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RTI के दायरे से बाहर है BCCI... केंद्रीय सूचना आयोग का बड़ा फैसला, जानें क्या है इसका मतलब

सूचना आयुक्त पी. आर. रमेश द्वारा दिए गए आदेश में कहा गया कि BCCI RTI अधिनियम की धारा 2(h) के तहत परिभाषित “पब्लिक अथॉरिटी” की श्रेणी में नहीं आता। आयोग ने स्पष्ट किया कि BCCI न तो संविधान द्वारा स्थापित संस्था है और न ही संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत गठित निकाय है।

RTI के दायरे से बाहर है BCCI... केंद्रीय सूचना आयोग का बड़ा फैसला, जानें क्या है इसका मतलब
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नई दिल्‍ली: भारतीय खेल प्रशासन से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत “लोक प्राधिकरण” नहीं है। इस निर्णय के बाद अब BCCI को RTI के तहत जानकारी देने की कानूनी बाध्यता से छूट मिल गई है। यह फैसला भारतीय खेल प्रशासन और पारदर्शिता से जुड़े बहसों पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

CIC का अहम फैसला

सूचना आयुक्त पी. आर. रमेश द्वारा दिए गए आदेश में कहा गया कि BCCI RTI अधिनियम की धारा 2(h) के तहत परिभाषित “पब्लिक अथॉरिटी” की श्रेणी में नहीं आता। आयोग ने स्पष्ट किया कि BCCI न तो संविधान द्वारा स्थापित संस्था है और न ही संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत गठित निकाय है। इसके साथ ही आयोग ने कहा कि यह संगठन तमिलनाडु सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत एक निजी संस्था है, इसलिए इसे सरकारी संस्था की तरह नहीं देखा जा सकता।

पुराने फैसले को पलटा गया

यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले 2018 में तत्कालीन सूचना आयुक्त एम. श्रीधर आचार्युलु ने BCCI को सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित किया था और उसे RTI के तहत सूचना अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, बाद में BCCI ने इस आदेश को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों के आलोक में पुनः विचार के लिए CIC को वापस भेज दिया था। नए आदेश में आयोग ने पुराने निर्णय से अलग रुख अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

CIC ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण मामलों का उल्लेख किया। इनमें “थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक बनाम केरल राज्य” और “Zee Telefilms बनाम भारत संघ” जैसे फैसले शामिल हैं। इन मामलों के आधार पर आयोग ने कहा कि केवल किसी संस्था पर सरकारी प्रभाव या नियमन होना ही उसे सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं बनाता। जब तक संस्था का गठन सरकार द्वारा न किया गया हो या उस पर गहरा और प्रत्यक्ष नियंत्रण न हो, तब तक उसे RTI के दायरे में नहीं लाया जा सकता।

सरकारी नियंत्रण और वित्तीय स्वतंत्रता

आयोग ने यह भी माना कि BCCI पर सरकार का कोई प्रत्यक्ष या व्यापक नियंत्रण नहीं है। बोर्ड अपने संचालन के लिए पूरी तरह स्वायत्त है और उसकी आय का मुख्य स्रोत मीडिया अधिकार, स्पॉन्सरशिप, आईपीएल और टिकट बिक्री है। CIC ने यह भी कहा कि कर छूट या सरकारी सुविधाएं मिलने का मतलब यह नहीं है कि किसी संस्था को “महत्वपूर्ण सरकारी वित्तपोषण” प्राप्त हो रहा है। इसलिए इस आधार पर भी BCCI को RTI के दायरे में नहीं रखा जा सकता।

“मार्केट-ड्रिवन” संस्थान के रूप में BCCI

आदेश में यह भी कहा गया कि BCCI एक ऐतिहासिक रूप से विकसित संस्था है, जो अब वैश्विक क्रिकेट अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख केंद्र बन चुकी है। इसका आधार भारत का बड़ा खेल बाजार और आईपीएल की व्यावसायिक सफलता है। आयुक्त रमेश ने टिप्पणी की कि BCCI का ढांचा पूरी तरह बाजार-आधारित (market-driven) है और इसमें सरकारी हस्तक्षेप से इसकी आर्थिक संरचना और संतुलन प्रभावित हो सकता है।

मामला कैसे शुरू हुआ

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब खेल मंत्रालय के पास एक RTI आवेदन दाखिल किया गया था, जिसमें BCCI से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। मंत्रालय ने जवाब दिया कि यह जानकारी उसके पास नहीं है क्योंकि BCCI एक निजी संस्था है। इसके बाद यह सवाल उठा कि क्या BCCI को सार्वजनिक संस्था माना जा सकता है या नहीं। इसी कानूनी बहस के चलते मामला धीरे-धीरे केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंचा।

पारदर्शिता पर बहस जारी

हालांकि इस फैसले के बाद BCCI को कानूनी रूप से RTI से छूट मिल गई है, लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस अभी भी जारी रहने की संभावना है। आयोग ने भी अपने आदेश में यह संकेत दिया कि बड़े खेल संगठनों में निष्पक्षता केवल सरकारी नियंत्रण से नहीं, बल्कि आंतरिक पारदर्शिता और मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था से सुनिश्चित की जानी चाहिए।


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