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अंधश्रद्धा को सही चुनौती!

चमत्कार दिखाकर धार्मिक श्रद्धा के बाजार और भक्ति के व्यापार में बहुत जल्द तरक्की करने वाले धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री को अब अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने चुनौती दी है।

अंधश्रद्धा को सही चुनौती!
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अपने चमत्कार दिखाकर धार्मिक श्रद्धा के बाजार और भक्ति के व्यापार में बहुत जल्द तरक्की करने वाले धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री को अब अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने चुनौती दी है। महाराष्ट्र की अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एएनआईएस) ने दो परीक्षणों के जरिए मध्यप्रदेश के बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के 'चमत्कारी' दावों को चुनौती दी है। एएनआईएस के संस्थापक प्रो. श्याम मानव ने बीते दिनों नागपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को दो विशेष परीक्षणों से गुजरना होगा। अगर वे इन परीक्षणों में सफल होते हैं तो उन्हें रुपए 80 लाख की पुरस्कार राशि दी जाएगी, लेकिन अगर वे असफल होते हैं तो उनके कार्यक्रम शुल्क से जमा 8 लाख जब्त कर लिए जाएंगे। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक शास्त्री ने इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया है, हालांकि उनका कहना है कि 'मेरे पास कोई अलौकिक शक्तिनहीं है, सभी शक्तियां बजरंगबली की हैं। मुझे केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि मैं धर्मांतरण का विरोध करता हंू।' इस पर प्रो. श्याम मानव का कहना है कि 'अगर वे वाकई दिव्य शक्तियां रखते हैं, तो हमारे परीक्षण में क्या डर? हम सार्वजनिक रूप से सिद्ध करने को तैयार हैं।'

गौरतलब है कि अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने यह चुनौती तीन शर्तों के साथ रखी है:

1. धीरेंद्र शास्त्री को बंद लिफाफों में रखे 10 अलग-अलग व्यक्तियों के नाम, उनके माता-पिता के नाम, उम्र और मोबाइल नंबर सही-सही पहचानना होगा।

2. धीरेंद्र शास्त्री को परीक्षण वाली जगह पर बगल के कमरे में रखी 10 अलग-अलग वस्तुओं की पहचान बिना देखे करनी होगी।

3. पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग नागपुर में होगी और दोनों पक्षों की पांच-पांच सदस्यीय समिति इसकी निगरानी करेगी।

बजरंगबली की शक्ति पर अटूट आस्था दिखाने वाले शास्त्री इन चुनौतियों को मानेंगे या नहीं, उसमें कामयाब होंगे या नहीं, यह तो बाद की बात है। लेकिन इस समय समाज जिस तेजी से अंधश्रद्धा का शिकार हो रहा है, आस्था और अंधविश्वास में फर्क को मिटाया जा रहा है, धर्म के मायने बदलकर दूसरे धर्म के लोगों से नफरत, बदला लेने की भावना को बढ़ावा मिल रहा है, संविधान को अपमानित कर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की मुहिम चलाई जा रही है, उसमें यह बेहद जरूरी है कि इस तरह के क्रियाकलापों पर तार्किक सवाल उठाए जाएं।

प्रो. श्याम मानव ने इस चुनौती के साथ एक गंभीर आरोप भी लगाया है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यकाल में महाराष्ट्र में अंधविश्वास बढ़ा है। हालांकि इस आरोप का दायरा बढ़ाकर पूरे देश पर लागू किया जा सकता है, क्योंकि शायद ही कोई राज्य, कोई जिला ऐसा होगा जहां अंधविश्वास से ग्रस्त जनता और उसे बढ़ावा देने वाला शक्तिशाली, संपन्न तबका मौजूद न हो। इसके बरक्स वैज्ञानिक सोच और नजरिए को बढ़ावा देने वाले लोग नगण्य रह गए हैं।

अभी पिछले हफ्ते ही देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई ने पिछले सोमवार ही अपने परिवार के साथ छतरपुर के बागेश्वर धाम में बालाजी की पूजा की और पीठाधिश्वर धीरेंद्र शास्त्री से भी मुलाकात की। जिसके बाद बी आर गवई ने कहा कि बागेश्वर धाम में सनातन संस्कृति को मजबूत करने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, वे सराहनीय हैं। उन्होंने कहा कि यदि इस प्रकार शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े सामाजिक कार्य निरंतर चलते रहें, तो भारत को विश्व गुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता। इस मौके पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने बागेश्वर धाम में संचालित कैंसर हॉस्पिटल का भी जिक्र किया और वहां की स्वास्थ्य सेवाएं भी देखीं। व्यक्तिगत तौर पर श्री गवई चाहे किसी भी धर्मालय में जाएं और जो चाहें पूजा करें। लेकिन जिस पद पर वे रह चुके हैं, उसके बाद इस तरह किसी विशेष धाम के बारे में बयान देना उचित नहीं है। अच्छी बात है कि छतरपुर में धीरेन्द्र शास्त्री ने कैंसर अस्पताल बनवाया है, लेकिन बेहतर चिकित्सा व्यवस्था की जो जिम्मेदारी सरकार की है, क्या उस पर भी श्री गवई कहेंगे। वैसे जब मुख्य न्यायाधीश रहते हुए डी. वाय. चंद्रचूड़ के साथ प्रधानमंत्री ने उनके घर पर गणेश पूजा में हिस्सा लिया। या अभी राजस्थान के मुख्यमंत्री ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के लिए भारत सरकार के मुख्य न्यायाधीश का संबोधन दिया, उसके बाद न्यायपालिका से बची हुई आस भी टूटने लगी है। ध्यान रहे कि इन्हीं जस्टिस गवई के ऊपर एक वकील ने अदालत के भीतर जूता उछाल दिया था, क्योंकि विष्णु की खंडित प्रतिमा को लेकर दिए उनके बयान पर वकील को सनातन का अपमान महसूस हुआ था। अब वही बी आर गवई धीरेन्द्र शास्त्री के कामों को सनातन संस्कृति को बढ़ावा देने वाला बता रहे हैं। तो क्या देश में बड़ी चालाकी से माहौल तैयार हो रहा है कि कु छ समय बाद हिंदू राष्ट्र की उद्घोषणा हो जाए तब विरोध करने वाला कोई बचे ही नहीं।

असल में धीरेन्द्र शास्त्री इस पूरे खेल में एक नया और युवा किरदार ही हैं। उनसे पहले आसाराम, नित्यानंद, अशोक खरात और न जाने कितने तरह के किरदारों ने अंधश्रद्धा को बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई है। राजनीति, खेल, कला और फिल्म जगत से जुड़ी बड़ी हस्तियां इनके यहां माथा नवाते दिखती हैं, तो समाज का पीड़ित, कमजोर तबका सोचता है कि हम भी ऐसा ही करें तो शायद हमारी तकलीफें दूर हो जाएं, हमें भी ठाठ से रहने के मौके मिले। इस तरह जनता को आराम पहुंचाने की जो जिम्मेदारी सरकार की है, वो अंधश्रद्धा के जिम्मे आ जाती है, जो कभी भी दान की चादर में मिले अरबों रूपए बटोर कर उठा ली जाती है। जनता को न आराम मिलता है, न ठाठ!

ऐसे खेल को रोकने के लिए जरूरी है कि प्रो. श्याम मानव ने जो चुनौती पेश की है, उसे व्यापक स्थान मिले।


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