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दुनियां में चाहे कोई कुछ भी कहे अपने धर्म का परित्याग कभी मत करना : मधुसूदनाचार्य

हमने शिवरीनारायण का नाम भी सुना है कभी हरि इच्छा हुई तो वहां भी दर्शन के लिए जाएंगे

दुनियां में चाहे कोई कुछ भी कहे अपने धर्म का परित्याग कभी मत करना : मधुसूदनाचार्य
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रायपुर। पूरे अयोध्या में चारों ओर प्रसन्नता व्याप्त थी माता कौशल्या भी राजतिलक की तैयारी में लगी हुई थी राघव उनके पास पहुंच गए, माता ने कहा -राघव बहुत समय तक प्रतीक्षा करनी होगी इसलिए कुछ फल खा लो, रघुनाथ जी ने कहा माँ अब मैं युवराज नहीं बनूंगा! मां ने कहा क्यों ? उन्होंने कहा पिता ने मुझे जंगल का राज्य प्रदान किया है, यह सुनकर माता कांप उठी, धीरज रख कर उसने कहा पुत्र पर माता का अधिकार पिता से अधिक होता है, यदि केवल पिता ने तुम्हें बनवास दिया होता तो मैं तुम्हें रोक लेती!

लेकिन तुम्हें माता और पिता दोनों ने आदेश दिया है इसलिए वन तुम्हारे लिए सैकड़ों अयोध्या के समान है। हे राम तुम अयोध्या को अनाथ करके वन में जाओ! जहां तुम रहोगे वही अयोध्या है! यह बातें अनंत श्री विभूषित श्री स्वामी मधुसूदनाचार्य जी महाराज ने व्यासपीठ की आसंदी से व्यक्त की, वे श्री राम कथा का रसपान श्रोताओं को दूधाधारी मठ महोत्सव के तहत करा रहे थे।

उन्होंने कहा कि राघव की सेवा करने हेतु वनवास जाने के लिए माता जानकी और लक्ष्मण जी दोनों तैयार हो गए, जीव का परम सौभाग्य है कि वह भगवान की सेवा करें! यही जीवन का मूल उद्देश्य है! उन्होंने- मुख मोड़ चले, आज हमारे राम अयोध्या छोड़ चले!! गा कर लोगों को भाव विहल कर दिया और कहा कि आगे -आगे राम चलत हैं, पीछे लक्ष्मण भाई। ता बीच सोहे मातु जानकी, शोभा बरनी न जाई।

गंगा पार करते हुए केवट ने बड़ी देर लगा दी भगवान ने कहा केवट नाव शीघ्र पार लगाओ! केवट ने कहा भगवान क्या आप शीघ्रता से पार लगाते हो? चौरासी लाख योनियों में भटकते हैं फिर पार लगता है भगवन, उनकी बातों को सुनकर राघव मुस्कुराने लगे, पार होने के पश्चात रामभद्र जी उन्हें उतराई देने लगे केवट ने कुछ भी नहीं लिया और कहा कि- हे भगवन् आज मैंने आपको गंगा पार उतारा है, जब आपके दरवाजे पर आऊंगा तो मुझे भवसागर से पार करा देना!

उन्होंने श्रोताओं को सावधान करते हुए कहा कि वेद मार्ग पर चलना ही धर्म का मार्ग है, किसी के कहने पर अपना मार्ग मत बदलना! हमारे पूर्वजों ने हमें जो मार्ग सुझाया है उस पर ही चलते रहना, याद रहे दुनिया में चाहे कोई तुम्हें कुछ भी कहे अपने धर्म का परित्याग कभी मत करना, अपना धर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म होता है! संसार में सब कुछ आप अपने प्रयत्न से प्राप्त कर सकते हैं किंतु भगवत कथा सुनने का सौभाग्य भगवत कृपा से ही मिलती है।

हमारे पूज्य महाराज श्री 25 वर्षों से रामकथा ही सुनते आ रहे हैं, एक नहीं अनेक स्थानों पर अनुष्ठान कराते हैं और राम कथा ही सुनते हैं। ऐसे महात्माओं के हृदय में भगवान का साक्षात निवास होता है। इनके दर्शन मात्र से हमारा कल्याण होगा! उन्होंने कहा कि रामायण की तुलना कभी महाभारत से मत करना।

महाभारत का श्रेष्ठ पात्र पितामह भीष्म अपनी पुत्रवधू की भरी सभा में अन्न का वास्ता देकर चीरहरण देखता है, रामायण का सबसे छोटा पात्र, सड़े हुए मांस को खाने वाला जटायु अबला (माता सीता) की रक्षा के लिए रावण जैसे दुर्दांत राक्षस पर आक्रमण कर देता है! हमने शिवरीनारायण का नाम सुना है, यहां से बहुत दूर है, कथा के बीच में जाते भी नहीं बनेगा, जब कभी प्रभु की इच्छा होगी तो जरूर जाएंगे। उल्लेखनीय है कि शिवरीनारायण मठ में भी 22 से 28 नवंबर तक श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ का आयोजन होगा।

श्री दूधाधारी मठ पीठाधीश्वर राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास जी महाराज अध्यक्ष छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग हर दिन की तरह मुख्य यजमान के रूप में मंच पर विराजित थे। अष्टम दिवस कथा श्रवण करने के लिए मुख्यमंत्री के सलाहकार श्री प्रदीप शर्मा, श्रीमती ननकीराम कंवर, पूर्व कुलपति शिव कुमार पांडे, छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार मंडल के अध्यक्ष सन्नी अग्रवाल, पिंकी ध्रुव, सुशील ओझा, डॉक्टर ममता साहू, श्री दूधाधारी मठ के सभी ट्रस्टी एवं श्रद्धालु गण बड़ी संख्या में उपस्थित थे।


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