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जवानों के सिर पर कैप भारी, लोगों पर हेलमेट का बोझ

रायपुर ! आम लोगों की सुरक्षा में दिन रात जुटी पुलिस की कार्यशैली पर सुर्खियां बनती रही हैं। इसमें सकारात्मक व नकारात्मक कार्य दोनों पर लाइनें लिखीं गईं।

जवानों के सिर पर कैप भारी, लोगों पर हेलमेट का बोझ
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अधिकारी व जवान उड़ा रहे नियम-कायदे की धज्जियां
रायपुर ! आम लोगों की सुरक्षा में दिन रात जुटी पुलिस की कार्यशैली पर सुर्खियां बनती रही हैं। इसमें सकारात्मक व नकारात्मक कार्य दोनों पर लाइनें लिखीं गईं। अब एक बार फिर से जवानों के सिर पर धारण की जाने वाली कैप को लेकर सवालिया निशान लगने जा रहे हैं। पुलिस अधिकारी एवं जवानों की कैप में अशोक चक्र प्रतीक केवल पुलिस को ही लगाने का हक मिला हुआ है, लेकिन पुलिस इस प्रमुख अधिकार को खो रही है, वहीं केवल खाकी का रौब जमाकर लोगों को दहशत देने का काम में जुट गई है। आम लोगों को हेलमेट नहीं लगाने पर पुलिस वर्दी के खौफ दिखाकर जुर्माना वसूलती है लेकिन कानूनन कैप पहनने की अनिवार्यता पर पुलिस पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। कानून के रखवाले ही जब कानून को तोड़े तब ऐसे में आम लोग कानून का पालन करें यह संभव नजर नहीं आ रहा है।
लोगों की सुरक्षा का ख्याल करते हुए हेलमेट की अनिवार्यता को प्रमुखता से लागू किया गया है। यहां तक कि हेलमेट को प्रभावी बनाने के लिए पेट्रोल पम्प में धारण करने की अनिवार्यता वाली शर्त स्वयं जिलाधीश के द्वारा जारी की गई। लेकिन पुलिस में आरक्षक से लेकर अधिकारी तक के स्तर के जवान भी कैप लगाने से गुरेज करते हैं। प्राय: यह देखा जा रहा है कि किसी समारोह या अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर ही अधिकारी से लेकर जवान कैप धारण करते हैं। शेष समय कैप हाथों पर या फिर टेबल में शोभायमान होते रहती है। यही नहीं कई बार अनेक जवानों को फिल्मी अंदाज में कैप को लेकर इस्तेमाल करते देखा गया है। असल मायने में कैप के सामने में जो बिल्ला लगा होता है वह देश के स्वाभिमान का हिस्सा है जिससे खिलवाड़ हो रहा है। जांच के दौरान या फिर ड्यूटी के दौरान जवान और अधिकारी कैप धारण कर क्यों कार्य नहीं करते? यह सवालों से घिरते जा रहा है। जबकि मोटरसायकिल चलाने वाले आम लोगों को हेलमेट नहीं लगाने पर 5 सौ या फिर उससे अधिक जुर्माना भरना पड़ता है। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने नियम का पालन नहीं किया। क्या पुलिस के लिए किसी मामले की जांच करने के दौरान या ड्यूटी के दौरान कैप लगाना अनिवार्य नहीं होना चाहिए? अधिकारी कहते हैं कि कैप लगाना अनुशासन का हिस्सा है। जिसे वे वर्दी में शपथ लेते समय धारण करते हैं। लेकिन अनिवार्य नहीं है यह बता रहे हैं। अगर अनिवार्यता नहीं है तो कैप के अनुशासन पर प्रश्नचिन्ह नहीं लग रहा? निश्चित तौर पर यह एक प्रश्नचिन्ह है कि क्या पुलिस की टोपी टेबल में सजा कर रखने जेबों में लटका कर चलने या हाथों में लेकर धमकाने के लिए इस्तेमाल होनी चाहिए। इन सभी बातों पर विचार करना होगा।
उल्लेखनीय है कि राज्य में सुरक्षा प्रधान पुलिस के पास आरक्षक से लेकर अधिकारियों तक नीले और खाकी रंग में कैप को अनुशासन का हिस्सा बताया जाता रहा है। बतौर संविधान शपथ लेने के बाद वर्दी के साथ कैप प्रदान की जाती है। लेकिन यह कैप केवल सजावटी वस्तु बनकर रह गई है। देखा जाए तो यातायात के जवान ड्यूटी के दौरान कैप को धारण नहीं करते। सौ में से तीस फीसदी जवान कैप के साथ दिखते हैं लेकिन धारण नहीं करते। परेड में शामिल होने के समय सभी के सिर पर कैप होती है पर आम दिनों में नहीं। मोबाइल में बातें करना नहीं भूलते और चार पहिया वाहन में चलते वक्त अधिकारी कैप रखना भूल जाते हैं। मोबाइल पास होता है। ऐसा स्टेट्स सिंबल बना लिया है। जबकि चौक चौराहों पर एक आम इंसान हेलमेट नहीं लगाने पर अर्थदंड का शिकार होता है। पुलिस विभाग में राजस्व की वृद्धि चालान वसूली से बढ़ रही है। जबकि कई अवसरों पर इस तरह की वाकये सामने आए कि फर्जी पुलिस अधिकारी बनकर लोगों को लूट लिया गया, धमका दिया गया। पुलिस में कैप की अनिवार्यता को अगर प्राथमिकता दी जाए तो संभव था कि फर्जी लूट और असल नकल में फर्क मिल जाता। हेलमेट नहीं लगाने वालों चालकों के कपड़े फट गए जवानों ने मारपीट कर दी। गाडिय़ों की चाबियां छीन ली गईं। सामान ले जाते समय सामान जब्त कर लिए गए। लेकिन कैप नहीं लगाने वालों के साथ कोई कार्रवाई नहीं हुई। जो देश के गौरव के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जिस कैप को धारण कर रक्षा और सुरक्षा की शपथ लेते हैं उसे मजाक का हिस्सा बना लिया है। अब जरूरी हो गया है कि कैप के महत्व को जवानों के बीच आम दिनों में भी मौजूद कराया जाए। केवल राष्ट्रभक्ति के आयोजन और प्रशासनिक और वीआईपी के सामने लगाना अनिवार्य होता है लेकिन अब इसे हर समय अनिवार्यता देकर देश के गौरव और महत्व को स्थान देना होगा।


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