिकाओं की सुनवाई के लिए नामित न किया जाए। जस्टिस भाटिया ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके एक जमानत आदेश पर की गई टिप्पणियां उन्हें हतोत्साहित करने वाली और मनोबल गिराने वाली लगीं। उन्होंने कहा कि ऐसी टिप्पणियों का उनके न्यायिक कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

जमानत अर्जी पर सुनवाई से इंकार

यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब जस्टिस भाटिया के समक्ष अभियुक्त राकेश तिवारी की दूसरी जमानत याचिका सुनवाई के लिए प्रस्तुत हुई। मामले की सुनवाई शुरू होते ही उन्होंने 9 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा चेतराम वर्मा प्रकरण में की गई टिप्पणियों का संज्ञान लिया। उन्होंने अपने आदेश में कहा कि किसी भी न्यायाधीश के आदेश को उच्चतर अदालत द्वारा निरस्त किया जाना असामान्य नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि न्यायिक व्यवस्था में यह सामान्य प्रक्रिया है और कोई भी न्यायाधीश यह दावा नहीं कर सकता कि उसके आदेश में कभी हस्तक्षेप नहीं हुआ हो। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां उनके लिए निराशाजनक और मनोबल को प्रभावित करने वाली थीं। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने जमानत मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग करने का निर्णय लिया।

दहेज हत्या मामले में दी गई थी जमानत

मामले की पृष्ठभूमि अक्टूबर 2025 की है, जब जस्टिस पंकज भाटिया की एकल पीठ ने दहेज हत्या के एक मामले में अभियुक्त पति को जमानत दे दी थी। आरोप था कि महिला की मृत्यु गला घोंटने से हुई थी। जमानत आदेश में यह उल्लेख किया गया था कि अभियुक्त 27 जुलाई 2025 से जेल में था और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था। इसी आधार पर उसे राहत दी गई थी। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। शीर्ष अदालत ने जमानत आदेश की समीक्षा करते हुए उसे निरस्त कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि हाई कोर्ट का जमानत आदेश हाल के समय में देखे गए सबसे निराशाजनक आदेशों में से एक है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया था कि हाई कोर्ट ने अपने विवेक का उपयोग किस प्रकार किया और किन आधारों पर जमानत दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि केवल इस आधार पर कि अभियुक्त कुछ समय से जेल में है और उसका आपराधिक इतिहास नहीं है, इतने गंभीर अपराध में जमानत देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया था।

न्यायिक मर्यादा और संवेदनशीलता

जस्टिस भाटिया ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उच्चतर अदालत द्वारा आदेश को पलटना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लिया जाना चाहिए। फिर भी, उन्होंने कहा कि संबंधित टिप्पणियों का प्रभाव उनके मनोबल पर पड़ा है। उन्होंने यह संकेत दिया कि ऐसी टिप्पणियां न्यायाधीशों को हतोत्साहित कर सकती हैं। कानूनी हलकों में इस घटनाक्रम को न्यायपालिका के भीतर संवेदनशील संतुलन के रूप में देखा जा रहा है, जहां एक ओर उच्चतर अदालतों की समीक्षा की भूमिका है, वहीं दूसरी ओर अधीनस्थ न्यायाधीशों की स्वतंत्रता और मनोबल का प्रश्न भी जुड़ा है।

मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध

जस्टिस भाटिया ने अपने आदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि भविष्य में उन्हें जमानत याचिकाओं की सुनवाई के लिए न नामित किया जाए। यह अनुरोध न्यायिक प्रशासन के स्तर पर एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आमतौर पर जज अपने समक्ष आने वाले मामलों की सुनवाई से तभी अलग होते हैं जब कोई प्रत्यक्ष हित-संघर्ष हो या अन्य विशेष परिस्थितियां हों। इस मामले में जस्टिस भाटिया ने स्वयं को अलग करते हुए स्पष्ट किया कि उनका निर्णय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से उत्पन्न मानसिक प्रभाव के कारण है।

व्यापक प्रभाव और चर्चा

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटनाक्रम न्यायपालिका के भीतर संवाद और मर्यादा के मुद्दों पर बहस को जन्म दे सकता है। एक ओर सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार है कि वह अधीनस्थ अदालतों के आदेशों की समीक्षा करे और आवश्यकतानुसार कठोर टिप्पणियां करे, वहीं दूसरी ओर न्यायाधीशों के आत्मविश्वास और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता भी न्यायिक व्यवस्था की बुनियाद है।

महत्वपूर्ण घटनाक्रम


इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में जस्टिस पंकज भाटिया द्वारा जमानत मामलों से स्वयं को अलग करने का निर्णय न्यायिक प्रणाली में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद उनका यह कदम न्यायपालिका के भीतर संवेदनशील संतुलन और संवाद की आवश्यकता की ओर इशारा करता है।



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