निजाम की संपत्तियों पर सोसायटी का दावा खारिज
हैदराबाद की एक अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में 'मजलिस-ए-साहबजादगन सोसायटी' की दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें अंतिम निजाम से जुड़ी कई ऐतिहासिक संपत्तियों पर अधिकार जताने की मांग की गई थी

हैदराबाद अदालत ने कहा, संपत्तियां निजी हैं
- फलकनुमा और चौमहल्ला पैलेस पर विवाद सुलझा
- 1995 का आदेश हाई कोर्ट ने पहले ही रद्द किया
हैदराबाद। हैदराबाद की एक अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में 'मजलिस-ए-साहबजादगन सोसायटी' की दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें अंतिम निजाम से जुड़ी कई ऐतिहासिक संपत्तियों पर अधिकार जताने की मांग की गई थी।
सोमवार को जारी एक जानकारी के अनुसार, यह याचिका नवाब नजफ अली खान के दायर उस बंटवारे के मुकदमे में दखल देने के लिए लगाई गई थी, जिसमें उन्होंने मीर उस्मान अली खान की संपत्तियों में अपना कानूनी हिस्सा मांगा है। इस मुकदमे में फलकनुमा पैलेस, किंग कोठी, चौमहल्ला पैलेस, पुरानी हवेली और तमिलनाडु में स्थित हेयरवुड और सीडर्स बंगले जैसी ऐतिहासिक इमारतें शामिल हैं।
यह सोसायटी, जो आसफ जाही वंश के पहले छह निजामों के करीब 4,500 वंशजों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है, ने तर्क दिया था कि ये संपत्तियां केवल सातवें निजाम की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि उन सभी की सामूहिक संपत्ति हैं। अपने दावे को साबित करने के लिए सोसायटी ने 1995 के एक पुराने अदालती आदेश का सहारा लिया था।
हालांकि, वादी ने अपने वकील मोहम्मद अदनान के माध्यम से इन दावों का जोरदार खंडन किया, जिन्होंने तर्क दिया कि सोसाइटी का विवादित संपत्तियों में कोई कानूनी या स्वामित्व हित नहीं है और उसने अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया है।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सोसायटी के तर्कों को खारिज कर दिया। जज ने कहा कि ये संपत्तियां निजी और व्यक्तिगत संपत्ति हैं, जिन्हें भारत सरकार ने 1953 में ही आधिकारिक मान्यता दे दी थी।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ताओं ने एक अहम बात छिपाई थी- जिस 1995 के आदेश का वे जिक्र कर रहे थे, उसे हाई कोर्ट ने बाद में रद्द कर दिया था।
अदालत ने साफ किया कि यह मुकदमा केवल नवाब नजफ अली खान और उनके परिवार के सदस्यों के बीच का एक पारिवारिक बंटवारा है, ताकि वे अपना हिस्सा तय कर सकें। यह पूरे आसफ जाही परिवार या अन्य वंशजों के उत्तराधिकार के अधिकारों को तय करने के लिए नहीं है। अदालत ने आगे कहा कि सोसायटी ऐसा कोई भी दस्तावेज पेश नहीं कर पाई जिससे यह साबित हो कि वह या उसके सदस्य इन संपत्तियों के सह-मालिक या हिस्सेदार हैं।
अदालत ने आगे यह भी कहा कि संस्था ऐसे कोई दस्तावेज पेश करने में विफल रही है जिससे यह साबित हो सके कि संगठन या उसके सदस्य मुकदमे में सूचीबद्ध संपत्तियों में सह-मालिक, लाभार्थी या हितधारक के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। इस फैसले को अंतिम निजाम की संपत्तियों से जुड़े विवाद में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है, जिससे यह साफ हो गया है कि यह मामला केवल सातवें निजाम के निजी परिवार के आपसी अधिकारों तक ही सीमित है।


