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सुषमा स्वराज मोसुल घटना पर माफी मांगे: सोशलिस्ट पार्टी

 सोशलिस्ट पार्टी ने इराक के मोसुल शहर में इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों द्वारा बंधक बनाये गए 40 मज़दूरों में से 39 की हत्या की जानकारी छिपाने का आरोप लगाया ।

सुषमा स्वराज मोसुल घटना पर माफी मांगे: सोशलिस्ट पार्टी
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नयी दिल्ली। सोशलिस्ट पार्टी ने इराक के मोसुल शहर में इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों द्वारा बंधक बनाये गए 40 मज़दूरों में से 39 की हत्या की जानकारी छिपाने का आरोप लगाते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से इसके लिए मजदूरों के परिजनों से माफी मांगने की मांग की है।

पार्टी ने आज यहाँ जारी एक विज्ञप्ति में कहा कि बंधक बनाये गए मजदूरों में से अकेले बचे हरजीत मसीह ने कल एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित साक्षात्कार में पूरी घटना का ब्योरा देते हुए कहा है कि भारत लौटने पर उसे गिरफ्तार कर कई महीनों तक हिरासत में रखने वाले सरकारी अधिकारियों ने मुझे हिदायत दी थी कि वह 39 साथी मज़दूरों के मारे जाने की सच्चाई किसी को नहीं बताए।
ऐसा करने पर उसे मृतकों के परिवार वालों के गुस्से का शिकार होना पड़ सकता है।

पार्टी के प्रमुख डॉ. प्रेम सिंह ने विज्ञप्ति में यह भी कहा हा कि हरजीत मसीह ने अधिकारियों को यह भी बताया था कि इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने 40 भारतीय मज़दूरों को जून 2014 में कारखाने से अगुवा किया था और दो दिन बाद वीरान जगह पर गोलियां मारकर हत्या कर दी थी। हरजीत मसीह एक साथी की लाश के नीचे दब कर बच गए थे।

उनके इस बयान से यह साफ़ है कि सरकार इस मामले में न केवल संसद बल्कि मज़दूरों के परिजनों से पिछले चार सालों से झूठ बोल रही थी।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि श्रीमती स्वराज ने मज़बूरी में सच्चाई उजागर की है, क्योंकि उसी दिन यानि मंगलवार 20 मार्च 2018 को इराकी अधिकारियों ने इस मामले में प्रेस कांफ्रेंस करना तय किया था।
इस घटना ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विदेशों में भारत की मज़बूत साख बनाने के दावों की भी पोल खोल दी है।

सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि सरकार इस तरह का असंवेदनशील रवैया इसीलिए अपना पाई क्योंकि इराक में मारे गए लोग साधारण मज़दूर और गरीब परिवारों से थे।

बाजारवादी मूल्यों से परिचालित शासक वर्ग ने मानवीयता का त्याग कर दिया है। इराक में मारे गए मज़दूरों के परिजनों को यह खबर सरकार से सीधे नहीं, टीवी चैनलों से मिली। इसका अर्थ है सरकार गरीबों को इस लायक भी नहीं समझती कि उनके प्रियजनों की मौत की सूचना उन्हें दी जाए।

मारे गए एक मज़दूर 36 वर्षीय गुरचरण सिंह के पिता सरदारा सिंह ने कहा कि फिर सुषमा स्वराज काली माँ की कसम खा कर उनसे बार-बार यह क्यों कहती रहीं कि ‘बच्चे सुरक्षित हैं’? इस सवाल का उनके पास क्या जवाब है? ज़ाहिर है, सरकार मान कर चलती है कि गरीबों से सच बोलना जरूरी नहीं है।

लिहाज़ा, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि सरकार ने मृतकों के परिजनों से माफ़ी मांगना ज़रूरी नहीं समझा है।

सोशलिस्ट पार्टी की मांग है की सरकार में यदि ज़रा भी मानवता और सभ्यता शेष है तो उसे मृतकों के परिजनों से तुरंत माफी मांगनी चाहिए और मज़दूरों को अपने हितों की रक्षा के लिए कार्पोरेट समर्थक सरकार का पुरजोर विरोध करना चाहिए।

मध्य पूर्व में काम करने वाले भारतीय मज़दूर भारी मात्रा में विदेशी धन भारत में लेकर आते हैं।
उनका योगदान किसी भी मायने में प्रवासी भारतीयों से कम नहीं है।


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