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जेपीसी जांच का औजार है या सरकार की बला टालने का तरीका?

विदेशी चंदे से जुड़े कानून में बदलाव के प्रस्ताव वाला एफसीआरए संशोधन विधेयक अब संसद की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजा गया है. जेपीसी है क्या और विधेयक के साथ यहां क्या होगा

जेपीसी जांच का औजार है या सरकार की बला टालने का तरीका?
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विदेशी चंदे से जुड़े कानून में बदलाव के प्रस्ताव वाला एफसीआरए संशोधन विधेयक अब संसद की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजा गया है. जेपीसी है क्या और विधेयक के साथ यहां क्या होगा?

संसद के मॉनसून सत्र में सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में संशोधन प्रस्ताव वाला विधेयक लाना चाह रही थी लेकिन विपक्ष के भारी विरोध के चलते उसे इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजना पड़ा.

इस विधेयक का मकसद विदेशी फंडिंग यानी अंशदान के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है. विपक्ष ने इसके कुछ प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई हैऔर आरोप लगाया है कि इससे गैर-सरकारी संगठनों और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर सरकार की पकड़ बढ़ सकती है. हालांकि सरकार इन आरोपों को खारिज करती है.

अब विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित होने के लिए तत्काल बहस और मतदान के बजाय एक संयुक्त संसदीय समिति के सामने जाएगा.

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क्या होती है जेपीसी?

संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी संसद की एक अस्थायी समिति यानी एड-हॉक कमेटी होती है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य होते हैं. यह किसी जटिल विधेयक या गंभीर सार्वजनिक महत्व के वित्तीय घोटालों और मामलों की गहराई से जांच के लिए गठित की जाती है. काम पूरा होने या रिपोर्ट सौंपने के बाद यह समिति अपने आप भंग हो जाती है.

जब संसद में कोई महत्वपूर्ण या विवादित विधेयक पेश होता है और उस पर आम सहमति नहीं बन पाती, तब उसे गहन समीक्षा के लिए जेपीसी के पास भेजा जाता है. इसके अलावा, देश में जब किसी बड़े घोटाले या नीतिगत गड़बड़ी के आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग उठती है, तो यह काम भी जेपीसी के जरिए होता है.

जेपीसी के गठन के लिए संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्ताव लाया जाता है और फिर दूसरे सदन द्वारा उसका समर्थन किया जाता है. इसके बाद दोनों सदनों की सहमति से यह अस्तित्व में आती है.

संयुक्त संसदीय समिति में आमतौर पर 31 सदस्य होते हैं, जिनमें लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सदस्य होते हैं. समिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसद शामिल होते हैं. समिति के अध्यक्ष का नाम लोकसभा अध्यक्ष तय करते हैं और आमतौर पर लोकसभा के ही किसी सदस्य को इसका अध्यक्ष बनाया जाता है. लोकसभा सदस्यों के अन्य नाम भी स्पीकर तय करते हैं जबकि राज्यसभा से जेपीसी के लिए सदस्यों के नामों की सिफारिश राज्यसभा के सभापति की ओर से की जाती है.

जेपीसी के पास किसी भी व्यक्ति, अधिकारी या संस्था को दस्तावेज या गवाही के लिए बुलाने का अधिकार होता है. समिति को आमतौर पर 90 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपनी होती है. हालांकि समयसीमा बढ़ाई भी जा सकती है. जेपीसी सिर्फ सिफारिशें ही कर सकती है, कानून बनाने का अंतिम फैसला संसद में ही होता है. जेपीसी की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी भी नहीं होती हैं.

एफसीआरए बिल को जेपीसी के पास क्यों भेजना पड़ा?

एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को 12 अगस्त को लोकसभा ने जेपीसी के पास भेजना का फैसला किया. समिति को 2026 के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया है.

इसे जेपीसी को भेजने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि विधेयक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन संगठनों से जुड़े विदेशी अंशदान और संपत्तियों के प्रबंधन की व्यवस्था से संबंधित है जिनका एफसीआरए प्रमाणपत्र खत्म हो जाए, रद्द हो जाए, वापस कर दिया जाए या जिसका नवीनीकरण ना हो. यही प्रावधान राजनीतिक विवाद का एक बड़ा कारण है.

विपक्ष की चिंता है कि सरकार को मिलने वाली प्रस्तावित शक्तियों का इस्तेमाल गैर-सरकारी संगठनों और अल्पसंख्यक संस्थाओं के खिलाफ हो सकता है. जबकि सरकार का कहना है कि विधेयक विदेशी धन के इस्तेमाल को ज्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए है.

अब जेपीसी इन प्रावधानों को देखेगी. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार ने विधेयक वापस ले लिया और ना ही इसका मतलब यह है कि विधेयक अब कानून नहीं बन सकता. बल्कि ये कह सकते हैं कि विधेयक की संसदीय यात्रा जारी रहेगी.

किसी विवादित विधेयक को जेपीसी के पास भेजने से सरकार को निश्चित रूप से समय मिलता है, तत्काल मतदान नहीं कराना पड़ता, समिति बैठती है, लोगों को बुलाती है, दस्तावेज देखती है और रिपोर्ट तैयार करती है. इस दौरान राजनीतिक तापमान भी कम हो सकता है और शायद कुछ संशोधनों के जरिए सरकार अपने मनमाफिक कानून बनाने का रास्ता साफ कर ले, वह भी आम सहमति से.

हालांकि जानकारों का कहना है कि इसे सिर्फ सरकार की रणनीति मानना भी सही नहीं होगा क्योंकि जेपीसी में सरकार को अपने प्रस्ताव का बचाव करना पड़ता है. वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार झा कहते हैं, "जेपीसी में सरकार इतनी आसानी से विषेय से पिंड नहीं छुड़ा पाती है. विपक्ष सवाल उठाता है. विशेषज्ञों और प्रभावित पक्षों की राय सामने आती है. कई बार विपक्ष की आपत्तियां जस्टिफाई होती दिखती हैं और सरकार का तर्क पिछड़ जाता है. समिति चाहे तो विधेयक के प्रावधानों में बदलाव की सिफारिश कर सकती है.”

जेपीसी और संसद की स्थाई समिति

क्या विवादित विधेयकों को संयुक्त संसदीय समिति के पास ही भेजना विवाद को सुलझाने का तरीका है या फिर संसदीय व्यवस्था में इसके और भी तरीके हैं. विभिन्न विषयों से संबंधित विधेयकों को सुलझाने के लिए यदि हमेशा जेपीसी ही बनने लगेगी तो सवाल उठता है कि संसद की स्थाई समितियों का काम क्या है.

संसद की विभिन्न विभागों से संबंधंति स्थाई समितियां होती हैं जिन्हें स्टैंडिंग कमेटी कहा जाता है. ये अपने-अपने मंत्रालयों या विभागों से जुड़े विधेयकों, बजट की मांगों, वार्षिक रिपोर्ट की जांच करती हैं. इसमें दोनों सदनों के सांसद शामिल होते हैं.

भारत की संसदीय व्यवस्था में स्टैंडिग कमेटी संसद की स्थायी निगरानी व्यवस्था है, सेलेक्ट कमेटी किसी एक सदन द्वारा किसी खास विधेयक की पड़ताल के लिए बनाई गई अस्थायी समिति है जबकि जेपीसी दोनों सदनों के सदस्यों वाली ऐसी अस्थाई समिति है जिसे किसी खास विधेयक, विवाद या मामले की जांच के लिए बनाया जाता है.

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि जेपीसी का गठन बड़े घोटालों की जांच के लिए होता आया है लेकिन मौजूदा सरकार विवादित विधेयकों को जेपीसी के पास भेज देती है ताकि उसके बाद भी वही कानून बना सके, जो वो चाहती है.

डीडब्ल्यू से बातचीत में अरविंद कुमार सिंह कहते हैं, "पहले ज्यादातर विधेयकों की छानबीन स्टैंडिंग कमेटियों ने ही की है. लेकिन ये सरकार सीधे जेपीसी बना देती है. इसके पीछे बड़ा कारण ये है कि जेपीसी के बावजूद सरकार मनचाहा कानून बना सके. क्योंकि जेपीसी का अध्यक्ष सत्तापक्ष का होता है. वक्फ विधेयक को जेपीसी भेजा गया जबकि वो स्टैंडिंग कमेटी का विषय था. अल्पसंख्यक और सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के दायरे में आता है.”

विपक्ष जेपीसी क्यों मांगता है?

भारत की राजनीतिमें विपक्ष आम तौर पर तब जेपीसी की मांग करता है जब उसे लगता है कि किसी विधेयक या मामले में पर्याप्त जांच नहीं हुई है या सरकार जल्दबाजी कर रही है. जेपीसी विपक्ष को एक औपचारिक संसदीय मंच देती है जहां वह सरकार से सवाल पूछ सकता है, अधिकारियों और विशेषज्ञों की बात सुन सकता है और दस्तावेजों की पड़ताल कर सकता है. यही नहीं, जेपीसी के सदस्य बैठकों की जानकारी, अपनी असहमति या सहमति को मीडिया के सामने भी साझा करते रहते हैं. ताकि पता चले कि बैठक में क्या हुआ.

घोटालों की जांच के लिए जेपीसी

बोफोर्स सौदे में धांधली का मामला पहला बड़ा मामला था जिसकी जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनी. 1987 में बोफोर्स तोप सौदे को लेकर विवाद चरम पर था जिसकी जांच के लिए जेपीसी बनी. समिति ने करीब 50 बैठकें कीं और अप्रैल 1988 में अपनी रिपोर्ट दी.विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि समिति में सत्तारूढ़ कांग्रेस का दबदबा था और जांच का तरीका निष्पक्ष नहीं था. विपक्ष ने समिति का बहिष्कार किया.

इस कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब जेपीसी अपनी रिपोर्ट संसद में रख चुकी थी और उसके निष्कर्षों पर बहस हो रही थी. उसी समय अंग्रेजी अखबार द हिंदू में सामने आए कुछ नए दस्तावेजों ने बोफोर्स सौदे और जेपीसी की रिपोर्ट को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए.

1992 के शेयर बाजार और बैंकिंग घोटाले के बाद भी जेपीसी बनाई गई जिसका मकसद सिर्फ यह पता लगाना नहीं था कि गड़बड़ी कैसे हुई, बल्कि यह देखना भी था कि बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था में ऐसी खामियां क्यों थीं जिनसे इस तरह का घोटाला संभव हुआ.

यह जेपीसी के दूसरे रूप को भी दिखाता है यानी कभी-कभी समिति का मकसद किसी राजनीतिक विवाद में जिम्मेदारी तय करने से ज्यादा व्यवस्था की कमियों को पहचानना और सुधार सुझाना होता है.

जेपीसी से जुड़े कुछ दिलचस्प मामले

वहीं, 2G स्पेक्ट्रम विवाद की जांच के लिए बनी जेपीसी ने भी लंबे समय तक काम किया लेकिन समिति की रिपोर्ट आने के बाद भी राजनीतिक विवाद खत्म नहीं हुआ. समिति के भीतर ही रिपोर्ट को लेकर मतभेद थे और विपक्षी सदस्यों ने अपनी आपत्तियां दर्ज कीं.

2015 का भूमि अधिग्रहण विधेयक का मामला दिलचस्प है. भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए लाए गए इस विधेयक को विवाद के बाद संयुक्त समिति के पास भेजा गया था. समिति की समय-सीमा कई बार बढ़ाई गई लेकिन इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई. आखिरकार यह विधेयक कानून नहीं बन पाया.

महिलाओं के नाम पर सिर्फ राजनीति या संसद में एक तिहाई आरक्षण

नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 का मामला भी दिलचस्प है. इस विधेयक को विवाद के बाद जेपीसी के पास भेजा गया. समिति ने बड़े पैमाने पर लोगों और संगठनों की राय ली. समिति ने अपनी रिपोर्ट 7 जनवरी 2019 को संसद को सौंप दी.

हालांकि इसके बाद कुछ ऐसा हुआ जो जेपीसी के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर था. हुआ ये कि तब तक 16वीं लोकसभा भंग हो गई और विधेयक खुद समाप्त हो गया. यानी समिति ने अपना काम पूरा कर दिया था, रिपोर्ट भी आ गई थी, लेकिन कानून नहीं बना. हालांकि बाद में 2019 में सरकार ने नया नागरिकता संशोधन विधेयक पेश किया, जो दोनों सदनों से पारित होकर कानून बना.

1996 में महिला आरक्षण विधेयक को गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति ने देखा. समिति ने सात सिफारिशें कीं. इनमें से पांच को बाद में 2008 के विधेयक में शामिल किया गया, लेकिन 1996 का विधेयक उस वक्त कानून नहीं बन सका.

1998 और 1999 में भी इसी विषय पर विधेयक आए लेकिन दोनों ही बार लोकसभाओं के भंग होने के साथ समाप्त हो गए. 2010 में महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा से पारित हुआ, लेकिन लोकसभा में पारित नहीं हो सका और 2014 में फिर खत्म हो गया. आखिरकार, ये विधेयक 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तौर पर पास हुआ और कानून बना.


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