क्या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बीजेपी को चुनौती दे सकेगी?
चुनाव आयुक्त के खिलाफ युवाओं के विरोध प्रदर्शन के बीच दिल्ली में हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया. क्या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ मोदी सरकार के लिए चुनौती बन सकती है?

भारत में हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया. सीजेपी के नेताओं को विमान से उतरते ही गिरफ्तार कर लिया गया और राजधानी में लॉकडाउन जैसे हालात बन गए. मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ युवाओं के नेतृत्व में हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर भारत सरकार की नजर है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को सत्ता से हटाना एक अलग बात है.
‘कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) को शायद जुलाई में विरोध प्रदर्शन के पहले दौर के बाद सरकार की कार्रवाई का अंदाजा था. हालांकि 10 अक्टूबर को जब उसके नेताओं का सामना किले में तब्दील हो चुकी नई दिल्ली में बैरिकेडिंग और हिरासत में लिए जाने की कार्रवाई से हुआ, तो इसका पैमाना उनकी उम्मीद से कहीं ज्यादा था.
सीजेपी की शुरुआत एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन आंदोलन के रूप में हुई थी. दरअसल, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक अनौपचारिक टिप्पणी में बेरोजगार युवाओं को "कॉकरोच” कहा था. इसी के बाद यह आंदोलन शुरू हुआ. इसका नाम प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के तर्ज पर रख कर व्यंग्य किया गया है.
विरोध प्रदर्शनों के इस ताजा दौर में आंदोलनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. देशभर में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद से कथित तौर पर 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जाने की बात है. हाल ही में एक अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सीईसी ने एसआईआर से जुड़े फैसलों में दूसरे आयुक्तों की सहमति नहीं ली. इसके बाद विपक्षी दलों ने और सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.
दिल्ली में बीते सप्ताहांत में क्या हुआ?
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और आंदोलन के सह-संयोजक आशुतोष रांका तथा सौरव दास बीते शनिवार को राजधानी दिल्ली पहुंचे. दीपके को एयरपोर्ट पर उतरते ही विमान में ही हिरासत में ले लिया गया.
इस बीच, आंदोलन से जुड़े कई लोगों के घरों के बाहर पुलिस तैनात कर दी गई. इनमें सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ध्रुव राठी भी शामिल हैं, जिनके इंस्टाग्राम पर करीब दो करोड़ फॉलोअर हैं.
मध्य दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को बसों में भरकर वहां से ले जाया गया. उनमें से कई लोगों को शहर से दूर स्थित केंद्रों में रखा गया, जहां उन्हें कई घंटों तक हिरासत में रहना पड़ा. स्थानीय मीडिया के मुताबिक, पूरे शहर में कम से कम 3,000 लोगों को हिरासत में लिया गया.
सरकार विरोध प्रदर्शनों से कैसे निपट रही है?
ये विरोध प्रदर्शन ऐसे समय हो रहे हैं, जब नरेंद्र मोदी को निर्वाचित सरकारों का नेतृत्व करते हुए लगातार 25 साल पूरे हो गए हैं. उन्होंने पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के और फिर भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर यह जिम्मेदारी संभाली है.
लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय ने डीडब्ल्यू से कहा, "विडंबना यह है कि यह जश्न ऐसे समय मनाया जा रहा है, जब राजनीतिक रूप से उनकी स्थिति सबसे कमजोर है.” मुखोपाध्याय ने 2013 में मोदी की जीवनी नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स लिखी थी.
उन्होंने सरकार की मौजूदा कार्रवाई की तुलना जुलाई में हुई घटनाओं से की, जब हजारों युवा प्रदर्शनकारी बार-बार परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विरोध में मोदी के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आए थे.
उस समय मध्य दिल्ली में कई दिनों से प्रदर्शन कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए अधिकारियों ने लाठियों और पैलेट गन का इस्तेमाल किया था. बहुत से लोगों को हिरासत में भी लिया गया.
इस बार अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की तैनाती और एहतियाती कार्रवाई का सहारा लिया. इसमें पहले के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े लोगों को नोटिस भेजना, परिवहन सेवाओं में कटौती, इंटरनेट बंद करना और हवाई अड्डे पर ही लोगों को गिरफ्तार करना शामिल था.
वैश्विक निगरानी संस्था एसीएलईडी की एशिया मामलों की वरिष्ठ विश्लेषक पर्ल पंड्या ने डीडब्ल्यू से कहा, "सरकार ने अपने पिछले अनुभव से सबक सीखा है. उन्होंने लोगों को जंतर-मंतर पर लंबे समय तक बैठने नहीं दिया, इसलिए प्रदर्शन बड़ा रूप नहीं ले सका.”
हिरासत से छुटने के बाद दीपके बोले, "हम फिर सड़कों पर उतरेंगे"
उन्होंने आगे कहा, "चिंता की बात यह है कि कहीं भविष्य में यही तरीका अपनाना सरकार की रणनीति ना बन जाए, जिसमें लोगों को शुरुआत में ही विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति ना दी जाए.”
वह केंद्र सरकार के उस फैसले का जिक्र कर रही थीं, जिसके तहत दिल्ली के मध्य में स्थित 18वीं सदी की वेधशाला जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए तय स्थलों की सूची से हटा दिया गया. हालांकि, अधिकारियों ने राष्ट्रीय राजधानी में विरोध प्रदर्शन के लिए तीन नए जगहों की घोषणा की है.
मुखोपाध्याय ने इस स्थिति की अलग व्याख्या की. उन्होंने कहा, "वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती श्रीमान मोदी की हार है.” मुखोपाध्याय का तर्क था कि अगर सरकार को एक बिल्कुल नए सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के विरोध प्रदर्शनों के जवाब में इतने बड़े पैमाने पर सुरक्षा बल तैनात करने पड़ें, तो यह अपने आप में सरकार के लिए एक झटका है.
अक्टूबर में जुलाई जैसा असर क्यों नहीं दिखा?
आंदोलन को मिल रहे समर्थन के बावजूद, सीजेपी जुलाई में मिली सफलता को दोहरा नहीं पाई है. ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मौजूदा विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व मुख्य रूप से विपक्षी नेता और छात्र संगठन कर रहे हैं.
पर्ल पंड्या ने कहा, "शिक्षा का मुद्दा कहीं ज्यादा व्यापक था, वोट देने के अधिकार को अब भी मूल रूप से एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में देखा जाता है, जहां एक तरफ विपक्ष है और दूसरी तरफ बीजेपी.”
हालांकि, सीजेपी लंबे समय से खुद को गैर-राजनीतिक आंदोलन बताती रही है. बड़ी संख्या में युवाओं के इससे जुड़ने की एक वजह अक्सर यही बताई जाती है.
लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय ने इस रुख की आलोचना की. उन्होंने कहा, "आप चुनावी निष्पक्षता जैसे मुद्दे ये कहे बगैर नहीं उठा सकते कि ये राजनीतिक मुद्दे हैं.”
जुलाई में सीजेपी के पिछले विरोध प्रदर्शनों और मौजूदा प्रदर्शनों के बीच अंतर के बावजूद, समाजशास्त्री सुरिंदर सिंह जोधका ने दोनों के बीच निरंतरता पर जोर दिया.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "मुझे नहीं लगता कि दोनों में बुनियादी तौर पर कोई अंतर है. एक बार फिर युवा ही लामबंद हो रहे हैं और उन्हें इससे कहीं ज्यादा प्रोत्साहन मिल रहा है, क्योंकि विरोध प्रदर्शनों का पिछला दौर सफल रहा था.” उन्होंने आगे कहा, "ये प्रदर्शन संस्थाओं, लोकतंत्र, पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े ऐसे ही सवाल उठा रहे हैं.”
जोधका ने आगे कहा, "उन लोगों के लिए एक नई उम्मीद पैदा हुई है, जिन्होंने पहले भारत से उम्मीद छोड़ दी थी और जिन्हें लगता था कि दक्षिणपंथ का पूरी तरह नियंत्रण हो चुका है.”
सरकार में अचानक बदलाव की संभावना कम
विश्लेषकों ने पड़ोसी देशों नेपाल और बांग्लादेश में हुए उथल-पुथल भरे विरोध प्रदर्शनों से इनकी तुलना को खारिज किया. इन देशों में प्रदर्शनों के चलते सरकारें गिर गई थीं. उनका कहना है कि भारत की मजबूत संस्थाएं सरकार में किसी बड़े बदलाव को रोकने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.
समाजशास्त्री सुरिंदर सिंह जोधका ने कहा, "भारत की राज्य व्यवस्था और राज्य की संस्थाएं काफी मजबूत रही हैं.” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विपक्षी दल भी "राज्य को उखाड़ फेंकने के बजाय संस्थाओं को फिर से मजबूत करने” की मांग कर रहे थे.
पर्ल पंड्या ने भी कहा कि न्यायपालिका में लोगों का भरोसा "इन विरोध प्रदर्शनों को ऐसी जनक्रांति में बदलने से रोकेगा, जो सरकार को सत्ता से बाहर कर दे.” हालांकि, उन्होंने कहा कि लगातार बना असंतोष "2029 में सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है या उससे पहले विधानसभा चुनावों में भी.”
विश्लेषक के मुताबिक, इससे मोदी की लोकप्रियता भी प्रभावित हो सकती है, जो पिछले एक दशक से भारतीय राजनीति की एक प्रमुख विशेषता रही है. नीलांजन मुखोपाध्याय के लिए मौजूदा विरोध प्रदर्शनों का सबसे चिंताजनक पहलू चुनाव आयोग की विश्वसनीयता में आती गिरावट है.
21 साल की उम्र में मतदाता के रूप में अपना नाम दर्ज कराने के समय महसूस हुए गर्व को याद करते हुए उन्होंने आज के युवा भारतीय मतदाताओं से इसकी तुलना की. उन्होंने कहा, "आज के युवा अपने वोट के लिए लड़ रहे हैं.”


