तमिलनाडु में CM विजय के एक इशारे पर सियासी संग्राम, स्टालिन के पुराने जख्म से जुड़ा विवाद; बाद में CM ने दी सफाई
तमिलनाडु की राजनीति में इतिहास और राजनीतिक प्रतीकों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में आपातकाल के दौरान स्टालिन के साथ हुई कथित प्रताड़ना का संदर्भ इस विवाद को सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाता है।

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में इन दिनों एक मामूली सा दिखने वाला हाव-भाव बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है। विधानसभा में मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के एक भाषण के दौरान जबड़े की ओर किए गए इशारे को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। द्रमुक का आरोप है कि मुख्यमंत्री का यह इशारा पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की पुरानी चोट का मजाक उड़ाने वाला था। मामला इसलिए भी संवेदनशील हो गया है क्योंकि स्टालिन की जबड़े की चोट आपातकाल के दौरान जेल में कथित प्रताड़ना से जुड़ी रही है।
विधानसभा के इशारे ने बढ़ाया राजनीतिक तापमान
विवाद की शुरुआत विधानसभा में विजय के भाषण के दौरान उनके हाथ और जबड़े से जुड़े एक हाव-भाव से हुई। द्रमुक ने इसे सामान्य शारीरिक प्रतिक्रिया मानने के बजाय राजनीतिक संकेत के तौर पर लिया। पार्टी नेताओं का कहना है कि इस इशारे का संबंध उस घटना से जोड़कर देखा जा सकता है, जब आपातकाल के दौरान स्टालिन को जेल में प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था। द्रमुक के मुताबिक, करीब पांच दशक पुराने उस दर्दनाक दौर का मजाक उड़ाना न केवल स्टालिन का अपमान है, बल्कि लोकतांत्रिक संघर्षों के इतिहास को भी हल्का करने की कोशिश है। हालांकि, विजय ने इस आरोप को खारिज करते हुए अपने हाव-भाव को पूरी तरह अनैच्छिक बताया है।
आपातकाल में गिरफ्तारी और स्टालिन की चोट
इस विवाद की जड़ 1975 से 1977 के बीच लागू रहे आपातकाल तक जाती है। वर्ष 1976 में तत्कालीन युवा नेता एमके स्टालिन को मीसा यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था। मद्रास सेंट्रल जेल में उनके साथ कथित मारपीट और प्रताड़ना का मामला बाद में न्यायमूर्ति एमएम इस्माइल आयोग के समक्ष भी सामने आया। आयोग के समक्ष दिए गए बयानों के अनुसार, स्टालिन और कुछ अन्य राजनीतिक बंदियों को जेल में शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी। इसी दौरान स्टालिन के जबड़े में फ्रैक्चर होने की बात सामने आई। द्रमुक इस घटना को स्टालिन के राजनीतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण अध्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए उनके संघर्ष के प्रतीक के तौर पर पेश करती रही है।
विजय ने कहा- हाव-भाव का कोई राजनीतिक मतलब नहीं
विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि भाषण के दौरान किया गया उनका शारीरिक हाव-भाव एक आकस्मिक और अनैच्छिक अभिव्यक्ति था। उनके मुताबिक, इसका किसी व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुंचाने या किसी पुराने घटनाक्रम का मजाक उड़ाने से कोई संबंध नहीं था। मुख्यमंत्री की सफाई के बावजूद विवाद थमता नजर नहीं आया। राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है और इसे विजय तथा द्रमुक के बीच बढ़ती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
सहयोगी दल के नेता ने भी जताई नाराजगी
दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री की सहयोगी पार्टी माकपा के राज्य सचिव पी. शनमुगम ने भी इस हाव-भाव को लेकर नाराजगी जताई है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने मुख्यमंत्री के कृत्य को गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए इसकी आलोचना की। इससे विवाद को और राजनीतिक धार मिल गई है। एक ओर द्रमुक इस मामले को स्टालिन के व्यक्तिगत और राजनीतिक इतिहास से जोड़ रही है, वहीं विजय का पक्ष इसे महज एक अनैच्छिक शारीरिक प्रतिक्रिया बता रहा है।
पुराना इतिहास बना मौजूदा राजनीति का हथियार
तमिलनाडु की राजनीति में इतिहास और राजनीतिक प्रतीकों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में आपातकाल के दौरान स्टालिन के साथ हुई कथित प्रताड़ना का संदर्भ इस विवाद को सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाता है। विजय की राजनीति के उभार के बीच द्रमुक और उनके बीच पहले से मौजूद राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इस घटना के बाद और तीखी होती दिखाई दे रही है। हालांकि, विजय की ओर से इसे लेकर स्पष्टीकरण दिया जा चुका है, लेकिन विवाद ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि सार्वजनिक जीवन में नेताओं के छोटे से छोटे हाव-भाव को भी राजनीतिक संदर्भ में किस तरह देखा जाने लगा है। फिलहाल, द्रमुक के आरोप, विजय की सफाई और सहयोगी दल के नेता की आलोचना के बीच यह मामला तमिलनाडु की राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है।


