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भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए कितनी अहम है गंगा जल संधि?

नदियों के पानी के बंटवारे पर संधि की भारत-बांग्लादेश संबंधों में अहम भूमिका रही है. अब 30 साल पुरानी गंगा जल संधि की मियाद दिसंबर में खत्म होने वाली है. क्या यह मुद्दा एक बार फिर आपसी संबंधों की राह में रोड़ा बनेगा

भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए कितनी अहम है गंगा जल संधि?
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नदियों के पानी के बंटवारे पर संधि की भारत-बांग्लादेश संबंधों में अहम भूमिका रही है. अब 30 साल पुरानी गंगा जल संधि की मियाद दिसंबर में खत्म होने वाली है. क्या यह मुद्दा एक बार फिर आपसी संबंधों की राह में रोड़ा बनेगा?

अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण बांग्लादेश के कई इलाके खेती और आजीविका के लिए भारतीय नदियों पर निर्भर हैं. ऐसे में पानी के बंटवारे का मुद्दा दोनों देशों के आपसी संबंधों में अहम भूमिका निभाता रहा है. गंगा नदी के पानी के बंटवारे पर दोनों देशों ने वर्ष 1996 में एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन इस साल दिसंबर में इसकी मियाद खत्म होने वाली है. इसके नवीनीकरण के लिए दोनों देशों का संयुक्त नदी आयोग बीते साल से ही बैठक कर रहा है.

नदियों के पानी पर संधि के लिए दोनों देशों के बीच वर्ष 1972 में संयुक्त नदी आयोग का गठन किया गया था. गंगा जल संधि के नवीनीकरण के मुद्दे पर इस साल 22 मई को कोलकाता में आयोग की आखिरी बैठक हुई थी. लेकिन अब भी इस पर कोई सहमति नहीं बन सकी है. इससे बांग्लादेश में चिंता बढ़ रही है.

कैसे रहे जल बंटवारा संधि के 30 साल

शेख हसीना सरकार के पतन के बाद अंतरिम सरकार के सत्ता में रहने के दौरान दोनों देशों के आपसी संबंधों में पैदा हुई खाई का असर इस मुद्दे पर भी पड़ा है. वैसे शेख हसीना के कार्यकाल में भी तीस्ता नदी के पानी पर कोई समझौता नहीं हो पाने के कारण आपसी रिश्तों में कड़वाहट तो बढ़ने ही लगी थी.

अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता में आने के बाद एक बार फिर यह मुद्दा उभरा है. हकीकत यह है कि भारत से ज्यादा बांग्लादेश को इस समझौते के नवीनीकरण की जरूरत है. यही वजह है कि सत्तारूढ़ बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने हाल में साफ कहा है कि भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में सुधार गंगा जल बंटवारा संधि पर हस्ताक्षर करने पर निर्भर है".

मौजूदा संधि में नदी में 70 क्यूसेक पानी रहने पर दोनों देशों को आधा-आधा मिलता है. लेकिन ज्यादा होने पर भी बांग्लादेश को 35 क्यूसेक ही दिया जाता है. गंगा में पानी कम होने की स्थिति में बांग्लादेश को न्यूनतम पानी मुहैया कराने का कोई प्रावधान या गारंटी इस संधि में नहीं है. समझौते के मुताबिक, वैसी स्थिति में राजनयिक स्तर पर बातचीत से यह तय किया जाता है कि किसे कितना पानी मिलेगा. इसी वजह से बीते तीन दशकों के दौरान भी बांग्लादेश इस संधि को भारत के हित में बताते हुए अक्सर इसकी आलोचना करता रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 1996 से 2026 तक स्थिति काफी बदल गई है. अब जलवायु परिवर्तन के असर को ध्यान में रखते हुए इस संधि का नए सिरे से मूल्यांकन किए जाने की जरूरत है. ढाका स्थित नार्थ साउथ यूनिवर्सिटी के साउथ एशियन इंस्टीट्यूट आप पालिसी एंड गवर्नेंस के निदेशक शेख तौफीक एम. हक ने हाल में अपने एक लेख में लिखा था कि नवीनीकरण के दौरान नदियों के बहाव में बदलाव, पानी की मात्रा, जलवायु परिवर्तन के असर और डाटा-आधारित जानकारियों पर आधारित बाढ़ प्रबंधन के सक्रिय उपायों को भी संधि में शामिल करना जरूरी है.

बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा उबैद इस्लाम ने बीते महीने ढाका में पत्रकारों से कहा था, "संधि के नवीनीकरण के मुद्दे पर अब तक भारत के साथ बातचीत सकारात्मक रही है. दोनों देशों के लिए यह संधि काफी अहम है. उम्मीद है कि भारत ऐसा फैसला करेगा जिससे बांग्लादेश के हितों और दोनों देशों के आपसी संबंधों को कोई नुकसान नहीं हो."

बांग्लादेश के अधिकारियों का कहना है कि संधि की मियाद खत्म होने से पहले इसका नवीनीकरण नहीं होने की स्थिति में खेती और खाने-पीने की चीजों की उपलब्धता तो प्रभावित होगी ही, जलवायु से जुड़े खतरे भी काफी बढ़ जाएंगे.

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संयुक्त नदी आयोग के अधिकारियों का कहना है कि गंगा जल संधि के नवीनीकरण में बांग्लादेश हर मौसम में कम से कम 40 हजार क्यूसेक पानी मुहैया कराने की गारंटी मांग रहा है. इसके अलावा वह इस संधि की मियाद 30 साल की बजाय और लंबी करने की भी मांग कर रहा है.

बांगलादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व में निर्वाचित सरकार के सत्ता में आने के बावजूद दोनों देशों के आपसी संबंध पहले के स्तर तक नहीं पहुंचे हैं. तारिक ने भारत की बजाय अपने पहले विदेशी दौरे के लिए मलेशिया और चीन को चुना था. उन्होंने वहां मंगला पोर्ट पर अहम समझौता किया था जो भारत के लिए खतरे की घंटी बन सकता है.

तीस्ता के पानी पर विवाद

तीस्ता नदी के पानी का बंटवारा भी लंबे समय से दोनों देशों के आपसी संबंधों में रोड़ा बना हुआ है. दोनों देशों के बीच वर्ष 2011 के बाद 2017 में भी इस पर सहमति लगभग तय हो गई ती. लेकिन दोनों बार बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध के कारण इसे स्थगित करना पड़ा. ममता तीस्ता का पानी बांग्लादेश को देने पर सहमत नहीं थी. उन्होंने इसकी बजाय दूसरी नदियों का पानी उसे देने की दलील दी थी. लेकिन उस पर बांग्लादेश तैयार नहीं था.

भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा नदी संधि पर दोनों देशों के बीच सकारात्मक बातचीत एक शांत भू-राजनीतिक माहौल पर निर्भर है. लेकिन बांग्लादेश का चीन की ओर बढ़ता झुकाव और हसीना का प्रत्यर्पण जैसे मुद्दे इसमें बाधा बन सकते हैं.

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कोलकाता के एक पर्यावरण कार्यकर्ता मोइनुल इस्लाम डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बंगाल में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद केंद्र सरकार इस मुद्दे पर अब मजबूती से अपना पक्ष रख सकती है. पहले की ममता सरकार के विरोध के कारण कई मुद्दों पर बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी थी."

राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "गंगा जल संधि सिर्फ़ उपलब्ध पानी की मात्रा के बारे में नहीं है. यह दोनों देशों के लिए उनके पानी की न्यूनतम मात्रा की सप्लाई पक्की करने के लिए है. इससे कम पानी वाले मार्च से मई तक के सीजन में मदद मिलेगी. उस दौरान इलाके में पानी की भारी कमी होती है. ऐसे में भारत ज्यादा पानी देने के लिए शायद ही हामी भरे."

उनका कहना था कि जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पीछे हटने और भारतीय राज्यों में नदी के ऊपरी हिस्सों में पानी का इस्तेमाल बढ़ने जैसी वजहों से सूखे मौसम में पानी का बहाव पहले के मुकाबले कम हो गया है. संधि नवीनीकरण में इन पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस संधि का नवीनीकरण भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए एक अहम परीक्षा है. मियाद खत्म होने की तारीख के करीब आने के साथ ही, खासकर सीमा पार, इस मुद्दे पर बेचैनी भी बढ़ रही है.


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