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नासा की नई एलईएसटीआर तकनीक, जो करेगी चंद्रमा के -388 फारेनहाइट तापमान का परीक्षण

चंद्रमा पर दिन में चिलचिलाती गर्मी और रात में कड़ाके की ठंड पड़ती है। ऐसे में अब चंद्रमा, मंगल और अन्य ग्रहों पर भविष्य के मिशनों के लिए सामग्रियों को तैयार करने की दिशा में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है।

नासा की नई एलईएसटीआर तकनीक, जो करेगी चंद्रमा के -388 फारेनहाइट तापमान का परीक्षण
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नई दिल्ली। चंद्रमा पर दिन में चिलचिलाती गर्मी और रात में कड़ाके की ठंड पड़ती है। ऐसे में अब चंद्रमा, मंगल और अन्य ग्रहों पर भविष्य के मिशनों के लिए सामग्रियों को तैयार करने की दिशा में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है।

नासा ने चंद्रमा की रात की कड़ाके की ठंड की नकल करने वाली नई तकनीक विकसित की है, जो बिना किसी तरल गैस के सामग्रियों और उपकरणों का परीक्षण कर सकेगी। नासा के ग्लेन रिसर्च सेंटर (क्लीवलैंड) के इंजीनियरों ने ‘लूनर एनवायरनमेंट स्ट्रक्चरल टेस्ट रिग’ (एलईएसटीआर) नामक एक मशीन बनाई है। यह मशीन 40 केल्विन यानी लगभग -388 डिग्री फारेनहाइट तक के अत्यधिक ठंडे तापमान पर सामग्रियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्पेस हार्डवेयर का परीक्षण कर सकती है।

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर नासा चंद्र बेस बनाने की योजना बना रहा है। वहां तापमान दिन और रात में काफी बदलता रहता है। ऐसी स्थिति में सामान्य रबर कांच की तरह टूट सकता है, सर्किट खराब हो सकते हैं और बिजली के कनेक्शन जमकर टूट सकते हैं। इसलिए चरम तापमान में सामग्रियों की स्थिति को समझना बेहद जरूरी है। पहले नासा तरल क्रायोजेन यानी तरल नाइट्रोजन, हाइड्रोजन और हीलियम का इस्तेमाल करके परीक्षण करता था। ये अत्यधिक ठंडे तरल पदार्थ विशेष टैंकों में रखे जाते थे। अब एलईएसटीआर इस पुरानी विधि की जगह ले सकेगा।

एलईएसटीआर की खासियत यह है कि यह पूरी तरह ड्राई सिस्टम है। इसमें किसी तरल पदार्थ का इस्तेमाल नहीं होता। यह हाई-पावर क्रायोकूलर का उपयोग करके गर्मी को दूर करता है।

एलईएसटीआर के तकनीकी प्रमुख एरियल डिमस्टन ने बताया, “जिस प्रकार बिना सामग्री की सही जानकारी के कोई इमारत नहीं बनाई जा सकती, उसी प्रकार बिना सामग्रियों के सही व्यवहार को जाने बिना कोई स्पेस मिशन सफल नहीं हो सकता।”

डिमस्टन के अनुसार, एलईएसटीआर पारंपरिक तरीकों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित, सस्ता और आसान है। इसमें तरल क्रायोजेन से जुड़ी जटिलताएं, सुरक्षा उपकरण, विशेष वाल्व और सेंसर की जरूरत नहीं पड़ती। इससे समय, लागत और जोखिम तीनों कम हो जाते हैं। यह नई तकनीक कई क्षेत्रों में काम आएगी।

साथ ही, नासा की टीम इससे अगली पीढ़ी के स्पेससूट के लिए कपड़ों, रोवर के टायरों के लिए नई सामग्रियों और ‘शेप मेमोरी अलॉय’ यानी आकार याद रखने वाली धातु का परीक्षण कर रही है। यह धातु मुड़ने, खिंचने या ठंडी होने के बाद भी अपने मूल आकार में वापस आ जाती है, जो चंद्रमा और मंगल की ऊबड़-खाबड़ सतह पर रोवर के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।



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