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खुले में नमाज पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सियासी बवाल, शिया बोर्ड ने जताई आपत्ति

इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं देने का फैसला दिया था। इस मामले में ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएसपीएलबी) के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने शनिवार को अपनी प्रतिक्रिया दी।

खुले में नमाज पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सियासी बवाल, शिया बोर्ड ने जताई आपत्ति
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लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं देने का फैसला दिया था। इस मामले में ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएसपीएलबी) के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने शनिवार को अपनी प्रतिक्रिया दी।

मौलाना यासूब अब्बास ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि सार्वजनिक जगहों पर रोजाना नमाज नहीं पढ़ी जाती। नमाज आमतौर पर जुमे को, ईद और बकरीद जैसे विशेष मौकों पर ही पढ़ी जाती है। उन्होंने दावा किया कि कोर्ट को इस मामले में शायद गुमराह किया गया है।

मौलाना अब्बास ने कहा, "ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह सैयद अली खामेनेई की की मौत के बाद शिया समुदाय के युवाओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। ज़ैदी, रिजवी, जाफरी, अब्बास, अली और हुसैन जैसे विभिन्न शिया समूहों से जुड़े लोगों को यूएई, सऊदी अरब, कतर, ओमान और बहरीन जैसे देशों में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।"

उन्होंने बताया कि उन्होंने इस मुद्दे पर लखनऊ से सांसद और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से दिल्ली में मुलाकात कर चर्चा की थी और विदेश मंत्रालय के स्तर पर इस मामले को उठाने का अनुरोध किया था।

इस मुद्दे पर जामा मस्जिद लखनऊ के मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है कि बिना अनुमति के किसी सार्वजनिक जगह पर नमाज नहीं अदा करनी चाहिए, ताकि दूसरे नागरिकों के अधिकारों का हनन न हो। मेरा मानना है कि यह फैसला सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।"

मौलाना फिरंगी महली ने जोर दिया कि किसी भी धार्मिक गतिविधि को दूसरे नागरिकों की सुविधा और अधिकारों में बाधा नहीं बननी चाहिए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों के बीच बहस छिड़ गई है। कुछ नेता इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर अंकुश बताते हुए विरोध कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे सार्वजनिक व्यवस्था और कानून व्यवस्था बनाए रखने की दिशा में सकारात्मक कदम मान रहे हैं।



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