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बिहार: क्या बैकवॉटर इफेक्ट से बाढ़ हुई भयावह

बिहार के फिलहाल 15 जिलों में करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं

बिहार: क्या बैकवॉटर इफेक्ट से बाढ़ हुई भयावह
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बिहार के फिलहाल 15 जिलों में करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं. इस बार सामान्य से 27 प्रतिशत कम बारिश के बावजूद राज्य में आई बाढ़ से एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या नेपाल की त्रिशूली और भोटेकोशी नदियों में अचानक आई बाढ़ का सीधा असर बिहार की नदी तंत्र पर पड़ा, जिससे स्थिति गंभीर हुई या फिर क्या गंगा, कोसी व अन्य नदियों में जमे गाद (सिल्ट) की वजह से ‘बैकवॉटर इफेक्ट' के कारण राज्य में बाढ़ की स्थिति भयावह हो गई.

इस वर्ष बिहार में बाढ़ के दौरान गंगा बक्सर से लेकर भागलपुर तक खतरे के लाल निशान से तो ऊपर तो रही ही, गंगा ने पटना के गांधी घाट पर 10 साल पुराना तो भागलपुर जिले के सुल्तानगंज में पांच साल पुराना अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया. गंगा, कोसी, महानंदा, पुनपुन, गंडक, बूढ़ी गंडक, घाघरा, बागमती, सोन व सरयू उफान पर रहीं. जगह-जगह सुरक्षा बांध टूट गए या फिर पानी ओवरफ्लो कर गया.

पटना, भोजपुर, पूर्णिया, भागलपुर, मधेपुरा, खगडिया, कटिहार, मुंगेर, वैशाली, सारण, समस्तीपुर, लखीसराय, बक्सर, अरवल व बेगूसराय जिले की 49.36 लाख आबादी बाढ़ की चपेट में आ गई. हालांकि, अब धीरे-धीरे पानी कम होने लगा है, लेकिन लोगों को अब यह चिंता सता रही कि पानी तो उतर जाएगा, पर गृहस्थी की गाड़ी पटरी पर कैसे आएगी. घर के चूल्हे कैसे जलेंगे. बेटी की शादी के लिए घर में रखा अनाज तो बर्बाद हो चुका है, अब उसका इंतजाम कैसे होगा? कई लोगों को उम्मीद थी कि इस बार फसल अच्छी होगी, तो उसे बेचकर बेटे को बढ़ने के लिए शहर भेजेंगे, लेकिन इस भयावह बाढ़ ने पूरी फसल ही चौपट कर दी. अब शायद ही बेटे को पढ़ने के लिए शहर भेजा जा सकेगा.

गंगा ने सहायक नदियों के पानी को पीछे लौटाया

जब नदी के पानी के प्राकृतिक रूप से बहने की दिशा में कोई बाधा आती है, तो आगे बढ़ने की बजाय पानी पीछे की तरफ लौटने लगता है. इससे उसका जलस्तर बढ़ जाता है. इस स्थिति को ही हाइड्रोलॉजी (जल विज्ञान) में ‘बैकवॉटर इफेक्ट' कहा जाता है.

नदी से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ प्रियेश शुक्ला कहते हैं, ‘‘गंगा में मिलने वाली सहायक नदियों का पानी सामान्य तौर पर इसमें समा जाता है, किंतु इस बार गंगा ही हाई फ्लड लेवल (एचएफएल) पर या उसके पार थी. इसलिए उसने जगह-जगह पर गंडक, कमला, कोसी व बागमती जैसी सहायक नदियों के पानी को आगे बढ़ने से रोक दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि गंडक, बूढ़ी गंडक जैसी इसकी सहायक नदियों का पानी पीछे लौटने लगा, जिससे कई जिलों में बाढ़ आ गई.''

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बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश सहित ऊपरी इलाकों में हुई बारिश ने भी गंगा के जलस्तर को प्रभावित किया. वे कहते हैं, "इस बार गंगा के हाई फ्लड लेवल से अधिक पर पहुंचने में काफी हद तक सिल्ट का भी योगदान है. बांध-बराज नदियों के प्राकृतिक बहाव को रोकते हैं. इससे पानी के साथ आ रहा सिल्ट आगे बढ़ने की बजाय तलहटी में जमा होता जाता है. नदी जितनी अधिक उथली होगी, उसका जलस्तर उतना ही तेजी से बढ़ेगा. गंगा का भी यही हाल है. इसलिए तो अब फरक्का बराज की प्रासंगिकता पर बात हो रही है."

बिहार के पूर्णिया से सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने भी इस साल की बाढ़ को ‘मैन मेड डिजास्टर' बताते हुए फरक्का बराज और नदी प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं. साथ ही, उन्होंने कोसी पर हाई डैम बनाने की मांग की. उन्होंने पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राज्य के 22 जिलों के करीब 56 लाख लोग बाढ़ की वजह से परेशानी झेल रहे हैं. इस गंभीर स्थिति के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से अपेक्षित मदद नहीं मिल रही है.

अब गाद प्रबंधन नीति को मंजूरी

नदियों में सिल्ट जमा होना कोई नई बात नहीं है. यह बिहार की पुरानी समस्या रही है. इसके लिए राज्य में कोई स्पष्ट और अलग नीति मौजूद नहीं थी. लेकिन, अब बिहार सरकार ने बीते मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में बिहार जलस्त्रोत पुनस्र्थापन एवं गाद प्रबंधन नीति, 2026 को मंजूरी दे दी है.

पर्यावरण विशेषज्ञ मधु श्री कहती हैं, "आजादी के बाद से देश में काफी खर्च किया गया, किंतु कभी भी सिल्ट को बाढ़ को बदतर बनाने और इसके समाधान से जोड़ कर नहीं देखा गया. सिल्ट की वजह से ही 1954 में बाढ़ नीति बनने के बाद से अब तक बिहार में बाढ़ संभावित क्षेत्र का रकबा काफी बढ़ गया. हर साल हम यह त्रासदी झेल रहे. उम्मीद है कि नीति को मंजूरी मिलने से सरकार अब एक रोडमैप बनाकर काम करेगी."

सिल्ट से कमाई की तैयारी

खान व भूतत्व विभाग द्वारा मानसून के बाद राज्य में गंगा, कोसी व गंडक समेत 19 नदियों की तलहटी में जमा गाद निकाले जाएंगे. दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, सैटेलाइट मैपिंग तथा हाइड्रोलॉजिकल सर्वे के जरिए एक से तीन मीटर मोटी सिल्ट वाले हिस्सों की पहचान की जाएगी. जांच के बाद अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर इसे नीलाम किया जाएगा. इसके लिए सरकार द्वारा सिल्ट यूटिलाइजेशन टास्क फोर्स बनाई गई है.

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पहले चरण में उत्तर बिहार की नदियों से सिल्ट निकालने का काम शुरू किया जाएगा. इस योजना से राज्य सरकार द्वारा नदियों व नहरों की सफाई पर खर्च किए जाने वाले सालाना औसतन 1100 करोड़ रुपये की सीधी बचत होगी, जबकि सरकार को परमिट शुल्क व रॉयल्टी से करीब 350 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त होगा. वहीं, करीब 13000 लोगों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा.

इसके अलावा, सिल्ट हटने से राज्य में 12 हजार किलोमीटर लंबी नहर प्रणालियों में अंतिम छोर तक पानी पहुंच सकेगा. नदियों, जलाशयों व बराजों से निकाले गए गाद का उपयोग रेलवे, सडक़, सिंचाई, बाढ़ सुरक्षात्मक कार्यों, भवन निर्माण और निचले इलाकों में भराई के लिए किया जाएगा. इससे इन कार्यों के लिए उपजाऊ मिट्टी के इस्तेमाल में कमी आएगी, जिससे खेतों को बचाया जा सकेगा. नदियों, जलाशयों या बराजों की जलधारण व जलवाहन क्षमता बढ़ेगी, जिससे नदी का प्रवाह अविरल बना रह सकेगा.


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