सुविधाओं के अभाव में भी कोरोना को पछाड़ता ग्रामीण छत्तीसगढ़
शहरों में कोरोना का नाद है। डर के कारण कहीं लोग नियमों का पालन कर रहे हैं तो कहीं उनका उल्लंघन भी हो रहा है

- विवेक घाटगे व डॉ. दीपक पाचपोर
रायपुर। शहरों में कोरोना का नाद है। डर के कारण कहीं लोग नियमों का पालन कर रहे हैं तो कहीं उनका उल्लंघन भी हो रहा है। कोरोना अपनी भयावहता में न सही परंतु छत्तीसगढ़ में तो वह पहुंच ही चुका है। हमारे चिकित्सकों की कार्यकुशलता और प्रशासन की चुस्ती के कारण उसके फैलाव पर रोक भी लगती दिख रही है पर पिक्चर पूरी तरह खत्म हो चुकी हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। कहते हैं कि अभी खतरा पूरी तरह टला नहीं है। बल्कि कहा जाये कि असली रूप में आया ही नहीं है (न ही आये)। इस बाबत जागरूकता की बात की जाये तो शहरी क्षेत्रों में तो वह भरपूर है लेकिन हमारे देहाती प्रखंडों में इसे लेकर कैसी समझ और चेतना है, यही जानने के लिये यह यात्रा की गयी।
विभिन्न गांवों में कई लोगों से मिलने पर पता चला है कि आधुनिक संचार माध्यमों के अलावा हमारी पंचायतें इस स्वास्थ्य संबंधी आपदा में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। गांवों में शहरों का सा न तो सेनिटाईजर और मास्क पर आधारित कोरोना का तोड़ है और न ही उसे लेकर वैसी वैज्ञानिक समझ। ऊपर से, सुविधाहीन नागरी संरचना उन्हें आईसोलेशन की अवधारणा से तो अनभिज्ञ रखे ही है, सामाजिक मेल-मिलाप वाली जीवन प्रणाली में गांव वालों के लिये सोशल डिस्टेंसिंग किसी गाली या अभिशाप से कम नहीं। दूर खड़े होकर बातें करना, समूहों में न रहना या एक-दूसरे के बहुत निकट न आने जैसी मार्गदर्शिका को रातों-रात स्वीकार कर पाना लोकजीवन में बेहद कष्टकर है। संभव है कि भविष्य में वे सीख जायें पर उनकी वर्तमान जीवनशैली में यह सब कुछ प्रवेश करने में समय लगेगा। फिर भी, पंचायतों के सदस्य, मितानिनें, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, कोटवार आदि मिलकर कोरोना के इस शिवधनुष को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों को देखें तो कोरोना जैसी महामारी से बचने की कुछ प्राकृतिक व्यवस्थाएं भी हैं। पहला है, हर गांव के पास विस्तृत भूभाग। सीमित जगह पर सिकुड़कर या सटकर रहने, बैठने की जो मजबूरी शहरी क्षेत्रों में है वह कम से कम यहां नहीं है। सबके मकानों की बुनावट कुछ इस तरह की है कि उनमें वेंटिलेटर की व्यवस्था नैसर्गिक है। एयर कंडीशनर का यहां कोई काम ही नहीं है और ज्यादातर लोग अलग-अलग स्थानों पर रहते या सोते हैं। चूंकि ज्यादातर लोगों का पेशा खेती है, कई लोग अपने खेतों में चले जाते हैं। इस समय गर्मी का प्रारंभ हो चुका है अतः लोग घरों के अंदर ही अधिकतम समय निकाल रहे हैं।
ज्यादातर ग्रामीणों की बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है। वे नहीं जानते कि कोरोनाबंदी कब तक चलेगी। रायपुर के निकट औद्योगिक क्षेत्रों के पास बने कुछ गांवों से बड़ी संख्या में लोग उद्योगों में मिले रोजगार पर आश्रित हैं। वे जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आश्वासन दिया है कि अनुपस्थिति के दौरान उनकी तनख्वाह नहीं काटी जायेगी पर इसका भरोसा लोगों को कम ही है। कई लोगों को हटा भी दिया गया है। यात्रा के दौरान अनेक ऐसे लोग मिले जो उरला, सिलतरा आदि की विभिन्न इकाइयों में काम करते थे। उन्हें एक तरह से जाने के लिये कह दिया गया गया है क्योंकि फैक्ट्रियों पर ताले लटक गये हैं। कई तो सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गांव-घरों की पैदल यात्राओं पर निकल भी गये हैं। ज्यादातर भूखे-प्यासे और खाली जेब।
ग्रामों में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद है। अधिकतर गांवों में लोगों ने बताया कि पुलिस नियमित चक्कर लगाती है। कई गांवों में युवकों को गांवों की पहरेदारी सौंप दी गयी है जो देखते हैं कि बाहर के लोग तो नहीं आ रहे हैं। अगर वे किसी और गांव के हैं तो उनकी पूरी जानकारी लेकर ये कार्यकर्ता पुलिस को अगली सुबह सौंप देते हैं। यह अच्छी बात रही कि किसी भी गांव में कोई कोरोना का मरीज मिलने की खबर नहीं है। बाहरी लोगों या दूसरे राज्यों से आए लोगों को जांच के लिये भेजने का काम तत्परता से पंचायत के सदस्य कर रहे हैं। एक ही गांव में एक व्यक्ति को ऐहतियात के तौर पर आईसोलेशन पर भेजे जाने की खबर मिली।
जिन गांवों की यात्राएं की गयी उनमें से ज्यादातर किसानी वाले हैं। इन सभी क्षेत्रों में धान की दोहरी फसल ली जाती है। इस वक्त ज्यादातर खेतों में सैकड़ों पंपों के जरिये जमीन के नीचे खींचे पानी के बूते डेढ़-दो फीट ऊंची धान की बालियां लहलहा रही हैं। इसकी देखभाल के लिये, पंप चलाने जैसे कामों के लिये भी लोग खेतों पर जा रहे हैं। इस समय ऐसा कोई कार्य नहीं चल रहा है जिसके लिये किसानों को एकत्र होकर काम करना पड़े। एक तरह से स्वयंमेव सोशल डिस्टेंसिंग की स्थिति बन गयी है। असली चुनौती तो शाम को छह बजे के आसपास से रात के भोजन तक की उस अवधि की है जिस दौरान ग्रामीणों को एकत्र होकर मिलने की सालों पुरानी आदत है। यह हमारे लोकजीवन का अंग है। हर गांव के ऐसे कुछ चबूतरे होते हैं जहां बड़े-बुजुर्ग मिलकर घंटा-दो घंटा अवश्य व्यतीत करते हैं। महिलाओं के अलग स्थान तो युवाओं के दूसरे अड्डे होते हैं। इन जगहों को खाली रखना पंचायतों के लिए कठिन होता है। हालांकि लोगों का कहना है कि पहले के मुकाबले अब कोरोना के भय से यह मेलमिलाप काफी कम हो गया है। मास्क लगाये बैठे लोग भी दिखे।
कई स्थानों पर राशन हाल ही में आने के कारण कई गांवों की राशन दूकानों में थोड़ी भीड़ नज़र आई लेकिन वे सरपंच या हाथों में कैमरा देखकर तितर-बितर हो जाती थी। शासन ने दो माह का राशन एक साथ देने का निर्देश दिया है और यह राशन अभी बंट ही रहा है। इसलिये इन दिनों थोड़ी-बहुत भीड़ है। उम्मीद की जानी चाहिये कि गांवों की इन राशन दूकानों पर जल्दी ही भीड़ छंट जायेगी। ज्यादातर गांवों में दूकानों के आगे अंतराल पर गोले खींचे गये हैं ताकि ग्राहक दूर-दूर खड़े हों।
कोरोना को लेकर गांवों में शहरों जैसा भय नहीं दिखा। न ही वे इस पर लंबी चर्चाएं करते हैं। उन्हें सामान्य जानकारी तो है लेकिन उसके गहन व सूक्ष्म पहलुओं पर बात न करने का एक कारण यह भी हो सकता है कि वे अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं जिसके कारण उनकी समझ सीमित है। इसका अच्छा पहलू यह है कि वे इस संबंध में डराने वाली तथा फेक न्यूज़ के प्रकोप से बचे हुए हैं। हालांकि इस बात से रायपुर की मनोचिकित्सक डॉ. शुभ्रा मलिक इत्तफाक नहीं रखती और कहती हैं कि उनका डर अनभिव्यक्त होता है। वैसे पंचायत सदस्य, मितानिनें व कोटवार उन्हें कोरोना से बचने के उपाय (साबुन से हाथ धोते रहना, बाहर न निकलना, मास्क लगाए रखना, खांसने के समय रूमाल या कोहनी का उपयोग करना आदि) बार-बार बतला रहे हैं। सच तो यह है कि हमारी पंचायती शासन प्रणाली इस लड़ाई में बेहद उपयोगी साबित हो रही है। संबंधित विभाग के अधिकारियों की गैर मौजूदगी में कोरोना से आमने-सामने लोहा लेने का काम ग्रामीण निकाय ही कर रहा है।
ग्रामीणों की मानसिक समस्याएं दिखती नहीं
ग्रामीणों भी महामारियों को लेकर भय होता है पर उसे वे दूसरे तरीकों से अभिव्यक्त करते हैं। अक्सर वे बाहरी लोगों के सामने उसे व्यक्त नहीं करते पर ऐसी बीमारियों के समय वे अंधविश्वास, पाप-पुण्य से जोड़कर घबराहट महसूस करते हैं क्योंकि सभी मानव मस्तिष्क एक सा होता है।
- शुभ्रा मलिक
चिकित्सा अधिकारी, मनोपचार


