गिरती जा रही है जन्मदर, फिर भी क्यों कई महिलाएं मां नहीं बनना चाहतीं?
महिलाएं अब समझ रही हैं कि मां बनना जिंदगी का कोई तय पड़ाव नहीं है. वे अपनी शिक्षा व करियर को ज्यादा समय देना चाहती हैं.

महिलाएं अब समझने लगी हैं कि मां बनना उनकी जिंदगी का कोई तय पड़ाव नहीं है. वे अपनी शिक्षा, करियर और आर्थिक स्वावलंबन पर समय लगाना चाहती हैं. वहीं, सवाल उठने लगे हैं कि क्या इसकी कीमत देशों की अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ेगी?
33 साल की श्वेता यादव पिछले डेढ़ साल से जर्मनी के बॉन शहर में अपने पति के साथ रह रही हैं. अपनी पढ़ाई और करियर पर ध्यान दे रहीं श्वेता फिलहाल मां की जिम्मेदारी निभाने के लिए खुद को तैयार नहीं मानती. श्वेता कहती हैं, ''सुष्मिता सेन और साक्षी तंवर जैसे कई रोल मॉडल्स हमारे सामने हैं. वे खुलकर बायोलॉजिकल चाइल्ड की जगह एडॉप्शन की बात कर रही हैं. मैं पीएचडी कर रही हूं. पढ़ाई के साथ बच्चे को संभालना मुश्किल होता है. मैं अभी नहीं देख पा रही कि एक तीसरी जिंदगी को कैसे समय दिया जा सकता है जब हम दोनों अपना करियर बनाने में व्यस्त हैं?''
इसी शहर में बड़ी हुईं शार्लोटे की उम्र 35 साल है. अब वह अपने माता-पिता से अलग कमरा लेकर रहती हैं और इस समय अपनी पीएचडी थीसिस लिख रही हैं. शार्लोटे को भी पहले लगता था कि एक दिन उनके बच्चे होंगे और यह हर महिला की जिंदगी में एक स्वाभाविक कदम होता है. लेकिन समय के साथ इस बारे में उनकी सोच बदलने लगी.
वह कहती हैं, "मैं उम्र के उस पड़ाव में हूं जहां मेरे दोस्तों के बच्चे हैं. मुझे उनके आसपास रहना पसंद है. मैं एंजॉय करती हूं. लेकिन घर जाने के बाद, मैं नेटफ्लिक्स देखकर भी खुश हूं. मैं अपने दोस्तों को देखती हूं कि वो ठीक से सो नहीं पाते, थके हुए रहते हैं और उन पर काफी दबाव होता है. इसलिए मुझे लगता है कि बच्चा करने से पहले लोगों को सच में इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि वह इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठा सकते हैं."
जापान, चीन, दक्षिण कोरिया जैसे कई देश इस वक्त एक जैसी समस्या से जूझ रहे हैं. वह है घटती प्रजजन दर, बूढ़ी होती आबादी और कुशल कामगारों की भारी कमी. इसके पीछे एक कॉमन वजह बताई जा रही है. ऐसी महिलाओं और मॉडर्न कपल्स की संख्या बढ़ रही है जो बच्चा पैदा नहीं करना चाहते. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग के आंकड़े दिखाते हैं कि सिंगापुर, जापान, इटली, स्पेन, जर्मनी और भारत में फर्टिलिटी रेट 2 से नीचे जा चुका है.
लगभग 195 देशों में से दो-तिहाई देशों में महिलाएं औसतन 2.1 से कम बच्चे पैदा कर रही हैं, जो कि आबादी को स्थिर रखने के लिए जरुरी है. वहीं हांगकांग और दक्षिण कोरिया में प्रजनन दर एक से भी कम है. अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अफ्रीकी देशों में प्रजनन दर दो या उससे अधिक है.
महंगाई, करियर और पुरानी लैंगिक अपेक्षाएं
डीडब्ल्यू हिन्दी से बातचीत में शार्लोटे कहती हैं, "जर्मनी में रहने का खर्च बहुत ज्यादा है. किराया महंगा है, रोजमर्रा की चीजें महंगी हैं और बच्चा होने के बाद खर्च और बढ़ जाता है." शार्लोटे ऐसी कई हमउम्र महिलाओं को जानती हैं जिन्होंने बच्चा पैदा करने के बाद नौकरी छोड़ दी जबकि उनके पार्टनर नौकरी करते रहे. शार्लोटे बताती हैं, "इससे महिलाओं की आर्थिक आजादी और करियर पर असर पड़ता है. मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. मेरा काम मेरी पहचान का हिस्सा है."
जर्मनी और अन्य कुछ देशों में माता-पिता को बच्चे की देखभाल और परवरिश का खर्च उठाने में सरकार से आर्थिक मदद मिलती है. बावजूद इसके जर्मनी में 39.7 फीसदी माओं के मुकाबले 88.7 फीसदी पिता रोजगार में बने रहते हैं.
गिरती प्रजनन दर से देश पर कैसा असर
आज कम बच्चों के जन्म का एक और सीधा मतलब है - भविष्य में देश के वर्कफोर्स में शामिल होने वालों की संख्या का भी कम होना. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक जापान की आबादी 2070 तक 30 फीसदी गिरेगी और दक्षिण कोरिया की आबादी इस सदी के अंत तक लगभग आधी हो जाएगी.
'वूमेन इन इकोनॉमिक्स इनिशिएटिव' में अर्थशास्त्री और फ्रैंकफर्ट के 'फेडरल इंस्टीट्यूट फॉर पॉप्युलेशन रिसर्च' में गेस्ट रिसर्चर क्लारा शेपर ने इसके परिणामों के बारे में डीडब्ल्यू से बात की. क्लारा ने बताया, "कम प्रजनन दर को लेकर कई देशों की सीधी चिंता उनकी पेंशन को लेकर है क्योंकि अधिकांश पेंशन प्रणालियां इस व्यवस्था पर आधारित हैं कि बुजुर्ग आबादी की पेंशन अभी काम कर रहे लोग चुकाएंगे. इसके लिए या तो लोगों पर ज्यादा टैक्स लगाना पड़ेगा या बुनियादी सुविधाओं पर होने वाले खर्च में कटौती होगी."
दक्षिण एशिया की महिलाएं समय से पहले बूढ़ी क्यों हो रही हैं ?
जर्मन संघीय सांख्यिकी कार्यालय के मुताबिक 2035 तक जर्मनी की करीब एक-चौथाई आबादी 67 वर्ष या उससे अधिक उम्र की होगी. जर्मनी में मौजूदा प्रजनन दर 1.46 है. विभाग की मानें तो ज्यादा प्रवासन भी कामकाजी आबादी में गिरावट को स्थिर नहीं कर पाएगा. जबकि ब्रिटेन जैसे कुछ देशों में प्रवासियों के आने से आबादी बढ़ रही है लेकिन इससे घटती जन्म दर के सारे असर खत्म नहीं हो जाते. क्लारा शेपर बताती हैं, "प्रवासी भी समय के साथ दूसरों पर निर्भर हो जाएंगे. हम अक्सर देखते हैं कि कई प्रवासी कुछ सालों बाद अपने देशों में वापस चले जाते हैं और अपने देश लौटने की इच्छा रखते हैं."
वहीं चीन और भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों में भी औसतन प्रजनन दर दो से कम है. क्लारा बताती हैं, "चीन में सामाजिक बदलाव आया. अब हम चीन में देखते हैं कि जो बच्चे 'वन-चाइल्ड पॉलिसी' के दौरान पैदा हुए, वे भी कम बच्चे चाहते हैं. भारत में गर्भनिरोध और महिलाओं का उच्च शिक्षा में जाना, बच्चा पैदा करने में देरी का कारण बने हैं."
बदल रहे हैं परिवार और रिश्तों के मायने
कई अर्थशास्त्री बताते हैं कि बच्चों की कम संख्या के लिए महिलाओं पर दोष नहीं डाला जाना चाहिए. अब बच्चे चाहने वाले कपल्स की संख्या भी कम हो रही है. रोबिन सिंह लेखक और 'पीपल फार्म' के संस्थापक हैं. उन्होंने और उनकी पत्नी ने कभी बच्चा पैदा ना करने की शर्त मानकर एक-दूसरे से शादी की थी. डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में रोबिन अपने फैसले का कारण बताते हैं, "मैंने शादी से पहले ही अपनी पत्नी से कह दिया था कि मैं बच्चा नहीं चाहता क्योंकि इससे मेरी आजादी में खलल पड़ेगा. 2023 में हम यूएस चले गए. मैं अपना बिजनेस सेट अप कर रहा था. मुझे एहसास हुआ कि बच्चे ना होने ने मुझे एक आजादी दी जिससे मैं दिन-रात लगाकर अपना बिजनेस सेट कर पा रहा था."
समाज में बदलती महिलाओं की अपेक्षाओं के बारे में श्वेता बताती हैं, "औरतों की उम्मीदें अब बदल रही हैं. पहले शादी आर्थिक सुरक्षा और समाज की स्वीकार्यता का माध्यम थी. लेकिन अब औरतें अपना पैसा कमा रही हैं. प्रॉपर्टी में इंवेस्ट कर रही हैं. अपनी लाइफ बिल्ड कर रही हैं. अब वे अपने पार्टनर से भावनात्मक साथ की उम्मीद करती हैं."
वहीं शार्लोटे को लगता है कि यह केवल निजी पसंद की बात नहीं है. वह बताती हैं, "जर्मनी और पूरी दुनिया में जो राजनीतिक बदलाव हो रहे हैं, जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं हैं, उन्हें देखकर मुझे नहीं लगता कि मैं इस दुनिया में एक और बच्चा लाना चाहती हूं. दुनिया में पहले से ही बहुत सारे बच्चे हैं, जिन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें घर और सुरक्षित जगह की जरूरत है. तो फिर मैं अपना बच्चा पैदा करने के बजाय किसी ऐसे बच्चे को गोद क्यों नहीं ले सकती?"
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सुनने पड़ते हैं 'स्वार्थी' होने के ताने
शार्लोटे और श्वेता दोनों ने अपने फैसलों के कारण सामाजिक दबाव झेला है. शार्लोटे अपने अनुभव साझा करती हैं, "ऐसी महिलाओं से कहा जाता है कि तुम बहुत स्वार्थी हो, सिर्फ अपने बारे में सोच रही हो. तुम अकेली रह जाओगी. लोग मुझसे कहते हैं कि इतना बड़ा फैसला करने के लिए तुम अभी बहुत छोटी हो. मेरी उम्र 30 साल से ज्यादा है और मैं जानती हूं कि मैं क्या कह रही हूं."
वहीं श्वेता कहती हैं, "मेरे हिसाब से तो सेल्फिश यह हुआ कि तुम एक नई जिंदगी को ला रहे हो और उसकी सही से देखभाल नहीं कर पा रहे हो. या उसे अपने स्वार्थ, जैसे पीढ़ी आगे बढ़ाने के लिए जन्म दे रहे हो और ये कि वह बाद में हमारा ध्यान रखेगा."
प्रजनन दर बढ़ाने के लिए क्या करें देश
कई देशों ने अब बच्चों वाले परिवारों को आर्थिक मदद देने का एलान किया है. चीन में तीन साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सालाना 3,600 युआन की चाइल्डकेयर सब्सिडी दी जा रही है. वहीं सिंगापुर में बच्चे की परवरिश से लेकर पढ़ाई तक सरकार उस पर 69,000 डॉलर खर्च करने को तैयार है.
रिसर्चर क्लारा शेपर ने बताया, "सरकारी नीतियां ज्यादा जोर इस बात पर देती हैं कि लोग बच्चे पैदा करें. हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे होने के बाद माता और पिता दोनों नौकरी और लेबर मार्केट में बने रहें. कुछ देशों में इस बात के सबूत मिले हैं कि अगर सरकार सस्ती या सब्सिडी वाली चाइल्डकेयर, सस्ते घर और बच्चों के लिए आसानी से उपलब्ध देखभाल की सुविधा देती है, तो इससे लोग बच्चे पैदा करने के लिए ज्यादा तैयार हो सकते हैं."
साथ ही घरों में बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी माता और पिता दोनों के बीच बराबर बांटी जानी चाहिए. वह आगे सुझाव देती हैं कि कंपनियों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुरुषों और महिलाओं, दोनों को बच्चे पैदा करने की कीमत अपने करियर से ना चुकानी पड़े.
भारत: 50 की उम्र के बाद मां बनने का अधिकार मांगती महिलाएं
ऐसा देखा गया है कि पिता बनने को पुरुष अपनी सैलरी बढ़वाने और प्रमोशन मिलने का ठोस आधार बनाते हैं, जबकि कामकाजी मांओं की कमाई बच्चे को जन्म देने के बाद या तो बंद हो जाती है या फिर पार्ट-टाइम जॉब करने की मजबूरी के कारण पहले से बहुत कम. साथ ही, कई कंपनियों में दकियानूसी सोच वाले बॉस इस भेदभाव से भरे गलत रवैये का खात्मा करने की बजाए कामकाजी मांओं को बड़े पद या जिम्मेदारियों से और दूर कर देते हैं, जिससे अपने करियर में वे संस्थागत रूप से लगातार पीछे धकेली जाती हैं. जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी कामकाजी महिलाओं को अकसर बुढ़ापे में अपने पार्टनर से कहीं कम पेंशन मिलती है और इनमें से कई जीवनभर मेहनत से काम करने के बाद भी बुढ़ापा गरीबी में बिताती हैं.
लेकिन इनसे इतर, यह भी समझने की जरुरत है कि कई महिलाएं बच्चा पैदा नहीं करना चाहतीं और उनके शरीर और प्रजनन से जुड़ा यह फैसला लेने का उनको पूरा अधिकार है.


