Top
Begin typing your search above and press return to search.

सच कहने का समय

क्या सच कहने का भी कोई वक्त होता है या भारत की मौजूदा राजनीति में अब इसके लिए भी समय निर्धारण किया जाएगा

सच कहने का समय
X

क्या सच कहने का भी कोई वक्त होता है या भारत की मौजूदा राजनीति में अब इसके लिए भी समय निर्धारण किया जाएगा। क्योंकि बीबीसी की गुजरात दंगों पर बनी डाक्यूमेंट्री को भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित करने के बाद भी उस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने एक साक्षात्कार में बीबीसी की डाक्यूमेंट्री की टाइमिंग पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे राजनीति से प्रेरित बताया है। श्री जयशंकर ने कहा कि लगता नहीं है कि भारत में चुनाव का मौसम शुरू हुआ है, लेकिन निश्चित रूप से यह लंदन और न्यूयॉर्क में शुरू हो गया है। यह उन लोगों द्वारा खेली जाने वाली राजनीति है जो राजनीति में आने का साहस नहीं रखते हैं। एस जयशंकर का यह बयान तब आया है जब प्रधानमंत्री मोदी पर आई डॉक्यूमेंट्री के बीच ही बीबीसी के दिल्ली और मुंबई कार्यालय पर आयकर छापे पड़े और अब इसे लेकर ब्रिटिश संसद में सवाल उठाए जा रहे हैं।

ब्रिटेन की संसद में लेबर पार्टी के नेता फ़ैबियन हेमिल्टन ने भारत सरकार की इस कार्रवाई पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, जहां सही मायनों में प्रेस अपना काम करने के लिए स्वतंत्र हो, ऐसे लोकतांत्रिक देश में बिना वजह आलोचनात्मक आवाज़ों को नहीं दबाया जा सकता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी की हर क़ीमत पर रक्षा होनी चाहिए। जबकि डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी (डीयूपी) के सांसद जिम शैनन ने कहा कि इस डॉक्यूमेंट्री की रिलीज़ के बाद से भारत में इसकी स्क्रीनिंग रोकने की पुरज़ोर कोशिशें की जा रही हैं। इसके साथ ही मीडिया और पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का दमन किया जा रहा है।

अब तक विदेशी मीडिया पर भारत की इन कार्रवाइयों की चर्चा थी, अब ब्रिटेन की संसद में इस पर चिंता व्यक्त की जा रही है, तो इसका अर्थ यही है कि कहीं न कहीं केन्द्र सरकार के फैसलों का सही संदेश नहीं जा रहा है। सरकार को अपने फैसलों की समीक्षा करनी चाहिए, लेकिन इसकी जगह जनता को ये बताया जा रहा है कि ये सब विदेशी साजिश का नतीजा है। सरकार को अपने अनुभवों से सही सलाह देने की जगह एस.जयशंकर ऐसे बयान दे रहे हैं, जो सरकार के खिलाफ ही जा रहे हैं। जैसे साक्षात्कार में उन्होंने सवाल उठाया कि 1984 में दिल्ली में बहुत कुछ हुआ था। हमने एक डॉक्यूमेंट्री क्यों नहीं देखी। जिस तरह भाजपा नेता 2002 के जवाब में 1984 की याद दिलाते हैं, उसी परिपाटी को कायम रखते हुए एस.जयशंकर ने सवाल उठाया।

लेकिन इसमें उनके होमवर्क में शायद कोई कमी रह गई। क्योंकि 2010 में 1984- ए सिख स्टोरी, इस शीर्षक से एक डाक्यूमेंट्री बीबीसी पहले ही बना चुका है। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने उस पर कभी कोई रोक नहीं लगाई, तो उसकी ऐसी चर्चा भी नहीं हुई, न ही लोगों ने उसे ढूंढ-ढूंढ कर देखा। 2014 में आपरेशन ब्लू स्टार के 30 साल पूरे होने पर बीबीसी के पत्रकार मार्क टुली ने गन फायर ओवर द गोल्डन टैंपल नाम से दो भागों की डाक्यूमेंट्री बनाई थी। इसके अलावा भी बीबीसी ने सिख दंगों पर कई तरह से कवरेज किया है। यह उसकी निष्पक्ष पत्रकारिता के अनुकूल है, लेकिन एस.जयशंकर उसे राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं।

अपने इस साक्षात्कार में एस.जयशंकर ने कांग्रेस की जमकर आलोचना की और आरोप लगाया कि गांधी परिवार ने उनके पिता के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया और उनकी काबिलियत को नजरंदाज किया। गौरतलब है कि उनके पिता डॉ के सुब्रमण्यम वरिष्ठ नौकरशाह थे और कई अहम पदों के अलावा इंस्टीट्यूट फॉर डिफेन्स स्टडीज़ एंड एनालिसिस के प्रमुख का कार्यभार उन्होंने संभाला था। जिन गुजरात दंगों पर बनी डाक्यूमेंट्री पर श्री जयशंकर सवाल उठा रहे हैं, उन्हीं दंगों पर 4 अप्रैल 2002 को डॉ. सुब्रमण्यम का आलेख धर्मा वॉज़ किल्ड इन गुजरात, यानी गुजरात में धर्म की हत्या हुई, इस शीर्षक से द टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा था। जिसमें उन्होंने हिंदुत्व और रामराज्य की सही परिभाषाएं समझाते हुए इस बात पर दुख व्यक्त किया था कि निर्दोषों की रक्षा करने में सरकार और प्रशासन विफल रहे। उन्होंने लिखा था कि गुजरात दंगों में धर्म की हत्या कर दी गई थी। जो लोग निर्दोष नागरिकों की रक्षा करने में विफल रहे हैं। वे अधर्म के दोषी हैं। क्या श्री जयशंकर अपने पिता की लेखनी और विचारों को भी गलत या राजनीति से प्रेरित बताएंगे।

भारत के विदेश मंत्री को कांग्रेस सांसद राहुल गांधी का चीन के मुद्दे पर सवाल उठाना भी नागवार गुजर रहा है। राहुल गांधी बार-बार पूछते हैं कि प्रधानमंत्री चीन का नाम क्यों नहीं लेते। चीन की सेना अतिक्रमण कर हमारी जमीन पर कब्जा जमा रही है, इस पर सरकार कुछ क्यों नहीं कहती। अपनी सरकार के बचाव में अब एस जयशंकर ने बेतुका तर्क दिया है कि कांग्रेस नेता नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वास्तविक रेखा पर सेना भेजी थी। अब तक सीमा पर जिस भी तरह से सेना की तैनाती होती है या जो भी लड़ाइयां अतीत में हुई हैं, उनमें देश के प्रधानमंत्रियों ने ही फैसला लिया है, विपक्ष में बैठे लोगों ने नहीं। फिर श्री जयशंकर इस बात का श्रेय क्यों ले रहे हैं कि मोदीजी ने सेनाएं भेजीं। उन्होंने राहुल गांधी के लिए यह भी कहा कि मैं यह नहीं कहता चीन को लेकर मुझे ही सबसे ज्यादा ज्ञान है। अगर मुझसे भी ज्यादा कोई चीन के बारे में जानता है, तो मैं उन्हें सुनने के लिए तैयार हूं। इस तरह का अहंकार न सरकार के लिए सही है, न देश के लिए।

संसद में प्रधानमंत्री कहते हैं कि वो अकेले सब पर भारी हैं और उनके विदेशमंत्री दूसरे नेताओं को चुनौती दे रहे हैं कि वे चीन के बारे में उनसे अधिक ज्ञान देकर बताएं। क्या लोकतंत्र में यह रवैया ठीक है। विचारों और फैसलों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। मगर तथ्यों की गलतबयानी और आत्ममुग्धता नुकसानदायक है।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it