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अमेरिकी और यूरोपीय अमीर करते हैं धरती का सबसे ज्यादा नुकसान

एक नई रिसर्च से पता चला है कि दुनिया में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले शीर्ष 10 फीसदी लोग पर्यावरण का सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं

अमेरिकी और यूरोपीय अमीर करते हैं धरती का सबसे ज्यादा नुकसान
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एक नई रिसर्च से पता चला है कि दुनिया में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले शीर्ष 10 फीसदी लोग पर्यावरण का सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं. इनकी सबसे बड़ी संख्या अमेरिका और यूरोपीय संघ में है. ऐसे कुछ लोग भारत में भी हैं.

दुनिया के शीर्ष 10 फीसदी उपभोक्ता जो ज्यादातर अमेरिका और यूरोपीय संघ में रहते हैं वे हर साल पर्यावरण का खरबों डॉलर नुकसान करते हैं. नीदरलैंड्स की लेइडेन यूनिवर्सिटी और इंग्लैंड की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों का आकलन है कि यह सालाना नुकसान करीब 1.7-5.7 खरब डॉलर का है. कम्युनिकेशंस सस्टेनिबिलिटी जर्नल ने इस बारे में रिसर्च रिपोर्ट छापी है. रिसर्चरों का कहना है कि उनकी रिसर्च ने यह दिखाया है कि जो ज्यादा जिम्मेदार हैं उन्हें ज्यादा जवाबदेह बनाना चाहिए.

सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं अमेरिकी उपभोक्ता

लेइडेन यूनिवर्सिटी की इंगे श्रीवर इस रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका हैं. उन्होंने कहा कि पर्यावरण को हो रहे नुकसान की कीमत लगाना असहज करने वाला है क्योंकि प्रकृति की असल कीमत तो लगाई ही नहीं दी जा सकती. आर्थिक आंकड़ों ने यह दिखाने में मदद दी है कि सबसे ज्यादा खर्च करने वाले 10 फीसदी लोग कितना अधिक नुकसान पर्यावरण को पहुंचा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि अनुमानित नुकसान पूरी दुनिया के लिए जलवायु और जैवविविधता कोष के लिए जरूरी रकम से भी ज्यादा है.

रिसर्च में धरती या फिर पर्यावरण की सीमा के भीतर उपभोग से होने वाले असर का ही आकलन किया गया है. इस आकलन के मुताबिक लगभग आधा यानी 47 से 56 फीसदी नुकसान का संबंध जैव विविधता के खत्म होने से है. इसके बाद जलवायु को होने वाले नुकसान का नंबर है जो करीब 36-45 फीसदी है. नाइट्रोजन संवर्धन का असर करीब 6-8 फीसदी तो फॉसफोरस संवर्धन का असर और ताजे पानी का असर मिला कर करीब 2 फीसदी.

रिसर्च टीम ने इस बात पर भी जोर दिया है कि सबसे ज्यादा खर्च करने वाले 10 फीसदी लोग पूरी दुनिया में असमान रूप से फैले हैं. इनमें से करीब 60 फीसदी लोग अमेरिका और यूरोपीय देशों में हैं जबकि करीब 2 फीसदी लोग भारत में रहते हैं.

सबसे ज्यादा खर्च करने वाले शीर्ष 10 फीसदी लोगों में से हर आदमी पर्यावरण को करीब 2.3-7.5 हजार डॉलर का नुकसान करता है. हालांकि रिसर्चरों का कहना है कि इनमें क्षेत्रीय असमानता काफी ज्यादा है. अमेरिका में ऐसे 10 फीसदी लोगों में से प्रत्येक 19,000 से 63,000 अमेरिकी डॉलर सालाना का नुकसान करता है यानी औसत करीब 38,000 डॉलर. भारत में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले 10 फीसदी लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति से होने वाले नुकसान 410-1,400 डॉलर प्रतिवर्ष है. जर्मनी के लिए यह आंकड़ा करीब 10,000 डॉलर प्रति व्यक्ति सालाना है. इस लिहाज से भारत में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले लोग पर्यावरण को जो नुकसान पहुंचाते हैं वह दूसरे देशों की तुलना में काफी कम है.

नुकसान की भरपाई में भी योगदान

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के पॉल बेहरेंस रिसर्च रिपोर्ट के सहलेखक हैं. उनका कहना है कि सबसे ज्यादा खर्च करने वाले शीर्ष 10 फीसदी लोग इसलिए अहम हैं क्योंकि ना सिर्फ वे सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं बल्कि इसे घटाने की कोशिशों में भी उनका काफी अहम योगदान है.

उनके निवेश यह तय करने में मदद करते हैं कि कौन से उद्योग का विस्तार होगा. इसके साथ ही उनकी जीवनशैली यह परिभाषा तय करने मे मदद करती कि है समाज में सामान्य के तौर पर किसे माना जाए.

रिसर्चरों की टीम ने 2017 के एनवायरनमेंटल फुटप्रिंट के खर्च के आंकड़े और एनवायरनमेंटल प्राइसेज हैंडबुक का इस्तेमाल कर नुकसान का आकलन किया है. यह हैंडबुक पर्यावरण को होने वाले नुकसान की गणना का संदर्भ बताती है.

इन आंकड़ों का विस्तार आकलनों में अनिश्चिता को दिखाता है, खासतौर से जैवविविधता के नुकसान की कीमत के मामले में. इस गणना में केवल उपभोग का खर्च शामिल है. वित्तीय निवेश का असर जैसी चीजें इनमें शामिल नहीं हैं. रिसर्चरों ने पर्यावरण की रक्षा के लिए मजबूत नियम बनाने की मांग की है ताकि नुकसान के लिए जिम्मेदार लोगों को ज्यादा जवाबदेह बनाया जा सके. उदाहरण के लिए उनसे पर्यावरण शुल्क या फिर संपत्ति शुल्क जैसे टैक्स लगाने की बात कही गई है.


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