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कर्नाटक कांग्रेस के लिए असली सेमीफाइनल

कांग्रेस को अपना पुराना गढ़ वापस लाने का यह सुनहरा मौका है। लेकिन जैसा कि कांग्रेस आखिरी वक्त में गलतियां करने के लिए कुख्यात रही वैसा कर दिया

कर्नाटक कांग्रेस के लिए असली सेमीफाइनल
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- शकील अख्तर

कांग्रेस को अपना पुराना गढ़ वापस लाने का यह सुनहरा मौका है। लेकिन जैसा कि कांग्रेस आखिरी वक्त में गलतियां करने के लिए कुख्यात रही वैसा कर दिया तो फिर उसे इस साल होने वाले बाकी राज्यों के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव भी भूल जाना चाहिए। विपक्ष के बाकी दलों की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं।

कांंग्रेस के लिए कर्नाटक ही असली सेमीफाइनल है। कर्नाटक जीते तो जग जीता। नहीं तो इस साल होने वाले बाकी सभी विधानसभा चुनावों में हालत पतली और लोकसभा की लड़ाई से बाहर!

अभी तो टीवी चैनल भी कह रहे हैं। कांग्रेस को खुद भी लग रहा है मगर पार्टी में एक आत्महंता का भाव हमेशा मौजूद रहता है जो कब उभर आए किसी को पता नहीं होता। अभी पंजाब, उत्तराखंड के चुनाव में पार्टी जीतते-जीतते हार गई। गुजरात में कड़ी टक्कर देते-देते मैच इकतरफा कर दिया। हिमाचल में प्रियंका डटी रहीं तो पार्टी जीत पाई। उन दिनों राहुल की यात्रा चल रही थी। कन्याकुमारी से चल कर यात्रा मध्यप्रदेश तक पहुंच गई। मगर प्रियंका शामिल नहीं हुईं थीं। मीडिया ने राहुल और प्रियंका में रिफ्ट (दरार,अनबन) की खबरें बनाना शुरू कर दी थीं। मगर प्रियंका हिली नहीं।

कांग्रेसी अफवाहों और भ्रमों का धुआं साफ करने में तो कमजोर है। स्थिति देर से स्पष्ट की। जिसका नुकसान गुजरात में हुआ। फिर पूछने पर बोला कि हिमाचल का चुनाव खत्म करने के बाद यात्रा में शामिल होंगी। यह बात पहले भी कही जा सकती थी। ताकि मीडिया को नुकसान पहुंचाने का मौका न मिले या कम मिले। मगर कांग्रेस हमेशा एक फ्यूडल ( सामंती ) मानसिकता में डूबी रहती है- हमें का फर्क पड़ता वाले अहंकार में। आप उससे सामान्य सवाल पूछो या ऐसा भी जिसका जवाब उसके अनुकूल पड़े तो भी वह प्रतिक्रिया नहीं देगी। हां, उसे ठोकने वाला सवाल आप करो तो उसकी झक्की खुलती है।

कांग्रेस है ही ऐसी। डंडे से खूब चलती है। मगर राहुल को डंडा चलाना नहीं आता। नए अध्यक्ष खडगे भी चला नहीं सकते। चलाएंगे तो कोई मानेगा नहीं। जहां हर बड़े नेता के अपने स्वार्थ हों, अपने लोग हों, वहां पार्टी का कोई मतलब नहीं होता। हर आदमी इसी उम्मीद में बैठा है कि मोदी जी ने राहुल की लोकसभा सदस्यता लेकर गलती कर दी, अब घबराहट में और करेंगे और बस फिर हम आ जाएंगे।

मगर ऐसा होता नहीं। कांग्रेस 2014 से खुद को स्टेपनी समझकर बैठी रही कि हमारी जरूरत पड़ेगी। मगर भूल गई कि आजकल ट्यूबलैस टायर का जमाना है। स्टेपनी की जरूरत नहीं पड़ती। 2014 हारा, 2019 हारा। तमाम विधानसभा चुनाव हारे। और अब कर्नाटक उसके बाद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना के चुनाव हैं। जम्मू-कश्मीर की कोई तारीख निर्धारित नहीं है।

कांग्रेस, एनसी, पीडीपी और बाकी कई दल अभी साथ दिल्ली आए थे और जल्दी विधानसभा चुनाव कराने की मांग को लेकर चुनाव आयोग गए थे। मगर वहां जिस दिन मोदी जी को अपनी सरकार बनाने की उम्मीद लगेगी वे वहां चुनाव करवा लेंगे। अभी वहां करीब पांच साल से राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। यह आतंकवाद के 90 के दशक के दौर के बाद का सबसे लंबे समय का राष्ट्रपति शासन है। भाजपा को लगता है कि इस राज्य में जो अब केन्द्र शासित प्रदेश है वह इस बार सरकार बना सकती है। केरल, बंगाल, तमिलनाडु जैसे कई प्रदेशों की तरह यहां भी भाजपा कभी सरकार नहीं बना पाई है। मगर मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दो बार वह सरकार में शामिल रही है। इस बार वह गुलाम नबी आजाद एवं कश्मीर की कुछ और व्यक्ति आधारित पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए बजिद है।

लेकिन यह सब कर्नाटक के चुनाव नतीजे और उसके बाद के राजनीतिक माहौल पर निर्भर करेगा। मोदी जी को कोई जल्दी नहीं है। लेकिन कांग्रेस के लिए कर्नाटक का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि यहां भाजपा काफी कमजोर हो गई है। वैसे तो यहां भाजपा कभी थी ही नहीं। यह कांग्रेस का ऐसा गढ़ था कि अपने बुरे वक्त में इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी को इसी ने पनाह दी थी। दोनों यहां से उप चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंची थीं। मगर इसके बाद कांग्रेस की गुटबाजी ने इस राज्य को इतना खराब कर दिया कि जब राहुल को जरूरत पड़ी तो वे दक्षिण में कर्नाटक नहीं केरल पहुंचे। पहले तो यह कहा जाता था कि कांग्रेस में किसी बड़े नेता को जरूरत पड़े तो कर्नाटक सबसे सेफ है। मगर अब भाजपा ने उसके जरिए दक्षिण में पांव जमाना शुरू कर दिया है।

तो कांग्रेस को अपना पुराना गढ़ वापस लाने का यह सुनहरा मौका है। लेकिन जैसा कि कांग्रेस आखिरी वक्त में गलतियां करने के लिए कुख्यात रही वैसा कर दिया तो फिर उसे इस साल होने वाले बाकी राज्यों के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव भी भूल जाना चाहिए।

विपक्ष के बाकी दलों की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं। क्योंकि यह भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। इसके बाद होने वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के चुनावों में भी यही स्थिति है। भाजपा से सीधी टक्कर। वैसे तो इन तीनों राज्यों के कांग्रेसी नेताओं को पार्टी पर जोर लगाना चाहिए कि वह सुनियोजित तरीके से कर्नाटक में लड़े और जीत सुनिश्चित करे। क्योंकि कर्नाटक की जीत ही इन तीन राज्यों में उनकी जीत का आधार बनेगी। कर्नाटक में अगर कांग्रेस जीती तो 2018 की तरह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी कांग्रेस जीत सकती है। संभावना है। लेकिन अगर अनुकूल कर्नाटक, पंजाब और उत्तराखंड की तरह गंवा दिया तो फिर तीनों राज्यों में भाजपा भारी जोश के साथ चढ़ दौड़ेगी। और उसका परिणाम यह होगा कि अभी साथ आने के इच्छुक केजरीवाल, ममता, अखिलेश छिटक जाएंगे।

केसीआर का तेलंगाना में कांग्रेस से सीधा मुकाबला है। वहां दोनों अगर समझदारी से लड़े और व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोपों से बचे रहे तो विपक्षी एकता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर इसे ही बड़ा प्रश्न बना लिया तो फिर 2024 लोकसभा मुश्किल हो जाएगा। बड़ा प्रश्न विपक्ष के अस्तित्व का प्रश्न 2024 लोकसभा चुनाव है। 2023 का तेलंगाना विधानसभा चुनाव नहीं। खडगे जी की असली रणनीतिक योग्यता का पता तेलंगाना विधानसभा चुनाव में ही चलेगा।

राहुल कर्नाटक की शुरूआत कर तो सही रणनीतिक जगह से रहे हैं। उसी कोलार से जहां दिए भाषण को आधार बनाकर उन्हें दूसरे राज्य गुजरात की कोर्ट से सज़ा सुनाई गई। और उसी दिन की तारीख से उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गई। सरकारी आवास खाली करने का नोटिस दे दिया गया।

देश भर में इसकी कड़ी प्रतिक्रिया हुई है। सामान्य आदमी को कहते सुना गया कि यह ज्यादा हो गया। लोगों की लाइन लग गई यह आफर करने के लिए कि मेरा घर राहुल का घर। एक महिला ने तो अपना घर राहुल के नाम ही कर दिया। भारत में भावुकता का ज्वार उमड़ता है। लेकिन उसे चुनाव में परिवर्तित करना होता है। जैसा 2014 में मोदी ने और उससे पहले 2013 में केजरीवाल ने किया। 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा साफ हो गई। वाजपेयी जो शब्दों के तो सबसे बड़े खिलाड़ी थे ही राजनीतिक परिणामों के अंदर का तत्व भी पहचानते थे कहा था कि- यह लोकसभा का नहीं शोकसभा का चुनाव था। भाजपा केवल दो सीटें जीत पाई थी।

कभी माहौल इतना जबर्दस्त होता है कि लहरें खुद पार करा देतीं हैं। जैसे 1984 या इससे पहले 1980 या जनता पार्टी के पक्ष में 1977 या 1989 में वीपी सिंह। मगर ये चार चुनाव अपवाद हैं। बाकी पार्टी को अपने पक्ष में बन रहे माहौल का फायदा लेना होता है। जैसा 2014 में नरेन्द्र मोदी ने लिया या 2004 में सोनिया गांधी ने लिया था। या उससे पहले 1971 में इन्दिरा गांधी ने। बाकी 1991, 1996, 1998 के चुनाव बिना माहौल के हुए थे। और उसके नतीजे भी अस्पष्ट आते रहे। 1999 में थोड़ा वाजपेयी के पक्ष में माहौल बना और नतीजा आया।

अब 2024 का लोकसभा चुनाव बिना किसी खास माहौल या उत्तेजना के होने की संभावना है। जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए समान अवसर होंगे। जो अवसरों का फायदा उठा ले।

10 मई को होने वाला कर्नाटक का चुनाव कांग्रेस की तरफ झुका हुआ है। अगर कांग्रेस इसका भी फायदा नहीं उठा पाई तो फिर 2024 के लिए यह लिखना पड़ेगा कि दोनों के लिए समान अवसर नहीं। लगातार तीसरा लोकसभा चुनाव भी मोदी की तरफ झुका हुआ।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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