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राजस्थान: 'नक्सली' टिप्पणी पर विवाद, बीएपी सांसद ने बताया आदिवासी समुदाय का अपमान

लोकसभा में वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) पर चर्चा के दौरान की गई एक टिप्पणी ने एक राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है, जिसमें भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के सांसद राजकुमार रोत ने इसे आदिवासी समुदाय का अपमान बताते हुए माफी की मांग की है

राजस्थान: नक्सली टिप्पणी पर विवाद, बीएपी सांसद ने बताया आदिवासी समुदाय का अपमान
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जयपुर। लोकसभा में वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) पर चर्चा के दौरान की गई एक टिप्पणी ने एक राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है, जिसमें भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के सांसद राजकुमार रोत ने इसे आदिवासी समुदाय का अपमान बताते हुए माफी की मांग की है।

राजस्थान के बांसवाड़ा-डूंगरपुर निर्वाचन क्षेत्र से सांसद रोत ने बुधवार को इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे पूरे आदिवासी समुदाय का अपमान बताया।

राजस्थान के बांसवाड़ा-डूंगरपुर निर्वाचन क्षेत्र से सांसद रोत ने बुधवार को इस टिप्पणी का जवाब देते हुए इसे पूरे आदिवासी समुदाय का अपमान बताया।

यह विवाद नियम 193 के तहत हुई एक चर्चा के दौरान शुरू हुआ, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री ने रोत का जिक्र करते हुए उन पर 'वोट-बैंक की राजनीति' करने का आरोप लगाया था।

इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए रोत ने सोशल मीडिया का सहारा लिया और 'गृह मंत्री अमित शाह को माफी मांगनी चाहिए' हैशटैग के साथ एक अभियान शुरू किया। उन्होंने कहा कि नक्सल विरोधी अभियानों के नाम पर कथित हत्याओं को लेकर चिंता जताने वाले एक आदिवासी सांसद को 'नक्सली' करार देना बेहद चिंताजनक है।

उन्होंने कहा, "अगर कोई आदिवासी सांसद निर्दोष लोगों की हत्या के खिलाफ आवाज उठाता है और फिर उसे संसद में 'नक्सली' कहा जाता है, तो जरा सोचिए कि आम आदिवासी नागरिकों को किन हालात का सामना करना पड़ता होगा। यह मुद्दा केवल व्यक्तिगत अपमान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे आदिवासी समुदाय की गरिमा से जुड़ा है।"

संसद को देश की 'सबसे बड़ी पंचायत' बताते हुए रोत ने डॉ. बीआर अंबेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान का हवाला दिया और सवाल उठाया कि क्या संसद में अपने समुदाय से जुड़ी चिंताओं को उठाना कोई अपराध माना जा सकता है।

उन्होंने केंद्र सरकार पर आदिवासियों की आवाज दबाने की कोशिश करने का आरोप लगाया और कहा कि इस तरह की टिप्पणियां लोकतंत्र की भावना और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत हैं।

इससे पहले, 30 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उन बयानों की आलोचना की थी जिनमें यह कहा गया था कि आदिवासी समुदायों का कोई विकास नहीं हुआ है।

रोत को फिर से निशाना बनाते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संविधान अन्याय से लड़ने का एक वैध मार्ग प्रदान करता है। उन्होंने बताया कि इसी लोकतांत्रिक ढांचे के माध्यम से रोत जैसे नेता अपने वर्तमान पदों तक पहुंचे हैं।

उन्होंने आगे कहा कि अगर ऐसे लोग हिंसा का रास्ता अपनाते, तो शायद आज वे उन लोगों में शामिल होते जो अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण कर रहे होते। अपनी बात पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि हथियारों से कोई भी मसला हल नहीं हो सकता और बातचीत और बहस ही समाधान खोजने का एकमात्र असरदार तरीका है।

गृह मंत्री ने आगे कहा कि सिर्फ विकास की कमी ही उग्रवाद को सही नहीं ठहरा सकती।

उन्होंने कहा कि देश के कई इलाके दशकों तक विकास में पीछे रहे, लेकिन वहां वामपंथी उग्रवाद (एलडब्‍ल्‍यूई) नहीं पनपा। उन्होंने दोहराया कि भारत एक लोकतंत्र है जो संविधान से चलता है, और संविधान सभी शिकायतों का समाधान देता है।

गृह मंत्री शाह ने कहा कि भले ही अन्याय और असमान विकास मौजूद हो, लेकिन सरकार सभी को न्याय दिलाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है और वह किसी भी तरह की धमकियों के आगे नहीं झुकेगी।


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