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कार्यस्थल पर तनाव और विषाक्त माहौल को पहचानें

कार्यस्थल पर कामकाज के लंबे घंटे, तनाव और बर्नआउट सर्वविदित है, लेकिन हाल ही में हुई दो मौतों के बाद भारत में जड़ें जमा रही कार्य संस्कृति पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है

कार्यस्थल पर तनाव और विषाक्त माहौल को पहचानें
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- लेखा रत्तनानी

इस साल की शुरुआत में 'बरीयिंग द बर्नआउट: डिकोडिंग द हेल्थ चैलेंजेस ऑफ इंडियाज टेक जीनियस' शीर्षक से एक अध्ययन में पाया गया कि 43 प्रतिशत भारतीय तकनीकी-पेशेवर अपने काम के कारण सीधे तौर पर स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से परेशान हैं। लंबे समय तक काम करने के घंटे इन स्वास्थ्य समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं।

कार्यस्थल पर कामकाज के लंबे घंटे, तनाव और बर्नआउट सर्वविदित है, लेकिन हाल ही में हुई दो मौतों के बाद भारत में जड़ें जमा रही कार्य संस्कृति पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। जुलाई में पुणे के एक युवा चार्टर्ड अकाउंटेंट की मौत और हाल ही में चेन्नई में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की आत्महत्या के मामले ने संपन्न कंपनियों की असली प्रकृति को उजागर कर दिया है। ये घटनाएं कथित तौर पर महीनों तक अवसाद और काम के दबाव से जूझने के बाद हुई। यहां हम ऐसे व्यवसायों के उदाहरण देखते हैं जो बाहर से आधुनिक समय के विकास के प्रकाश स्तंभ के रूप में पेश किए जाते हैं पर ये अंदर से अनिवार्य रूप से उन लोगों की कड़ी मेहनत और कम मजदूरी पर काम करने वाले मजदूरों की दुकानें हैं जिनकी व्यवस्था में कोई आवाज नहीं है- भारत के प्रतिभाशाली युवा।

पिछले हफ्ते 38 वर्षीय कार्तिकेयन को उनकी पत्नी जयारानी ने चेन्नई के अपने घर में मरा हुआ पाया। उसने बिजली के जिंदा तार छूकर मौत को गले लगा लिया। कार्तिकेयन ने चेन्नई की एक सॉफ्टवेयर फर्म कंपनी में 15 साल तक काम करने के बाद एक नई नौकरी ज्वाईन की थी। परिवार के सदस्यों का कहना था कि कार्तिकेयन पिछले कुछ समय से मानसिक तनाव में था और उसका इलाज चल रहा था। आत्महत्या करने के पहले वह अपने दोनों बच्चों को उनके नाना-नानी के यहां छोड़ आया था।
विषाक्त कार्य संस्कृति में काम कर रहे 26 वर्षीय एन्ना सेबेस्टियन पेरायिल गत जुलाई में काम करने के दौरान ही बेहोश हो गयी। यह आधुनिक समय की भरपूर नींद से वंचित कार्य संस्कृति की भयावहता की एक सामान्य कहानी है जिसे उसकी मां ने सुनाया। एन्ना ने विशेष योग्यता के साथ सीए परीक्षा उत्तीर्ण की थी लेकिन अर्न्स्ट एंड यंग कंपनी में अपनी नौकरी के चार महीने बाद उसके साथ यह हादसा हुआ।

अर्न्स्ट एंड यंग इंडिया के चेयरमैन राजीव मेमानी को लिखे पत्र में एन्ना की मां अनीता ऑगस्टीन ने लिखा कि कंपनी में हर कोई जानता था कि एन्ना को एक ऐसे मैनेजर के अधीन रखा जा रहा है जो गैर-पेशेवर है। उन्होंने लिखा- 'वास्तव में एन्ना को अपने मैनेजर के बारे में सहकर्मियों से कई चेतावनियां मिली थीं। उसका मैनेजर क्रिकेट मैचों के दौरान अक्सर बैठकों का समय फिर से निर्धारित करता था और दिन के अंत में उसे काम सौंपता था जिससे उसका तनाव बढ़ जाता था। एक ऑफिस पार्टी में एक वरिष्ठ सहकर्मी ने मज़ाक में कहा कि उसे अपने मैनेजर के अधीन काम करने में मुश्किल होगी। दुर्भाग्य से उस सहकर्मी का मजाक एक वास्तविकता में बदल गया और वह काम का तनाव सह नहीं सकी।' यह विशेष रूप से निंदनीय है क्योंकि यह दर्शाता है कि अर्न्स्ट एंड यंग इंडिया काम करने के इस तरीके को जानता था, बर्दाश्त करता था और शायद प्रोत्साहित भी करता था। इस घटना से अकाउंटिंग के क्षेत्र में वैश्विक 'बड़ी चार' में से एक मानी जाने वाली कंपनी में व्यावसायिकता की कमी पर नए सवाल उठते हैं। क्या भारत को इन कंपनियों को इस तरह की खुली छूट देनी चाहिए? जो कुछ गलत हुआ है उसके लिए चेयरमैन को क्यों नहीं जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए? मामले की कितनी जांच हो रही है? कंपनी ने इस मामले में अब तक क्या किया है?

अर्न्स्ट एंड यंग इंडिया एक वैश्विक फर्म है लेकिन भारत के घरेलू प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने बहुत अलग लोकाचार और पृष्ठभूमि से उभरकर तेजी से विकास किया है। इसने देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महामारी के दौरान भी इसने अपनी स्थिति बनाए रखी। उसने अपने विशाल कार्यबल को घर से काम करने वाली सेना में बदलकर गति और दक्षता के साथ काम किया। उसके कर्मचारी अब और भी अधिक घंटे काम करते हैं क्योंकि उन्हें ऑफिस तक जाने की तकलीफ नहीं उठानी पड़ती। दूरसंचार व्यवस्था के व्यापक विस्तार के कारण कंपनियों को महंगे किराए के कार्यालय छोड़ने की भी मौका दिया जिससे उनका मुनाफा बढ़ा।

धीरे-धीरे जीवन सामान्य होता गया और कार्यालयों में काम भी शुरू हो गया। फिर भी आईटी क्षेत्र ने घर से काम करना जारी रखा पर कर्मचारियों के काम के घंटे कम नहीं हुए हैं जिसकी वजह से तनाव बढ़ रहा है। इस साल की शुरुआत में 'बरीयिंग द बर्नआउट: डिकोडिंग द हेल्थ चैलेंजेस ऑफ इंडियाज टेक जीनियस' शीर्षक से एक अध्ययन में पाया गया कि 43 प्रतिशत भारतीय तकनीकी-पेशेवर अपने काम के कारण सीधे तौर पर स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से परेशान हैं। लंबे समय तक काम करने के घंटे इन स्वास्थ्य समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं।

50 प्रश से अधिक तकनीकी पेशेवर प्रति सप्ताह औसतन 52.5 घंटे काम करते हैं जो राष्ट्रीय औसत 46.7 घंटे प्रति सप्ताह से अधिक है और यह आंकड़ा अभी भी भारत को सबसे लंबे समय तक काम करने वाले देशों में से एक बनाता है। कर्मचारी स्वास्थ्य सेवा मंच 'ऑनस्युरिटी' और 'नॉलेज चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज् द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है कि इस तरह के लंबे समय तक काम करने के नतीजे गंभीर हैं। आधे से अधिक उत्तरदाताओं ने एसिडिटी, पेट की समस्याओं, पीठ और गर्दन में दर्द, अनियमित नींद, दृष्टि संबंधी समस्याओं सहित प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों की बात कही। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं प्रमुख थीं। 45 फीसदी तकनीकी पेशेवरों ने कहा कि वे तनाव, चिंता और अवसाद से जूझ रहे हैं।

ऐसी रिपोर्ट्स ने शायद पहले इतनी चिंता नहीं जगाई होगी लेकिन ऐसी घटनाओं के कारण पहुंचे सदमे और आलोचना के बाद सरकार के पास इन मामलों पर ध्यान देने और कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने एन्ना पेरायिल के मामले और अर्न्स्ट एंड यंग इंडिया में कार्य संस्कृति की जांच की घोषणा की है जिसने उनके स्वास्थ्य को प्रभावित किया और अंतत: उनकी जान ले ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण खुद को विपक्षी दलों के इस सुझाव में उलझा हुआ पाती हैं कि शैक्षणिक संस्थानों और अभिभावकों को बच्चों को चुनौतियों का सामना करने और काम पर समस्याओं को हल करने के लिए आंतरिक शक्ति बनाने में मदद करनी चाहिए न कि उनके सामने झुकना चाहिए।

ऐसे समय में एनआर नारायण मूर्ति के शब्दों से होने वाले नुकसान को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने कहा था कि देश के युवा राष्ट्रीय उत्पादकता बढ़ाने में मदद करने के लिए सप्ताह में 70 घंटे काम करें। हम देख सकते हैं कि कड़ी मेहनत और कम मजदूरी पर काम करने वाले मजदूरों की दुकानें हैं, वे उत्पादकता नहीं बढ़ाती हैं बल्कि निर्दोष नागरिकों को मारती हैं।
(लेखक द बिलियन प्रेस की प्रबंध संपादक हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


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