नोबेल पुरस्कार जीतने से क्यों बढ़ जाता है 'नोबेलाइटिस' होने का खतरा? जानिए इसके लक्षण
नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद कुछ विजेता वास्तविकता से दूर होने लगते हैं. वे अचानक ऐसी बातें कहने लगते हैं, जिनका विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं होता. कुछ लोग इस स्थिति को “नोबेलाइटिस” कहते हैं.

लाइनस पॉलिंग को एक नहीं, बल्कि दो नोबेल पुरस्कार मिले थे. पहला पुरस्कार उन्हें 1954 में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में मिला. उन्हें यह पुरस्कार केमिकल बॉन्ड की प्रकृति पर किए गए उनके शोध के लिए मिला था. 1962 में उन्हें परमाणु हथियारों के विरोध में काम करने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया.
इस अमेरिकी रसायनशास्त्री ने न सिर्फ दो नोबेल पुरस्कार जीते, बल्कि दोनों पुरस्कार अकेले अपने नाम किए. किसी भी वैज्ञानिक के लिए यह बेहद दुर्लभ उपलब्धि है. इतनी बड़ी उपलब्धि अक्सर नोबेल विजेताओं को रातों-रात दुनिया भर में मशहूर कर देती है. इसके बाद, लाखों लोग उनकी हर बात को ध्यान से सुनने लगते हैं.
नोबेलाइटिस का शिकार हो सकते हैं नोबेल विजेता
निल्स हैंसन, डुसेलडॉर्फ की हाइनरिष हाइने यूनिवर्सिटी में ‘हिस्ट्री, थ्योरी एंड एथिक्स ऑफ मेडिसिन' विभाग के प्रोफेसर हैं. उनका कहना है कि अचानक मिलने वाली यह शोहरत खतरनाक हो सकती है. खासकर तब, जब दुनिया भर में मशहूर ये विशेषज्ञ "अजीबोगरीब और बिना प्रमाण वाले वैज्ञानिक सिद्धांत फैलाने लगें.” नोबेल विजेताओं की कही गई ऐसी बातें लोग गंभीरता से ले सकते हैं.
पॉलिंग के साथ भी ऐसा ही हुआ. 1960 के दशक के मध्य से उन्होंने यह दावा करना शुरू कर दिया कि विटामिन-सी हर बीमारी का इलाज है. कैंसर से लेकर दिल की बीमारियों और अल्जाइमर्स, मल्टीपल स्केलेरोसिस या ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी गंभीर बीमारियों तक, सबका इलाज.
पॉलिंग ने इलाज का एक वैकल्पिक तरीका विकसित किया, जिसे उन्होंने ‘ऑर्थोमोलेक्यूलर मेडिसिन' नाम दिया. इसमें हर मरीज के लिए विटामिन और मिनरल की अलग-अलग मात्रा तय की जाती थी. करीब 60 साल बाद भी इस बात के ठोस सबूत नहीं मिल पाए हैं कि उनके तरीके कितने असरदार हैं.
पॉलिंग का मामला "नोबेलाइटिस” या "नोबेल बीमारी” का एक प्रमुख उदाहरण है. यह कोई आधिकारिक बीमारी नहीं है, बल्कि अनौपचारिक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है. इसका इस्तेमाल उन स्थितियों के लिए किया जाता है, जब कुछ नोबेल विजेता उम्र बढ़ने के साथ खुद को बहुत महान समझने के भ्रम का शिकार होने लगते हैं. यह शब्द सबसे पहले ‘द रॉयल सोसाइटी' के अध्यक्ष और खुद नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल नर्स ने दिया था. रॉयल सोसाइटी ब्रिटेन की राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी है.
'हर चीज पर शक करें'
बेल्जियम की केयू ल्यूवेन यूनिवर्सिटी को 2019 में दिए एक इंटरव्यू में जब पॉल नर्स से पूछा गया कि एक अच्छा वैज्ञानिक बनने के लिए क्या जरूरी है, तो उन्होंने कहा था, "हर चीज पर शक करें, खुद पर और अपने विचारों पर भी.” लेकिन नोबेलाइटिस के मामलों में सबसे पहले खुद पर शक करने की यही क्षमता खत्म होती है.
ऐसा ही कुछ वायरोलॉजिस्ट लूक मोंटेग्नियर के साथ भी हुआ था. उन्हें 1980 के दशक की शुरुआत में अपनी सहकर्मी फ्रेंकोइस बैरे-सिनोसी के साथ मिलकर एचआईवी (ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस) की खोज करने के लिए 2008 में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बाद में, मोंटेग्नियर ने बीमारियों के इलाज के एक और वैकल्पिक तरीके, होम्योपैथिक दवा का समर्थन किया. उन्होंने दावा किया कि बेहतर साफ-सफाई और पोषण से अफ्रीका में एचआईवी के फैलने को कम किया जा सकता है.
कोविड-19 महामारी के दौरान, मोंटेग्नियर ने कहा कि सार्स-कोव-2 वायरस को एचआईवी के जेनेटिक कोड के हिस्सों का इस्तेमाल करके लैब में बनाया गया था. मई 2020 में एनडीआर के कोरोनावायरस अपडेट पॉडकास्ट के दौरान जर्मन वायरोलॉजिस्ट क्रिश्चियान ड्रोस्टेन ने कहा, "प्रैक्टिस करने वाले एक वायरोलॉजिस्ट के लिए यह कहना मुश्किल है कि वायरोलॉजी में नोबेल पुरस्कार विजेता बकवास बातें फैला रहे हैं, लेकिन यह पूरी तरह से बकवास है.”
जेम्स वॉटसन कभी भी अपनी सादगी या विनम्रता के लिए नहीं जाने गए. शोहरत मिलने के बाद तो उनका दिमाग और भी खराब हो गया. 1962 में डीएनए मॉलिक्यूल की संरचना की खोज करने के लिए उन्हें मॉरिस विल्किंस और फ्रांसिस क्रिक के साथ नोबेल पुरस्कार दिया गया था. लेकिन 2000 के दशक की शुरुआत में, वॉटसन ने बार-बार नस्लवादी बातें कही. उन्होंने कहा कि अश्वेत लोग श्वेत लोगों की तुलना में कम बुद्धिमान होते हैं.
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मेडिकल हिस्टोरियन हैंसन की मानें तो जेम्स वॉटसन इस बात के सबसे बड़े उदाहरण हैं कि नोबेल पुरस्कार मिलने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि वह इंसान अपने आप में कोई रोल मॉडल या प्रेरणा स्रोत बन गया है. उन्होंने कहा, "हो सकता है कि आपने कोई शानदार खोज की हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप हर मामले में जीनियस हैं.”
नोबेल पुरस्कार जीतने वालों को भी चुनौती दी जानी चाहिए
कई बार आम जनता की बहुत बड़ी-बड़ी उम्मीदें भी ‘नोबेलाइटिस' की वजह बन सकती हैं. 2001 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल जीतने वाले पॉल नर्स के साथ भी ऐसा ही हुआ. पुरस्कार मिलते ही उन्हें हर तरह के मुद्दों पर इंटरव्यू देने के लिए रोजाना ढेर सारे कॉल और मैसेज आने लगे थे. डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "ऐसा लगने लगा जैसे अचानक मुझे दुनिया और इंसानों के कामकाज के बारे में सब कुछ पता चल गया हो.”
नर्स ने रिसर्च करने वालों को सलाह दी, "आप जो भी कहें, सोच-समझकर कहें. उन्हीं विषयों पर बात करें जिनके बारे में आपको कुछ जानकारी हो, तो बेहतर रहेगा. अगर आपको ज्यादा जानकारी नहीं है या किसी बात को लेकर पक्के तौर पर पता नहीं है, तो साफ तौर पर बता दें कि आपको पक्के तौर पर नहीं पता है.”
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हैंसन ने यह भी ध्यान दिया कि मीडिया नोबेल विजेताओं की हर बात को बड़ी उत्सुकता से कवर करता है. फिर चाहे वे पुरस्कार विजेता अपने खुद के विषय से हटकर किसी भी मुद्दे पर ही क्यों न बोल रहे हों.
नोबेलाइटिस से प्रभावित लोग अपने-अपने क्षेत्र के बड़े विशेषज्ञ होते हैं और अपने काम के लिए नोबेल पुरस्कार पाने के पूरी तरह हकदार भी होते हैं. लेकिन वे भी आम इंसान ही हैं और उनमें भी खुद को बहुत बड़ा समझने की प्रवृत्ति या व्यवहार संबंधी दूसरी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए, होम्योपैथी, ऑर्थोमॉलिक्यूलर मेडिसिन और दूसरी 'स्यूडोसाइंटिफिक' पद्धतियां सिर्फ इसलिए भरोसेमंद नहीं हो जातीं कि उन्हें किसी नोबेल पुरस्कार विजेता ने समर्थन किया है.


