निजता कानून के खिलाफ क्यों हैं अंबानी-अदाणी के मीडिया आउटलेट
21 समाचार प्रकाशकों के एक समूह का कहना है कि निजता कानून के लागू होने से, उनके खोजी पत्रकारिता करने में रुकावट आएगी.

21 समाचार प्रकाशकों के एक समूह ने केंद्र सरकार के निजता कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उनका कहना है कि इस कानून से खोजी पत्रकारिता करने में रुकावट आएगी और सरकार को पत्रकारों के सोर्स जानने का अधिकार मिल जाएगा.
भारत के डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने केंद्र सरकार के निजता कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. इस एसोसिएशन में 21 मीडिया आउटलेट शामिल हैं, जिनमें उद्योगपति मुकेश अंबानी और गौतम अदाणी की मीडिया कंपनियां भी हैं. इनका कहना है कि निजता कानून में मीडिया संस्थानों को कोई छूट नहीं दी गई है, जिसके चलते यह प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खतरा पैदा कर रहा है.
मीडिया कंपनियों ने अगस्त, 2026 में सरकार के साथ एक बैठक भी की थी. इसमें उन्हें भरोसा दिया गया कि यह कानून, प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा. हालांकि, समाचार प्रकाशकों का कहना है कि यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन की तरह पत्रकारों के लिए लिखित रूप से कोई विशेष प्रावधान न होना चिंताजनक है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने डीएनपीए की याचिका की समीक्षा करने के बाद यह जानकारी दी है.
सुप्रीम कोर्ट कब करेगा सुनवाई
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट मंगलवार, 27 अक्टूबर को इस याचिका पर सुनवाई करेगा. इसे मोदी सरकार के निजता कानून के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है. इससे पहले फ्री स्पीच एक्टिविस्टों और छोटे न्यूज आउटलेटों के समूह ने ही इस कानून को चुनौती दी थी. अब इस कानून के खिलाफ उतरे आउटलेटों में इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे नाम भी शामिल हैं.
मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाले नेटवर्क18 और गौतम अदाणी के एनडीटीवी पर विपक्षी पार्टियां अक्सर मोदी सरकार का पक्ष लेने का आरोप लगाती हैं. उन पर बीजेपी सरकार से सवाल नहीं पूछने के भी आरोप लगते हैं. हालांकि, केंद्र सरकार और ये मीडिया आउटलेट इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं. लेकिन अब निजता कानून के मुद्दे पर नेटवर्क18 और एनडीटीवी केंद्र सरकार का विरोध कर रहे हैं.
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने अपनी 698 पन्नों की याचिका में मांग की है कि कानून के अधिकांश विवादास्पद प्रावधानों को, जो मई 2027 से लागू होंगे, रद्द कर दिया जाए. इस मामले में डीएनपीए, मीडिया समूहों और भारत के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया.
मीडिया आउटलेटों को क्या है आशंका
मीडिया आउटलेटों को आशंका है कि इस कानून की वजह से एक पत्रकार को उसी व्यक्ति से पूर्व सहमति लेनी पड़ सकती है, जिसकी वह जांच करना चाहता है. डीएनपीए के मुताबिक, पत्रकार अगर एक व्यक्ति से उसकी जांच करने की अनुमति लेगा तो "इससे उस व्यक्ति को सबूत नष्ट करने और गवाहों को डराने-धमकाने का मौका मिल जाएगा."
यह कानून लोगों को उनके द्वारा दी गई अनुमति वापस लेने और डेटा हटाने की मांग करने का भी अधिकार देता है. डीएनपीए का कहना है कि इससे मीडिया आउटलेटों को छपी हुई रिपोर्टें हटानी पड़ सकती हैं. मीडिया आउटलेटों को यह भी डर है कि इस कानून में दी गई शक्तियों की वजह से पत्रकारों को अपने स्रोत व सूत्र बताने पड़ सकते हैं.
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, अगस्त में सरकार को लिखे गए एक पत्र में डीएनपीए ने कहा था कि कानून में सरकार को व्यापक छूटें दी गई हैं, जबकि प्रेस को इस तरह का कोई संरक्षण नहीं दिया गया है. डीएनपीए के मुताबिक, इस कानून की वजह से लोग रिपोर्टरों को भ्रष्टाचार आदि से जुड़ी जानकारियां देना बंद कर सकते हैं.
भारत में प्रेस फ्रीडम पर सवाल
इस याचिका पर सुनवाई ऐसे समय में हो रही है, जब पहले ही भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं. हाल ही में हुए एसआईआर विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भी कई पत्रकारों को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने की घटनाएं सामने आई थीं. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 157वें स्थान पर है. साल 2014 में भारत 140वें स्थान पर था. हालांकि, केंद्र सरकार इस रैंकिंग को खारिज करती है.
मोदी सरकार का कहना है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करती है. सरकार के मुताबिक, भारत में सैकड़ों समाचार पत्रों और टीवी चैनलों का एक "जीवंत प्रेस और मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र" है, जिसे विदेशी निकायों से मान्यता लेने की जरूरत नहीं है. वहीं, आलोचक कहते हैं कि कई प्रमुख मीडिया आउटलेटों ने मोदी सरकार की जांच-पड़ताल करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं.


