पाकिस्तान पस्त : मध्य पूर्व तनाव और होर्मुज स्ट्रेट संकट से खाद की किल्लत से सरकार परेशान
मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के बीच पाकिस्तान खाद संकट का सामना कर रहा है, जिससे उसकी कृषि अर्थव्यवस्था की बड़ी कमजोरियां सामने आ रही हैं

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के बीच पाकिस्तान खाद संकट का सामना कर रहा है, जिससे उसकी कृषि अर्थव्यवस्था की बड़ी कमजोरियां सामने आ रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से वैश्विक उर्वरक बाजारों में बड़ा झटका लगा है। इसके चलते यूरिया की कीमतें एक महीने से भी कम समय में लगभग 47 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं।
'डेली मिरर' की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि वह यूरिया उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर है, लेकिन इस भू-राजनीतिक संकट ने यह दिखा दिया है कि वह फॉस्फेट आधारित उर्वरकों, खासकर डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है।
यह असंतुलन इस बात को दिखाता है कि कई वर्षों की नीतियों ने एक तरफ यूरिया उत्पादन को मजबूत किया, लेकिन दूसरी तरफ डीएपी जैसे उर्वरकों की आपूर्ति को कमजोर छोड़ दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की उर्वरक नीति लंबे समय से घरेलू उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस पर सब्सिडी देने पर केंद्रित रही है, जिससे देश में यूरिया का बड़ा उत्पादन हो सका। इसी वजह से पाकिस्तान अपनी नाइट्रोजन आधारित उर्वरक की जरूरत ज्यादातर देश में ही पूरी कर लेता है। लेकिन, फॉस्फेट उर्वरकों को लेकर ऐसी कोई मजबूत नीति नहीं बनाई गई, जिसके कारण डीएपी पूरी तरह आयात पर निर्भर हो गया।
डीएपी पाकिस्तान की कुल उर्वरक खपत का लगभग 15-18 प्रतिशत हिस्सा है और यह गेहूं, चावल और कपास जैसी प्रमुख फसलों के लिए बहुत जरूरी है।
यूरिया के विपरीत, डीएपी बनाने के लिए रॉक फॉस्फेट की जरूरत होती है, जो पाकिस्तान में मौजूद नहीं है। देश में इसका उत्पादन बहुत सीमित है और यह मुख्य रूप से फौजी फर्टिलाइजर कंपनी के एक ही प्लांट (पोर्ट कासिम) में होता है, जो सालाना करीब 8 लाख टन उत्पादन करता है। जबकि देश की कुल मांग 13 लाख से 23 लाख टन के बीच रहती है।
अब यह आपूर्ति की कमी अंतरराष्ट्रीय हालात से और बढ़ गई है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत फॉस्फेट व्यापार होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है और इसके बंद होने से सप्लाई रुक गई है, जिससे डीएपी की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं।
पाकिस्तान अपनी लगभग आधी जरूरत मध्य पूर्व से आयात करता है। इसलिए वहां की रुकावट का सीधा असर देश पर पड़ा है। इससे उर्वरक की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी दोनों हो गई हैं।
इसका असर अब खेतों तक दिखने लगा है। रबी सीजन (अक्टूबर से जनवरी) में डीएपी की बिक्री 23 प्रतिशत गिर गई है, क्योंकि इसकी कीमत बढ़कर लगभग 14,000 रुपए प्रति 50 किलो बैग तक पहुंच गई है।
महंगे दामों के कारण कई किसान डीएपी का इस्तेमाल कम कर रहे हैं या उसकी जगह यूरिया का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका खेती के लिए सही नहीं है और इससे फसल को नुकसान हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट सिर्फ बाहरी हालात की वजह से नहीं है, बल्कि यह कई वर्षों की नीतिगत गलतियों का भी नतीजा है।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार हर साल उर्वरक कंपनियों को गैस सब्सिडी के तौर पर 200 अरब रुपए से ज्यादा देती रही, लेकिन फॉस्फेट उत्पादन बढ़ाने या वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया।
आलोचकों का कहना है कि इस सब्सिडी से उद्योग को फायदा तो हुआ, लेकिन उर्वरक आपूर्ति की मूल कमजोरी को दूर नहीं किया गया।


