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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा रद की, लिव-इन संबंधों और दुष्कर्म की एफआइआर पर की अहम टिप्पणी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में आजीवन कारावास की सजा को रद करते हुए कहा है कि पश्चिमी विचारों और लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा के प्रभाव में युवाओं में बिना विवाह के साथ रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा रद की, लिव-इन संबंधों और दुष्कर्म की एफआइआर पर की अहम टिप्पणी
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में आजीवन कारावास की सजा को रद करते हुए कहा है कि पश्चिमी विचारों और लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा के प्रभाव में युवाओं में बिना विवाह के साथ रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अदालत ने टिप्पणी की कि जब ऐसे सहमति-आधारित संबंध बाद में टूट जाते हैं, तो कई मामलों में दुष्कर्म की एफआइआर दर्ज करा दी जाती है, जबकि तथ्यों और साक्ष्यों से सहमति और बालिग होने की स्थिति सामने आती है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा (प्रथम) की खंडपीठ ने दी। पीठ ने विशेष न्यायाधीश (पोक्सो अधिनियम), महाराजगंज द्वारा मार्च 2024 में दिए गए उस फैसले को रद कर दिया, जिसमें अपीलार्थी चंद्रेश को विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

क्या था पूरा मामला

अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलार्थी चंद्रेश ने शिकायतकर्ता की नाबालिग बेटी को शादी का झांसा देकर बहला-फुसलाकर घर से ले गया। आरोप था कि वह पहले उसे गोरखपुर और फिर बेंगलुरु लेकर गया, जहां दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए। इसी आधार पर अपीलार्थी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 363 (अपहरण), 366 (विवाह के लिए अपहरण) सहित अन्य धाराओं और पोक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन की दलीलों को स्वीकार करते हुए अपीलार्थी को दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

हाई कोर्ट का अहम निष्कर्ष

हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया और पाया कि पीड़िता घटना के समय नाबालिग नहीं, बल्कि बालिग थी। अदालत ने विशेष रूप से अस्थि परीक्षण (ऑसिफिकेशन टेस्ट) रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें पीड़िता की उम्र लगभग 20 वर्ष आंकी गई थी। पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इस चिकित्सीय साक्ष्य पर समुचित और विधिसम्मत विचार नहीं किया। उम्र निर्धारण के मामले में जब प्रामाणिक चिकित्सीय रिपोर्ट उपलब्ध हो, तो उसे नजरअंदाज करना कानूनन उचित नहीं माना जा सकता।

विद्यालय रिकॉर्ड पर उठाए सवाल

हाई कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत विद्यालय के रिकॉर्ड को भी अविश्वसनीय माना। अदालत ने कहा कि ये दस्तावेज किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) नियमों के अनुसार दस्तावेजी रूप से मान्य नहीं थे। यानी उम्र निर्धारण के लिए जिन दस्तावेजों पर ट्रायल कोर्ट ने भरोसा किया, वे कानून की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इसके अलावा, पीड़िता की मां (गवाह-1) द्वारा बताई गई उम्र में भी गंभीर विसंगतियां पाई गईं। एफआइआर में मां ने बेटी की उम्र लगभग 18 वर्ष बताई थी, जबकि बाद में दिए गए बयानों में उम्र को लेकर अलग-अलग बातें सामने आईं।

पीड़िता का बयान: अपनी मर्जी से गई थी

अदालत ने पीड़िता के बयान को भी महत्वपूर्ण माना। पीड़िता ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि वह अपनी मर्जी से घर छोड़कर अपीलार्थी के साथ पहले गोरखपुर और फिर बेंगलुरु गई थी। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे। इन तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले में अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाने की धाराएं स्वतः ही लागू नहीं हो सकतीं।

आईपीसी और पोक्सो में दोषसिद्धि अनुचित

खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब पीड़िता बालिग थी और अपनी इच्छा से अपीलार्थी के साथ गई थी, तो आईपीसी की धारा 363 और 366 के तहत दोषसिद्धि कानून के अनुसार बिल्कुल अनुचित है। इसी तरह, पोक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी ठहराना भी टिकाऊ नहीं है, क्योंकि पोक्सो कानून का मूल आधार ही पीड़ित का नाबालिग होना है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि पीड़िता घटना के समय 18 वर्ष से कम उम्र की थी।

लिव-इन संबंधों पर टिप्पणी

फैसले में हाई कोर्ट ने समाज में बदलते संबंधों पर भी टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि पश्चिमी विचारधारा के प्रभाव में आज युवाओं के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को स्वीकार्यता मिल रही है। कई बार ये संबंध सहमति से शुरू होते हैं, लेकिन बाद में किसी कारणवश टूट जाते हैं। अदालत ने चेताया कि ऐसे मामलों में, केवल संबंध टूट जाने के आधार पर दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप लगाना न्याय प्रणाली का दुरुपयोग हो सकता है, यदि तथ्यों और साक्ष्यों से सहमति और बालिग होने की स्थिति स्पष्ट हो।

अपील मंजूर, सजा रद

इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह रद कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मामला सहमति-आधारित संबंध का प्रतीत होता है, जिसे गलत तरीके से आपराधिक रंग दिया गया। यह फैसला न केवल संबंधित मामले में अहम है, बल्कि सहमति, उम्र निर्धारण और पोक्सो अधिनियम के दुरुपयोग को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण को भी स्पष्ट करता है।


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