क्या ऑफिस में प्रमोशन नहीं चाहती महिलाएं?
कुछ वैश्विक स्टडी दिखाती हैं कि कई महिलाएं अपने वर्कप्लेस में आगे बढ़कर 'लीन इन' होने के बजाए 'लीन आउट' हो रही हैं.

कुछ वैश्विक स्टडी दिखाती हैं कि कई महिलाएं अपने वर्कप्लेस में आगे बढ़कर 'लीन इन' होने के बजाए 'लीन आउट' हो रही हैं. इस साल भारत की कंपनियों के टॉप एग्जीक्यूटिव पदों पर महिलाओं की संख्या भी पहले से कम हुई है. आखिर क्यों?
सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन महिलाओं की करियर में आगे बढ़ने की रुचि घट रही है. ऐसा हाल ही की एक रिपोर्ट से पता चला है जिसके बाद इस पर चर्चा होने लगी है. रिपोर्ट वर्कप्लेस कंसलटेंसी 'अवतार करियर क्रिएटर्स' और अमेरिका की 'सेरामाउंट' ने मिलकर तैयार की है. इन्होंने कुल 125 कंपनियों पर स्टडी की और इसी सितंबर उस पर आधारित रिपोर्ट जारी की.
इस रिपोर्ट ‘बेस्ट कंपनीज फॉर वीमेन इन इंडिया' के मुताबिक, कॉरपोरेट कंपनियों के शीर्ष पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी 2025 में 20 प्रतिशत थी, जो 2026 में घटकर 16.7 प्रतिशत रह गई है. इन्होंने पाया कि इसी अवधि में इन कंपनियों में कुल महिला कर्मचारियों की हिस्सेदारी भी 35.7 प्रतिशत से कम होकर 34.6 प्रतिशत हो गई है.
पेशे से पीआर प्रोफेशनल शिवानी शुक्ला का कहना है कि पुरुषों के पास एक ऐसा फायदा होता है, जिसकी चर्चा अक्सर नहीं होती. वह है घर पर "सपोर्ट सिस्टम". वो विस्तार से बताती हैं कि आज भी ज्यादातर वर्कप्लेस उस पुरानी सोच पर अटके हुए हैं कि बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, खाना बनाना और सफाई जैसे घरेलू कामों की जिम्मेदारी उठाने के लिए घरों पर महिलाएं मौजूद हैं.
लेकिन प्रमोशन लेने से भला क्यों हिचकेगी कोई महिला?
कुछ समय पहले आई 'लीन इन' और मेककिंसी की एक रिपोर्ट में भी कुछ इसी तरह का दावा किया गया था. पहली बार ऐसा देखने को मिला है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं प्रमोशन पाने की इच्छा कम व्यक्त कर रही हैं. 'वीमन एट वर्कप्लेस 2025' रिपोर्ट के लिए 124 कंपनियों के 9,500 से अधिक कर्मचारियों का सर्वे किया गया. सवाल स्पष्ट और सीधा था- क्या आप अपने करियर में अगला प्रमोशन चाहते हैं.
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इसमें 86 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले करीब 80 प्रतिशत महिलाओं ने ही कहा कि वे प्रमोशन चाहती हैं. यह अंतर दिखने में छोटा लगता है लेकिन इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह पहली बार है जब महिलाओं और पुरुषों की प्रमोशन की इच्छा के बीच का अंतर डाटा के जरिए सामने आया है.
'लीन इन' से 'लीन आउट' की ओर
साल 2013 में मेटा की पूर्व सीओओ शेरिल सैंडबर्ग ने एक विचार को दुनिया भर की कामकाजी महिलाओं के बीच नई पहचान दी - 'लीन इन'. उनकी किताब से निकला यह विचार आंदोलन बन गया. इसका सीधा संदेश था. अपने करियर की कमान अपने हाथ में लो. आगे बढ़ो, मौके मांगो, चुनौतियां स्वीकार करो और नेतृत्व की मेज पर अपनी जगह बनाओ. इसने करोड़ों महिलाओं को प्रेरित किया.
रिपोर्ट बताती है कि इसकी शुरुआत एंट्री-लेवल से हो जाती है. 'रिडोक' में चीफ ब्रैंडिंग अफसर सईदा वसेका ने डीडब्ल्यू हिंदी से बात की. वह मीशो और स्विगी जैसे ब्रैंड्स के साथ काम कर चुकी हैं. वह बताती हैं कि महिलाओं को पहले प्रमोशन से ही मुश्किलें आने लगती है.
आगे बढ़ने में तीन बड़ी परेशानियां होती हैं. सईदा समझाती हैं, "पहली, उन्हें वरिष्ठ लोगों से समर्थन और सिफारिश पुरुषों की तुलना में कम मिलती है. दूसरी, नौकरी के साथ घर का काम और परिवार की जिम्मेदारियां भी अक्सर महिलाओं पर ज्यादा होती हैं. तीसरी, ऊंचे पदों पर कम महिलाओं को देखकर उन्हें अपने लिए आगे बढ़ने के उदाहरण कम दिखाई देते हैं."
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महिलाएं बढ़ीं लेकिन कार्यस्थलों में बदलाव नहीं आया
वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के अनुसार शुरुआती स्तर पर कर्मचारियों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 46 प्रतिशत है. लेकिन शीर्ष कार्यकारी पदों तक पहुंचते-पहुंचते यह हिस्सेदारी 23 प्रतिशत रह जाती है. यह दिखाता है हमारे कार्यस्थल महिलाओं की बदलती भूमिका के लिए तैयार नहीं हुए हैं.
शिवानी आगे अपना अनुभव साझा करती हैं, "मैंने दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद जैसे कई बड़े शहरों में काम किया है. एक कंपनी में मुझसे प्रमोशन के लिए कंप्रोमाइज करने को कहा गया. दूसरी जगहों पर भी मेरे साथ काफी बदसलूकी हुई. मुझे अपमानजनक नामों से बुलाया गया, भद्दी और अश्लील टिप्पणियां की गईं, छोटी-छोटी बातों में लगातार कमियां निकाली गईं. फिर महिलाओं को खुद को प्रूव करने के बहुत ही कम मौके मिलते हैं."
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क्या महिलाओं की महत्वाकांक्षाएं कम हो रही हैं?
डाटा के अनुसार मैनेजर के पदों पर केवल करीब एक-तिहाई महिलाएं हैं. रिपोर्ट में दिए आंकड़े बताते हैं कि 45 प्रतिशत पुरुषों को आगे बढ़ाने वाले किसी वरिष्ठ साथी की मदद और समर्थन मिलता है. जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा सिर्फ 31 प्रतिशत था. इसमें भी एशियाई महिलाओं को वरिष्ठ सहकर्मियों से और कम सहयोग मिलता है.
शुरुआती स्तर पर महिलाओं को एआई सीखने और इस्तेमाल करने के मौके भी कम मिल रहे हैं. सिर्फ 21 प्रतिशत महिलाओं को उनके प्रबंधक एआई इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 33 प्रतिशत है. वहीं घर से काम करना या वर्क फ्रॉम होम भी महिलाओं के प्रमोशन पर असर डाल रहा है. दफ्तर से काम करने वाली महिलाओं के मुकाबले ज्यादातर घर से काम करने वाली महिलाओं के प्रमोशन की संभावना करीब डेढ़ गुना कम है. वहीं पुरुषों के प्रमोशन पर घर या दफ्तर से काम करने का खास असर नहीं दिखता.
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कैसे आएगा सुधार?
असल सवाल यह नहीं कि महिलाएं आगे क्यों नहीं बढ़ना चाहती. सवाल यह है कि आगे बढ़ने के लिए उन्हें क्या पीछे छोड़ना पड़ता है और उसकी क्या कीमत चुकानी पड़ती है? डीडब्ल्यू हिंदी ने अर्थशास्त्री मिताली निकोर से बात की. वह बताती हैं कि जैसे-जैसे महिलाएं कार्यस्थल पर उन्नति करती हैं, काम और जिम्मेदारियां बढ़ती हैं. लेकिन जरूरी नहीं कि उसी हिसाब से सैलरी भी बढ़े.
मिताली ने बताया, "ऐसा नहीं है कि महिलाओं में महत्वाकांक्षा नहीं है. कई बार सवाल यह होता है कि प्रमोशन लेकर उनकी जिंदगी आसान होगी या और मुश्किल? कई महिलाएं सोचती हैं कि अगर प्रमोशन के बाद काम और तनाव इतना बढ़ने वाला है और उसके बदले आर्थिक फायदा बहुत ज्यादा नहीं है, तो फिर प्रमोशन लेने का मतलब क्या है? जब आप शुरुआती स्तर पर होते हैं, तो नौकरी और घर की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बैठाना आसान होता है. खासकर उन महिलाओं के लिए जो मां हैं."
शिवानी भी इस पर अपने विचार रखती हैं, "कंपनियों को महिलाओं के लिए लचीले काम के घंटे, पीरियड लीव और सही मायने में मैटरनिटी लीव जैसी नीतियां बनानी होंगी, सिर्फ दिखावे के लिए नहीं. महिलाओं को फैसलों में जगह, आगे बढ़ने के बराबर मौके और ऐसा सुरक्षित माहौल चाहिए जहां उनके काम और आवाज, दोनों को महत्व मिले."
मिताली का मानना है कि बदलाव सिर्फ कंपनियों के अंदर नहीं, घर और सरकार के स्तर पर भी चाहिए. सरकारों को बच्चों की देखभाल के लिए बेहतर सुविधाएं और सहायता देनी चाहिए. इसके अलावा पुरुषों को भी बच्चों की जिम्मेदारी बराबर उठानी होगी. मिताली सुझाव देती हैं, "कंपनियों को भी नए तरीकों के बारे में सोचना चाहिए. जैसे किसी मैनेजमेंट के पद की जिम्मेदारी दो लोग मिलकर संभाल सकते हैं. इससे महिलाएं एकदम बहुत बड़ी जिम्मेदारी लेने के बजाय धीरे-धीरे अगले स्तर पर जा सकती हैं."


