‘रेजीम चेंज’ क्या है और भारत में इस पर इतना विवाद क्यों?
क्या रेजीम चेंज का अर्थ केवल सरकार बदलना है या इसका मतलब पूरी राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव भी हो सकता है?

सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण के ‘रेजीम चेंज’ वाले बयान के बाद भारत में राजनीतिक विवाद तेज हो गया है. लेकिन क्या रेजीम चेंज का अर्थ केवल सरकार बदलना है या इसका मतलब पूरी राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव भी हो सकता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के बीच वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के ‘रेजीम चेंज' वाले बयान के बाद इस शब्द के अर्थ और इस्तेमाल को लेकर भारत की राजनीति में विवाद शुरू हो गया है. प्रशांत भूषण ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के बीच ‘रेजीम चेंज' को जनता का अधिकार बताकर सरकार बदलने की बात कह दी तो ‘रेजीम चेंज' शब्द के इस्तेमाल पर बीजेपी ने कड़ी आपत्ति जताई है. पार्टी ने इसे निर्वाचित सरकार को सत्ता से हटाने की कोशिश से जोड़कर देखा है, लेकिन रेजीम चेंज का वास्तव में मतलब क्या है- सिर्फ सरकार बदलना या फिर पूरी राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की ओर इशारा?
यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या किसी निर्वाचित सरकार को बदलने की मांग करना और देश की पूरी राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की कोशिश करना एक ही बात है? और क्या किसी सरकार को हटाने की मांग अपने-आप में लोकतंत्र के खिलाफ मानी जा सकती है?
रेजीम चेंज का मतलब क्या है?
दरअसल, अंग्रेजी के शब्द ‘रेजीम' का अर्थ केवल सरकार नहीं है बल्कि इसका इस्तेमाल किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था, सत्ता चलाने के तौर-तरीकों और उन संस्थाओं के लिए भी होता है जिनके जरिए राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल किया जाता है. जाहिर है, इसी तरह रेजीम चेंज का अर्थ संदर्भ के अनुसार बदल सकता है. इसका इस्तेमाल एक राजनीतिक शासन की जगह दूसरे शासन के आने के लिए किया जाता है. हालांकि कई संदर्भों में यह शब्द बलपूर्वक सत्ता बदलने, तख्तापलट या किसी बाहरी ताकत के हस्तक्षेप से सरकार गिराने के अर्थ में भी इस्तेमाल होता है.
राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक प्रोफेसर सुधीर कुमार कहते हैं, "किसी बयान में सिर्फ ‘रेजीम चेंज' शब्द का इस्तेमाल देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वक्ता हिंसक तरीके से सरकार गिराने की बात कर रहा है. यह समझना जरूरी है कि वह किस तरह के बदलाव की मांग कर रहा है और उस बदलाव के लिए कौन-सा रास्ता सुझा रहा है.”
प्रोफेसर सुधीर कुमार के मुताबिक, "कोई व्यक्ति चुनाव के जरिए मौजूदा सरकार को हटाकर दूसरी पार्टी की सरकार बनाना चाहता है या फिर कोई आंदोलन मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था, संविधान या संस्थाओं के ढांचे में बुनियादी बदलाव की मांग कर सकता है. ये दोनों अलग-अलग तरह की मांगें हैं लेकिन दोनों का मकसद सत्ता परिवर्तन है. अगर सेना के जरिए सरकार गिराने या किसी दूसरे देश के हस्तक्षेप से सत्ता बदलने की बात हो तो ये एक अलग स्थिति है.”
लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन और रेजीम चेंज में क्या फर्क है?
लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की सबसे सामान्य प्रक्रिया चुनाव है. मतदाता अपने वोट के जरिए किसी सरकार को दोबारा चुन सकते हैं या उसकी जगह किसी दूसरी पार्टी अथवा गठबंधन को सत्ता सौंप सकते हैं. इस प्रक्रिया में सरकार बदलती है, लेकिन संविधान, चुनाव व्यवस्था और शासन की बुनियादी संस्थाएं बनी रहती हैं.
भारत में भी केंद्र और राज्यों की सरकारें चुनावों के जरिए बदलती रही हैं. किसी पार्टी की सरकार का जाना और दूसरी पार्टी का सत्ता में आना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है. इसलिए किसी सरकार को बदलने की मांग करना अपने-आप में लोकतंत्र-विरोधी गतिविधि नहीं है.
प्रोफेसर सुधीर कुमार के मुताबिक, "भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(बी) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है. इन अधिकारों पर संविधान में निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं. हालांकि रेजीम चेंज का अर्थ अगर सत्ता के मौजूदा ढांचे को बलपूर्वक गिराना है, तो सवाल अलग हो जाता है. किसी सरकार के खिलाफ असहमति व्यक्त करना, उसके इस्तीफे की मांग करना और हिंसक तरीके से उसे हटाने की कोशिश करना एक जैसी गतिविधियां नहीं हैं.”
यही फर्क मौजूदा भारतीय बहस के केंद्र में है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारी सरकार बदलना चाहते हैं या नहीं, बल्कि यह भी है कि वे किस तरह के बदलाव की बात कर रहे हैं और उसे हासिल करने का प्रस्तावित तरीका क्या है.
प्रशांत भूषण के बयान पर विवाद क्यों हुआ?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं को लेकर राजधानी दिल्ली समेत देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. प्रदर्शनकारी चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं.
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अपने एक भाषण में रेजीम चेंज की बात कही जिसके बाद बीजेपी ने आरोप लगाया कि आंदोलन का मकसद सिर्फ चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि निर्वाचित सरकार को सत्ता से हटाना है. बीजेपी ने उनके इस बयान को बांग्लादेश जैसे घटनाक्रम की आशंका से भी जोड़ दिया.
दूसरी ओर, प्रशांत भूषण ने सरकार बदलने की मांग को लोकतांत्रिक अधिकार बताया. उनका कहना है कि किसी सरकार की नीतियों या उसके कामकाज का विरोध करना और चुनाव के जरिए उसे बदलने की मांग करना लोकतंत्र में स्वीकार्य है.
यानी विवाद का एक हिस्सा शब्द के सीधे-सीधे अर्थ से जुड़ा है, जबकि दूसरा हिस्सा इस आशंका से जुड़ा है कि कहीं मौजूदा आंदोलन चुनावी राजनीति के बाहर सत्ता बदलने की कोशिश तो नहीं है. बांग्लादेश का उदाहरण इस बहस में इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि वहां 2024 में छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन कुछ ही हफ्तों में सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध में बदल गया था.
शुरुआत सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शनों से हुई. बाद में पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की मौत और सरकार के प्रति बढ़ते असंतोष ने आंदोलन को व्यापक रूप दे दिया. पांच अगस्त 2024 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना देश छोड़कर भारत आ गईं और उनकी सरकार का अंत हो गया. इसके बाद बांग्लादेश में अंतरिम सरकार बनी.
इस घटनाक्रम को केवल सरकार बदलने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि इसमें छात्रों का आंदोलन, व्यापक जन-असंतोष, सरकारी कार्रवाई और राजनीतिक संकट जैसे कई कारक शामिल थे. साथ ही, बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन की परिस्थितियां भारत की संवैधानिक और चुनावी व्यवस्था से बिल्कुल अलग थीं.
क्या रेजीम चेंज की मांग लोकतंत्र के खिलाफ है?
इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि मांग का अर्थ और उसे पूरा करने का तरीका क्या है. अगर कोई राजनीतिक दल या आंदोलन चुनाव में मौजूदा सरकार को हराने, उसके इस्तीफे की मांग करने या संविधान के दायरे में नीतिगत और संस्थागत बदलाव लाने की बात करता है, तो उसे केवल रेजीम चेंज शब्द के इस्तेमाल के आधार पर लोकतंत्र-विरोधी नहीं कहा जा सकता.
लेकिन अगर किसी आंदोलन का मकसद हिंसा, सैन्य हस्तक्षेप या असंवैधानिक तरीके से निर्वाचित सरकार को हटाना है, तो उसकी प्रकृति अलग होगी. ऐसी स्थिति में सिर्फ सरकार बदलने की मांग का हवाला देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कार्रवाई के तरीके और उसके प्रमाणों की जांच जरूरी होगी.
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह कहते हैं, "सवाल यह है कि किसी सरकार की आलोचना को क्या देश की स्थिरता के खिलाफ प्रयास मान लिया जाना चाहिए? लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, संस्थाओं से जवाबदेही की मांग और राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करना सामान्य गतिविधियां हैं. नेपाल, बांग्लादेश से तुलना करने वालों को समझना होगा कि यहां के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से हम किस आधार पर तुलना कर रहे हैं. आखिर किसी आंदोलन को हिंसक या असंवैधानिक बताने के लिए ठोस आधार भी तो होना चाहिए, सिर्फ हवा में ये बातें नहीं कही जा सकतीं.”
भारत में ‘रेजीम चेंज' को लेकर विवाद सिर्फ एक अंग्रेजी शब्द के अर्थ का सवाल नहीं है बल्कि यह इस बात से भी जुड़ा है कि राजनीतिक असहमति को किस तरह देखा जाता है और सरकार बदलने की मांग को लेकर लोकतांत्रिक सीमाएं कहां तय होती हैं. आखिरकार, लोकतंत्र में किसी सरकार को बदलने की मांग और लोकतांत्रिक व्यवस्था को बलपूर्वक बदलने की कोशिश के बीच फर्क करना जरूरी है.


