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फिल्म रिव्यु : बॉक्स ऑफिस पर छाई ‘द स्काई इज पिंक’

प्रियंका चोपड़ा हॉलीवुड में अपनी एक्टिंग के जलवे बिखेरती जा रही है और जो उन्होंने इंडिया को हॉलीवुड में रिस्पेक्ट दिलाई

फिल्म रिव्यु  : बॉक्स ऑफिस पर छाई ‘द स्काई इज पिंक’
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प्रियंका चोपड़ा हॉलीवुड में अपनी एक्टिंग के जलवे बिखेरती जा रही है और जो उन्होंने इंडिया को हॉलीवुड में रिस्पेक्ट दिलाई है वो कोई और कलाकार नहीं दिला पाया इसीलिए प्रियंका हिंदी फिल्मों में कमतर ही नज़र आ रही है लेकिन जिस फिल्म में वो आती है उसमे अपने झंडे गाड़ देती है हम बात कर रहे है इस सप्ताह रिलीज़ फिल्म 'द स्काई इज पिंक' की जिसने रिलीज़ से पहले ही कई अवॉर्ड अपनी झोली में डाल लिए है। वहीं काफी समय बाद फरहान अख्तर की भी फिल्म दर्शकों को देखने को मिलेगी। फरहान अख्तर के साथ एक अच्छी बात यह है की उनकी कॉमेडी टाइमिंग और एक्सप्रेशन कमाल के होते है जो दर्शकों को बांधे रखते है।

फिल्म रिव्यु - द स्काई इज पिंक

कलाकार - प्रियंका चोपड़ा, फरहान अख्तर, जायरा वसीम और रोहित सुरेश सराफ

कहानी - हिंदी फिल्म इतिहास में दो फिल्में ऐसी आयी है जिन्होंने ज़िन्दगी को जीने का नया तरीका दिया है बावजूद इसके की वो इस दुनियां को चंद ही दिनों में अलविदा कह जाएंगे फिर भी उन्होंने ज़िन्दगी जी है वो फिल्में है राजेश खन्ना की 'आनंद' और शाहरुख़ खान की 'कल हो न हो' लेकिन इस फिल्म की खास बात है उस माता पिता की ज़िन्दगी जो अपनी बेटी को ज्यादा से ज्यादा समय तक ज़िंदा रखने के लिए हर संभव कोशिश करते है। यह एक रियल लाइफ स्टोरी है जो दिल्ली के चांदनी चौक की है। फिल्म शुरू होती है अदिति यानि प्रियंका चोपड़ा और निरेन चौधरी यानि फरहान अख्तर से जिनकी पहली संतान दुनियां को अलविदा कह चुकी है और दूसरा उनका बेटा है ईशान यानि रोहित सुरेश सराफ । यह कहानी घूमती है उनकी बेटी आयशा यानि ज़ायरा वसीम पर जो जन्म से ही एससीआईडी नामक रेयर इम्यून डेफिशिएंसी सिंड्रोम से ग्रस्त है इस बीमारी में छोटा सा इंफेक्शन भी प्राणघातक साबित होता है इसलिए ऐसे मरीज कम ही बच पाते है। आयशा का बचपन में ही बॉनमेरो ट्रांसप्लांट किया जाता है जिसकी वजह से उसे अन्य बीमारी पल्मोनरी फ्राइबोसिस हो जाती है जो फेफड़ो से सम्बंधित होती है जिसकी वजह से उसे ज़िंदा रखने की जद्दोजेहद और बढ़ जाती है। घर में सभी को पता है की आयशा ज्यादा दिन तक ज़िंदा नहीं रह सकती लेकिन अपनी बच्ची को हर ख़ुशी देने के लिए वो लोग तैयार होते है और एक मिशन की तरह उसकी ज़िन्दगी बचाने में लग जाते है जिसमे उनकी सारी सेविंग्स खत्म हो जाती है क्योंकि वो उसे बचाने के लिए लंदन तक जा पहुँचते है, यहाँ तक की उसके माता पिता उसके लिए चंदा मांगने के लिए भी नहीं झिझकते। आयशा बच तो नहीं पाती लेकिन ज़िंदा रहने की एक अच्छी कोशिश दिखा जाती है।

निर्देशन - निर्देशिका शोनाली बोस ने फिल्म में हर रंग भरने कि कोशिश की है छोटे मोटे हंसी के सीन आपके चेहरे पर मुस्कुराहट ला सकते है तो कई सीन आपकी आँखे नम कर जाएंगे, शोनाली ने अपने निर्देशन को सटीक रखा है, अपने सब्जेक्ट से नहीं हटी है और जहाँ हो सका है उन्होंने हल्का फुल्का ख़ुशी वाला सीन रखा है। फिल्म के डायलॉग दिल को छू लेते है और कुछ तो ऐसे है जो आपको याद रह जाएंगे।

एक्टिंग - फिल्म में एक्टिंग के मामले में सभी ने ज़बरदस्त परफॉरमेंस दी है चाहे वो प्रियंका हो, फरहान हो, ज़ायरा हो या फिर रोहित हो, सभी ने अपने किरदार को बखूबी जिया है और यह कहना गलत नहीं होगा की ज़ायरा और रोहित से आप पूरी फिल्म में सिर्फ प्यार और प्यार करते रहोगे। ईशान का आयशा से यह कहना की मरने के बाद तुम्हे थोड़े दिन अकेले एडजस्ट करना पड़ेगा फिर तो हम सब आ ही जाएंगे तुम्हारे पास, यह सीन आपकी आँखों को काफी हद तक नम कर देगा और महिलाऐं तो शायद रो भी दे।

कुल मिलाकर - यह फिल्म बहुत बढ़िया है जिसे देखना चाहिए क्योंकि यह ज़िन्दगी के उस फलसफे को दिखाती है की मौत का दिन तो मुअय्यन है नींद क्यों रात भर नहीं आती।

फिल्म समीक्षक

सुनील पाराशर


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