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आत्मा-शरीर एक नहीं पृथक करने हमें हंस की तरह बनना होगा : डॉ विजयश्री

जो व्यक्ति 6 महीने से एक पद भी याद नहीं कर पाया। ऐसा मन बुद्धि भी भेदविज्ञान का सूत्र पकड़कर चला तो कुछ ही समय में  केवल ज्ञानी बन गया

आत्मा-शरीर एक नहीं पृथक करने हमें हंस की तरह बनना होगा : डॉ विजयश्री
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रायपुर। जो व्यक्ति 6 महीने से एक पद भी याद नहीं कर पाया। ऐसा मन बुद्धि भी भेदविज्ञान का सूत्र पकड़कर चला तो कुछ ही समय में केवल ज्ञानी बन गया । यह इस आत्मा विज्ञान की परिणति। इसलिए आचार्य ने कहा है कि यदि तुम आत्मा को शरीर से भिन्न शुद्ध स्वरूप में देखोगे तो उस चिंतन में लीन होते-होते भाषा में शुद्ध स्वरुप को प्राप्त कर लोगे। आज टैगोर नगर चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में लाल गंगा पटवा भवन में महासाध्वी डॉक्टर विजयश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को उपयुक्त संदेश दिया और कहा अत्यंत भावना का यह चिंता एक प्रकार हंस विवेक है।ं पृथक्करण बुद्धि है जो जड़ से चेतना की विभिन्नता अनुभव करती हैं । अशुद्ध से शुद्ध की ओर अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं ।

वस्तुस्थिति का यथार्थ ज्ञान करने के लिए इस अत्यंत आवश्यक है। जब तक जड़ चेतन की पृथकता का बोध नहीं होगा,आत्मा सम्यकत्व लाभ नहीं पा सकेंगी। वास्तव में संसार के साथ आत्मा का संबंध दूध और पानी की तरह एकाकार हो रहा है। दूध में पानी मिलने पर साधारण आदमी उसे पहचान नहीं पाता और पहचान लेने पर भी उसे अलग-अलग नहीं रह सकता। किंतु राजहंस तो अलग कर देगा। हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात हंस जैसे पानी से दूध को अलग कर देते हैं, वैसे ही आत्मा को राजहंस बनाना है और इस दूध पानी रूपी संसार और आत्मा के संबंध को पृथक-पृथक करना है । यह पृथक रण बुद्धि की वास्तव में अत्यंत भावना है । आत्मा आत्मा के संबंधों को अलग-अलग समझ लेना आत्मा का विवेक है। यह ज्ञान है, इसे ही हंस बुद्धि कहा है। वस्तुत: आत्मा और शरीर दोनों अलग है। लेकिन व्यक्ति विवेकहीन होने के कारण आत्मा और शरीर को एक समझने की भूल करता है । जबकि आत्मा अमर व शाश्वत है। तथा शरीर है। इसे समझना आवश्यक है।


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