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क्रिकेट में बढ़ रही ऑनलाइन नफरत, खिलाड़ियों के परिवार भी बन रहे ट्रोलिंग का निशाना

हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज ट्रेविस हेड की पत्नी जेसिका डेविस ने खुलासा किया कि विराट कोहली और ट्रेविस हेड के बीच मैदान पर हुई नोकझोंक के बाद उनके परिवार को सोशल मीडिया पर भारी ट्रोलिंग और अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। इसी तरह पंजाब किंग्स से जुड़े एक वीडियो में नजर आने के बाद भारतीय क्रिकेटर श्रेयस अय्यर की बहन श्रेष्ठा अय्यर को भी ऑनलाइन निशाना बनाया गया।

क्रिकेट में बढ़ रही ऑनलाइन नफरत, खिलाड़ियों के परिवार भी बन रहे ट्रोलिंग का निशाना
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नई दिल्ली : Online Hatred in Cricket: क्रिकेट लंबे समय से खेल भावना और जुनून का प्रतीक माना जाता रहा है, लेकिन अब यह खेल सोशल मीडिया पर बढ़ती नफरत और ट्रोलिंग की वजह से एक नए संकट का सामना कर रहा है। खिलाड़ियों के बीच मैदान पर होने वाली सामान्य बहस या प्रतिस्पर्धा अब इंटरनेट मीडिया पर संगठित ‘हेट कैंपेन’ का रूप लेने लगी है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अब खिलाड़ी ही नहीं, उनके परिवार भी ऑनलाइन दुर्व्यवहार का शिकार बनने लगे हैं।

हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज ट्रेविस हेड की पत्नी जेसिका डेविस ने खुलासा किया कि विराट कोहली और ट्रेविस हेड के बीच मैदान पर हुई नोकझोंक के बाद उनके परिवार को सोशल मीडिया पर भारी ट्रोलिंग और अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। इसी तरह पंजाब किंग्स से जुड़े एक वीडियो में नजर आने के बाद भारतीय क्रिकेटर श्रेयस अय्यर की बहन श्रेष्ठा अय्यर को भी ऑनलाइन निशाना बनाया गया। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि क्रिकेट के इर्द-गिर्द सोशल मीडिया पर एक ऐसा माहौल बन चुका है, जहां समर्थन और आलोचना की सीमाएं तेजी से खत्म हो रही हैं।

‘फैन वार’ से आगे बढ़ चुकी है स्थिति

विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल भावनात्मक फैन वार नहीं रह गया है। पिछले कुछ वर्षों में खिलाड़ियों की लोकप्रियता को डिजिटल तरीके से बढ़ाने और विरोधियों को निशाना बनाने का एक संगठित नेटवर्क तैयार हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, कई एजेंसियां खिलाड़ियों के समर्थन या विरोध में सोशल मीडिया अभियान चलाने के लिए पैसे लेती हैं। इन अभियानों का मकसद किसी खिलाड़ी की छवि को चमकाना या दूसरे खिलाड़ी के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाना होता है। उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि किसी खिलाड़ी के खिलाफ ऑनलाइन नफरत फैलाने वाले अभियान के लिए 25 हजार रुपये से लेकर दो लाख रुपये तक की रकम ली जाती है। अभियान कितने समय तक चलाना है और उसे कितनी व्यापक पहुंच देनी है, इसके आधार पर कीमत तय होती है।

फॉलोअर्स और ब्रांड वैल्यू का बढ़ता दबाव

डिजिटल दौर में खिलाड़ियों की सोशल मीडिया लोकप्रियता सीधे उनकी ब्रांड वैल्यू से जुड़ गई है। कंपनियां अब विज्ञापन के लिए केवल मैदान पर प्रदर्शन नहीं, बल्कि ऑनलाइन फॉलोअर्स और एंगेजमेंट को भी अहम मानती हैं। पहले जहां खिलाड़ियों की कमाई का बड़ा हिस्सा टीवी विज्ञापनों से आता था, वहीं अब डिजिटल प्लेटफॉर्म एक बड़ा कारोबारी माध्यम बन चुके हैं। इसी बदलाव के साथ स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनियों ने सोशल मीडिया ट्रैक्शन बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। कई कंपनियां खिलाड़ियों के लिए फैन पेज, एग्रीगेटर अकाउंट और ट्रेंडिंग कैंपेन चलाने लगीं। शुरुआत में इसका उद्देश्य लोकप्रियता बढ़ाना था, लेकिन धीरे-धीरे यह प्रतिस्पर्धा नकारात्मक प्रचार और ट्रोलिंग तक पहुंच गई।

एल्गोरिद्म ने बढ़ाया विवाद और नफरत

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का एल्गोरिद्म भी इस समस्या को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, विवादित और आक्रामक पोस्ट ज्यादा तेजी से वायरल होती हैं, जिससे नफरत फैलाने वाले कंटेंट को अधिक दृश्यता मिलती है। यही कारण है कि अब विश्लेषण या खेल पर चर्चा से ज्यादा ध्यान विवादों और व्यक्तिगत टिप्पणियों पर दिया जाने लगा है। एक खिलाड़ी को “महान” साबित करने के लिए दूसरे खिलाड़ी को निशाना बनाना आम प्रवृत्ति बनती जा रही है। इस माहौल में कई फैन ग्रुप और अनौपचारिक डिजिटल नेटवर्क लगातार एक-दूसरे के खिलाफ अभियान चलाते रहते हैं। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब इसमें खिलाड़ियों के परिवारों को भी घसीटा जाने लगता है।

परिवारों तक पहुंच रही ऑनलाइन हिंसा

पहले ट्रोलिंग का दायरा खिलाड़ियों तक सीमित था, लेकिन अब पत्नियों, बहनों और बच्चों तक को निशाना बनाया जा रहा है। इंटरनेट मीडिया पर मौजूद गुमनामी ने लोगों को बिना जवाबदेही के अभद्र टिप्पणी करने का अवसर दे दिया है। जेसिका डेविस और श्रेष्ठा अय्यर के मामलों ने दिखाया कि सोशल मीडिया पर फैली नफरत अब व्यक्तिगत जीवन को भी प्रभावित कर रही है। कई खिलाड़ी पहले भी मानसिक दबाव और ऑनलाइन दुर्व्यवहार को लेकर चिंता जता चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियां खिलाड़ियों और उनके परिवारों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकती हैं।

क्रिकेट की व्यावसायिक व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

विश्लेषकों का मानना है कि क्रिकेट के बढ़ते व्यावसायीकरण ने इस डिजिटल ध्रुवीकरण को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया है। सोशल मीडिया एंगेजमेंट और ट्रेंडिंग को सफलता का पैमाना बना दिए जाने से विवाद और नफरत भी “कंटेंट” में बदल गए हैं। अब वही व्यवस्था इस माहौल के दुष्परिणाम देखकर चिंतित नजर आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि खिलाड़ियों की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अपनाए गए डिजिटल तरीकों ने एक ऐसी संस्कृति को जन्म दिया है, जहां आलोचना और अपमान के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। क्रिकेट को स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और खेल भावना से जोड़कर देखने वाले लोग मानते हैं कि अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खेल संस्थाओं और टीम प्रबंधन को मिलकर इस जहरीले माहौल पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।


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