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उधार की बंदूक से एशियाई खेलों के स्वर्ण तक पहुंचीं नीरू ढांडा, रचा ऐतिहासिक रिकॉर्ड

नीरू को 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में लक्ष्य श्योराण की रजत पदक जीतने की उपलब्धि ने निशानेबाजी की ओर आकर्षित किया। उस समय उन्हें इस खेल के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी। लेकिन लक्ष्य की सफलता ने उन्हें खुद निशानेबाजी आजमाने के लिए प्रेरित किया।

उधार की बंदूक से एशियाई खेलों के स्वर्ण तक पहुंचीं नीरू ढांडा, रचा ऐतिहासिक रिकॉर्ड
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नागोया : हरियाणा के जींद जिले के एक किसान परिवार से निकलकर नीरू ढांडा ने एशियाई खेलों में भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया। 26 वर्षीय नीरू ने मंगलवार को महिला ट्रैप स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता। इसके साथ ही वह एशियाई खेलों में व्यक्तिगत शॉटगन स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं। नीरू की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनका निशानेबाजी का सफर किसी बड़े संसाधन या महंगी सुविधाओं के साथ शुरू नहीं हुआ था। रिश्ते के भाई लक्ष्य श्योराण से मिली प्रेरणा, परिवार का साथ और मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी से मिली मदद ने उनके सपने को दिशा दी।

रिश्ते के भाई की सफलता से मिली प्रेरणा

नीरू को 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में लक्ष्य श्योराण की रजत पदक जीतने की उपलब्धि ने निशानेबाजी की ओर आकर्षित किया। उस समय उन्हें इस खेल के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी। लेकिन लक्ष्य की सफलता ने उन्हें खुद निशानेबाजी आजमाने के लिए प्रेरित किया। नीरू ने ऐतिहासिक जीत के बाद बताया कि निशानेबाजी शुरू करने से पहले उन्हें इस खेल के बारे में लगभग कुछ भी पता नहीं था। लक्ष्य के पदक ने उन्हें इस खेल में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

तालाब के किनारे टिन के डिब्बे से अभ्यास

नीरू ने शुरुआत बेहद साधारण परिस्थितियों में की। वह लक्ष्य के पिता की भारतीय निर्मित बंदूक लेकर भोपाल के एक तालाब के पास अभ्यास करती थीं। शुरुआती दिनों में टिन के डिब्बों को अस्थायी निशाना बनाकर उन्होंने खुद अभ्यास किया। 2019 में जब वह भोपाल पहुंचीं, तब निशानेबाजी में उनका अनुभव करीब छह महीने का ही था। लक्ष्य के माता-पिता उन्हें मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी लेकर गए। वहां उन्हें मुफ्त बंदूक और कारतूस उपलब्ध कराए गए। संस्थागत सहयोग मिलने के बाद उनके लिए इस महंगे खेल में आगे बढ़ने का रास्ता खुला।

किसान परिवार से अंतरराष्ट्रीय मंच तक

नीरू के पिता किसान हैं और मां गृहिणी हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों वाले परिवार के लिए निशानेबाजी जैसे खेल का खर्च उठाना आसान नहीं था। ऐसे में अकादमी से मिली सहायता ने उनके करियर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धीरे-धीरे नीरू ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई। इसी साल इटली के लोनाटो में विश्व कप में पदक जीतने के बाद उन्होंने एशियाई खेलों में भी अपनी क्षमता साबित की। महिला ट्रैप में स्वर्ण पदक ने भारतीय शॉटगन में महिला खिलाड़ियों के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की।

बीमारी के बावजूद नहीं छोड़ा लक्ष्य

नीरू का एशियाई खेलों का सफर आसान नहीं रहा। प्रतियोगिता से करीब 10 दिन पहले वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई थीं और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। बीमारी के कारण वह पूरे प्रशिक्षण शिविर में अभ्यास नहीं कर सकीं। उन्होंने बताया कि पांच दिन तक उन्होंने कुछ नहीं खाया और केवल पानी पीती रहीं। इस दौरान उनके कोच मनशेर सिंह लगातार उनके संपर्क में रहे। नीरू के मुताबिक, कोच ने उन्हें भरोसा दिलाया कि कुछ दिनों तक अभ्यास नहीं कर पाने से सब कुछ खत्म नहीं हो जाएगा। उन्होंने मानसिक रूप से उन्हें प्रतियोगिता पर ध्यान बनाए रखने में मदद की।

सैनिकों और पूर्व चैंपियन को समर्पित किया पदक

ऐतिहासिक स्वर्ण जीतने के बाद सेना की निशानेबाज नीरू ने अपना पदक देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे सैनिकों को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना का प्रतिनिधित्व करना उनके लिए हमेशा गर्व की बात रहेगी। नीरू ने अपना स्वर्ण 1978 एशियाई खेलों के चैंपियन राजा रणजीत सिंह को भी समर्पित किया, जिनका इस साल निधन हुआ। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय परिवार, कोच, भारतीय सेना और मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी से मिले सहयोग को दिया। उधार की बंदूक से शुरू हुआ नीरू ढांडा का सफर अब एशियाई खेलों के स्वर्ण तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद लगातार मेहनत, सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं।


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