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भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर

भारत अपने अब तक के सबसे बड़े सैन्य ड्रोन ऑर्डर की तैयारी कर रहा है जिसकी कीमत दो अरब डॉलर से अधिक है. उम्मीद है कि इससे देश की अपनी ड्रोन युद्ध क्षमता बेहतर होगी

भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर
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भारत अपने अब तक के सबसे बड़े सैन्य ड्रोन ऑर्डर की तैयारी कर रहा है जिसकी कीमत दो अरब डॉलर से अधिक है. उम्मीद है कि इससे देश की अपनी ड्रोन युद्ध क्षमता बेहतर होगी.

कई दशकों तक भारत की सेना अपनी सीमाओं की निगरानी के लिए मुख्य रूप से सैनिकों, लड़ाकू विमानों, सेटेलाइट और पारंपरिक निगरानी तंत्र पर निर्भर रही. 2020 में लद्दाख में चीन के साथ तनाव के दौरान पता चला कि ऊंचे पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में फैली लंबी सीमाओं पर हर समय नजर रखना कितना चुनौतीपूर्ण है.

अब भारत अपनी सेना के लिए बड़ी लागत में सैन्य ड्रोन खरीदने की तैयारी कर रहा है. ये ड्रोन भारतीय कंपनियों जैसे अडानी ग्रुप, टाटा एडवांस सिस्टम्स, लार्सन एंड टूब्रो और साथ में स्टार्टअप आइडियाफोर्ज और एसटेरिया एयरोस्पेस से खरीदे जाएंगे. यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी ड्रोन खरीद होगी.

ड्रोन को अब युद्ध के मैदान की आंख और कान माना जाता है. वे दुश्मन की गतिविधियों की जानकारी जुटा सकते हैं और सैनिकों की आवाजाही पर नजर रख सकते हैं. जरूरी सामान पहुंचने और सटीक हमले के लिए भी ड्रोन का इस्तेमाल होने लगा है.

इन ड्रोन को भारत की सबसे संवेदनशील सीमाओं पर तैनात किए जाने की उम्मीद है. इनमें चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी), पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमाएं, और हिंद महासागर शामिल हैं.

ऊपरी तौर पर यह सिर्फ एक बड़ा रक्षा सौदा लगता है. हालांकि असल में यह दिखाता है कि भारत भविष्य के युद्ध को किस तरह से देख रहा है और ड्रोन तेजी से सैन्य योजनाओं के छोटे हिस्से से निकलकर उनकी सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बन गए हैं. इस बदलाव के पीछे कई घटनाओं का प्रभाव रहा है.

जंग के मैदान से मिला चेतावनी का संकेत

मई 2025 में, भारत- शासित कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले के बाद भारत और पकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया था. दोनों देशों ने ड्रोन और आधुनिक लड़ाकू विमानों की ताकत का इस्तेमाल किया. बाद में अमेरिका की मध्यस्थता से दोनों पक्ष लड़ाई रोकने पर राजी हुए.

इसके बाद भारत ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा ड्रोन युद्ध अभ्यास 'कोल्ड स्टार्ट' शुरू किया, जिसमें थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों ने भाग लिया.

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय की पूर्व सदस्य तारा कार्था ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया कि भारत को ड्रोन के खतरे का पहला बड़ा एहसास साल 2021 में हुआ, जब जम्मू के एयरफोर्स स्टेशन पर ड्रोन से हमला हुआ था.

भारत की सेना को चाहिए निगरानी के लिए ड्रोन

कार्था कहती हैं, "इस घटना ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था की उन कमजोरियों को उजागर किया, जो ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ और बढ़ गई हैं. ड्रोन का उपयोग निगरानी, तस्करी और हमलों के लिए किया जा रहा है.”

वह आगे बताती हैं, "अब सिर्फ तकनीक होना ही काफी नहीं है. बल्कि यह भी अहम है कि सेना कितनी जल्दी बदलते हालात के हिसाब से इसे अपनाती है, खुद को ढालती है और नई रणनीति बनाती है. जो देश कम ऊंचाई पर होने वाले ड्रोन युद्ध में आगे रहेगा, वही बड़े युद्ध में भी मजबूत स्थिति में होगा.”

भारत अकेला देश नहीं है जो हाल के संघर्षों से सीख ले रहा है.

रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया भर की सेनाओं के सोचने के तरीके को बदला है. सस्ते ड्रोन ने करोड़ों डॉलर के टैंकों को नष्ट कर दिया, तोपों को सही निशाना लगाने में मदद दी और दुश्मन की सीमाओं के बहुत पीछे तक हमले भी किए हैं. जिसे पहले केवल सहायक तकनीक माना जाता था, वह अब आधुनिक युद्ध का मुख्य हिस्सा बन गया है. नई दिल्ली में सेना के योजनाकार इन बदलावों को बहुत ध्यान से देख रहे हैं.

भारत की खरीद में लॉजिस्टिक्स ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और स्ट्राइक सिस्टम शामिल हैं. इन सबकी मदद से सेना को लंबे समय तक अलग-अलग क्षेत्रों में निगरानी रखने और जल्दी प्रतिक्रिया देने की क्षमता मिलेगी. कार्था इस पर कहती हैं, "यूक्रेन में युद्ध ने यह बात और पक्की कर दी है कि ड्रोन अब केवल सहायक उपकरण नहीं रह गए हैं, बल्कि आधुनिक युद्ध में उनकी भूमिका अहम हो गई है."

भारत क्यों स्वदेशी ड्रोन चाहता है

यह कहानी सिर्फ सुरक्षा से नहीं, बल्कि उद्योग नीति से भी जुड़ी है. पहले की तरह ना होकर, इस बार यह ऑर्डर ज्यादातर घरेलू निर्माताओं से ही पूरा करने की उम्मीद है.

यह खरीदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के प्रयासों के अनुरूप है और ऐसे समय में हुई है जब भारत घरेलू ड्रोन उद्योग विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो.

सरकार का कहना है कि लंबे समय तक अपनी सुरक्षा और रक्षा जरूरतों के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है. भारत ड्रोन सेक्टर में अपनी तकनीक और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है क्योंकि उसका मानना है कि इस क्षेत्र में देश जल्दी प्रगति कर सकता है.

विंग कमांडर राजीव कुमार नारंग ने बताया कि यूक्रेन और ईरान में हालिया संघर्षों और साथ ही पहलगाम हमले के बाद शुरू हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' ने ड्रोन टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता के महत्व को और मजबूत किया है.

भारत में अमेरिका की मदद से बनेंगे ड्रोन, चीन पर नजर

‘इंडियाज क्वेस्ट फॉर यूएवी एंड चैलेंजेज' के लेखक नारंग के अनुसार ईरान ने यह करके दिखाया कि कैसे स्वदेशी सिस्टम, टेक्नोलॉजी पर अपना अधिकार और स्मार्ट तरीके अपनाकर दुश्मन की तकनीकी बढ़त का मुकाबला किया जा सकता है.

नारंग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "वे देश जिनके पास खुद का विकसित ड्रोन तकनीकी सिस्टम होगा और तेजी से इनोवेशन कर सकते हैं, उन्हें भविष्य की लड़ाइयों में बढ़त मिलेगी. भारत के लिए चुनौती अब सिर्फ ड्रोन बनाना नहीं रह गया. उनके पीछे की तकनीक में महारत हासिल करना और उन्हें जल्द सेना में शामिल करना है."

भारत अमेरिका से 31 एमक्यू -9B प्रीडेटर ड्रोन भी खरीद रहा है. यह नई घरेलू ड्रोन की खरीदारी उस योजना को और मजबूत करेगी.

जहां अमेरिकी प्लेटफॉर्म लंबी दूरी तक निगरानी और हमला करने की क्षमता देते हैं, वहीं भारत में बने ड्रोन संघर्ष क्षेत्रों में बड़ी संख्या में तैनात किए जा सकेंगे.

ये सभी मिलकर हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैले बहु-स्तरीय निगरानी और युद्ध नेटवर्क के निर्माण की ओर इशारा करते हैं.

क्या खरीदारी की रफ्तार के साथ चल सकती है रणनीति?

डिफेंस स्टार्टअप रुद्रम डायनेमिक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर कोणार्क राय ने कहा कि भारत के ड्रोन अभियान की सफलता इस बात पर कम निर्भर करेगी कि कितने ड्रोन खरीदे गए, बल्कि इस बात पर ज्यादा टिकी है कि उन सिस्टम्स को मिलिट्री ऑपरेशन्स में कितने असरदार तरीके से शामिल किया जाता है.

राय ने डीडब्ल्यू से कहा, "हालांकि भारत में ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए पहले से ही नीतियां मौजूद हैं. लेकिन अब तेजी से खरीद, टेस्टिंग, सर्टिफिकेशन और इंडक्शन बहुत जरूरी हो गया है."

राय के मुताबिक ड्रोन खरीदना एक बात है, लेकिन हजारों ड्रोन को सेना के अभियानों में सही तरीके से शामिल करना अलग है. इसके लिए प्रशिक्षण, रणनीति , इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और डेटा तुरंत प्रोसेस करने की क्षमता जरूरी होती है.

वह कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती यह पक्का करना है कि ड्रोन खरीदने के साथ-साथ ऐसे डॉक्ट्रिन, ट्रेनिंग और ऑपरेशनल कॉन्सेप्ट भी हों जो तकनीकी क्षमता को युद्ध के मैदान में फायदे में बदल सकें.”


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